Tuesday, January 26, 2010

रोज़ का किस्‍सा..

खुद से बचाकर रोज़ लिखोगी फिर वही नाम, रोज़ मिटाओगी. मुझसे कहोगी का सवाल कहां उठेगा जब खुदी से इतना छिपाओगी. मैं अचानक पुरानी फटी कमीज़-सा जो फड़फड़ाऊंगा बिसराये बंद ख़्यालों में, हाथ झटकोगी, तिलमिलाओगी बेवज़ह बच्‍चे पर बरसोगी, आह, मुझसे दो बात कहने करने को कितना तरसोगी. मैं अंधा आवारा गिरूंगा अपनी आहों पर, इस उस जाने किन अजनबी बेमुरव्‍वत चाहों पर, बेमतलब कहानियों के ताने बीनता फिरूंगा, तुम ही तो सुनती हो, सुन लोगी हर जगह के भोले बचकानेपन में अफ़साने बुनूंगा, कुछ सुरे-सिरफिरे गाने, बनूंगा.

जानता हूं चाकू से कुरेदती दिल कितना मोहब्‍बत करती हो, और उतने ही साफ़ यह भी कि, उंगलियों पर गिन-गिनकर कितनी, नफ़रत. लेकिन सच पूछो तो हम दोनों ही कहां जानते हैं मोहब्‍बत किस चिड़ि‍या का नाम, आये हैं जिधर जिस शहर से जानते होंगे थोडा़-बहुत क्‍या कैसी दुनिया है, मगर जाते जिस ओर जानते कितना उस गांव की पहचान?

फिर भी जाने क्‍या आवारापन कुहरीले घन हैं, तुम्‍हारे मलिन मन की खिड़कियों पर बगाहे भटके गोरैया की तरह फुदकता, चहकता मिलूंगा, तुम छनौटा खींचकर मारोगी तो उनींदे तुम्‍हारे सपनों के ठोर, अपने होंठों से सील दूंगा. मीठे, मार्मिक थोड़े उन सुहाने क्षण हम एक-दूसरे को कितना जान लेंगे, लेकिन यह भी ग़ज़ब होगा कि जल्‍दी ही, उतनी ही निष्‍ठुर निर्ममता से, फिर अपने-अपने अकेलेपन की चादरें भी तान लेगे.

3 comments:

  1. न जाने क्यों यह मुझे भावनाओं और रिश्तों की छुअन का एहसास करा रहा है .

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  2. गजब का कविता-गद्य...
    और अंदाज़...

    वाकई खूब गल्प कर रहे हैं आप...

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  3. इतनी प्यारी कि मैं पूरा का पूरा इस पोस्ट की तरह हो जाये तो क्या खूब. बडी गहरे तक छूते हैं आप.

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