Monday, January 25, 2010

बयान..

सोचिए तो, इतने महीन जायकों को बगलिया थाली भर भात, सेम की तरकारी से अभी भी पसीज जानेवाले एक बिहारी की बौद्धिक लाम क्‍या होगी, न हासिल डकारों में घिरा-गिरा होगा, उतरने को लगाम होगा, ऊपर उठकर फैलने का वितान कहां होगा? लेकिन देखिए मज़ा, फिर-फिर खराब होता हूं, गहरे तक डूबी शराब होता, आंख गिराये तलवार की धार, देह चढ़ाये तोप के मुंह रोज़, चीख़ता, हां, अब दाग़ो! रोज़.

जानता हूं डॉक्‍टर और बीवी की तरह ज़रुरी है पैसों के पंख होते हैं, मगर हमें धौंस न दिखाइएगा पैंसों की झंडिया न लहराइएगा, क्‍योंकि उम्र के गहिर गड्ढे फलांगकर इतना जान लिये हैं पैसा हमारे दरवाज़े सहता नहीं है, पैसों को हम सुहाते नहीं, वैसे ही जैसे प्रशस्ति हमें बुलाती नहीं, न मुंह के एक फीके पान से ज्यादा हम उसका भाव खा पाते. मुंह के ज़र्दाइन में दिल्‍ली धोबी-घाट लगता है और मार्मिकता के आख्‍यान के पढ़वैये कई कबिबर देहाती-हाट के चिरई तिवारी, थोड़ा कंटीला गाना है, पार्टनर, माफ़ कीजिएगा, वैसे ही जैसे ज़रा कम राजनीतिक हुए होने की तक़लीफ़ हम भूल नहीं पाते, मगर साथ ही, राजनीतिक तीव्रगामियों की चिरकुट झूलों पर झूल भी नहीं पाते!

बंद समाज के इस अंधेरे अघोरी आधुनिक राग को कहीं जो ज़रा जगह मिले, खालिस देसी म्‍यूज़ि‍कल के चार नोट बनें, कोई दूसरा भी गुनगुनाये, मीठी आग जला जाये, थोड़ा साथ चले थोड़ा आगे तक हमें भी लिये जाये.

2 comments:

  1. फोटो मस्ट चैंप दिये हैं साईड में अपना..

    कबिबर देहाती-हाट के चिरई तिवारी?? :)

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