Wednesday, January 27, 2010

औरतों के देश में..

जिधर नज़र घुमाओ, वही नज़र आतीं, गजब नज़ारा था. अखाड़े की लड़ाई के वक़्त जैसे पेड़ों के डाल और छतों के मुहाने तमाशाई बच्‍चों से पट जायें, शादी के घर जैसे नहान-घर अटा-बझा रहे और चाय के कप पर कप खाली होते रहें, मगर गिलास भर पानी पाना एकदम मुहाल हो और सत्‍यनारायण कथा वाले घर के दालान में अपनी खोयी चप्‍पलें, कुछ उसी तरह से बकिया का सब गायब भले न हुआ हो, जाने कहीं छिप गया था, जो प्रकट, गोचर था वह जच्‍चे वाले घर में बसाइन कपड़ों-सी हर तरफ फैली औरतें ही औरतें थीं.

कोई लहसुन छील रही थी, कोई माथे के ढील धो रही थी तो कोई मेहंदी बीन रही थी, और ताज्‍जुब की बात, सब गुनगुना रही थीं. चौंके के असमंजस में ही एकदम से उछलकर सवाल छूटा होगा, ‘क्‍या गुनगुना रही हैं?’

तिस पर एक तमककर मुड़ी थी (‘गंगा जमुना’ की बैजंतीमाला कि ‘गाईड’ की वहीदा रहमान की तरह?), ‘हम जमीन वालियां हैं, बाबू, हमसे न गुनगुनवाओ, आसमान उड़ाओ! यही जरा दुनिया है, गाकर हम कहां जायेंगी?’ इतना बोलकर तमक कुमारी फिर वापस अपने गाने में उड़ने लगीं..

नीले आसमान में सस्‍ते छापेवाले कुछ फूल से खिल गए, या कुछ रंगीन तितलियां सी उड़ीं और नज़र झपकते में औरतों के छापेदार कपड़ों में लुका गईं!

हुमसभरा बच्‍चों का शोर गूंजता, शोर करते बच्‍चे दीखते नहीं. कोई औरत थपथपाती उस न दीखते को पुचकारकर चुपा देती, फिर हौले अपने गीत में लौट जाती, अपने बझेपने में तैरती, डूबी डोलती.

मैंने हारकर जुसेप्‍पे से सवाल किया, ‘ये मध्‍य प्रदेश की, मंगोलिया की, बुरकिना फासो, मैंक्सिको कहां की हैं औरतें? हमारा सुख-दुख सुनने के, मेरा हाथ अपने हाथ लिये, गाल से गाल सटाने के, गाये जा रही हैं, क्‍यों? किस जबान में गा रही हैं? पहले तो इनका देश क्‍या है, कोई आइडिया होता है, आं? ओ पतली, लंबी चोटी वाली हसीना.. ?’

जिसे पतली, लंबी चोटीवाली कहकर चिन्हित किया था, उस हसीना ने अपने बाल उतार लिये, अपने गंजेपने पर चुनरी फेरती बोली, ‘हमारा कौन देस? देस होता तो हम औरतें होतीं?’

एक उमिरदराज, पुरइन थीं, मुंह में मुसलमानी हुक्‍का गुड़गुड़ाती बोलीं, ‘औरतों बदे देस खोजे कवनो आसान काज है? चहुंओर घुमि आओ, सब्‍बे तरफ औरतन भेंटायेंगी, उनका देस न देखोगे. औरतन की आंख में बस गाना है, सो ही उनका मुलुक, मुलक के राह और पगडंडी, बूझे? मगर तुम बजार के अमदी, कइसे बूझोगे?’

मिट्टी के पुते हुए आंगन से नीले दरवाज़े पर एक औरत तानपूरे की शक्‍ल का एक अफ्रीकी बाजा उठाये बाहर आई, इमली की शक्‍ल का एक बड़ा, भारी वृक्ष था जिसकी फुनगी पर बसंती पंखोंवाली एक चिड़ि‍या सोचती बैठी थी कि उड़ना इतना मुश्किल क्‍यों होता है, उड़ने से ठीक पहले मन इतना घबराता क्‍यों हैं?

जुसेप्‍पे की आंखों के कोर एक बूंद आंसू आकर अटक गया था, लेकिन हमने उसकी बाबत बात नहीं की. हवा में औरतों का अजनबी गाना चुपचाप कांपता, थरथराता रहा, उसी पर कान लगाये उसे बूझने की जुगत में उलझे रहे.

7 comments:

  1. बॉस आप नंबरी हैं, जो लिखते हैं नलफल्लिम होता है ।आप बिहारी न होते तो बहुत अच्छा होता । क्योंकि वह तो बाहुबली,पिछडा प्रिय ,दलित हमदर्द,वोट बाज ,संख्या(लोक)तंत्र,लेफ्ट ओरियेंटेड ,नफरत भरा सूबा बनने मे शान समझता है । जंहा आप जैसा भाषा कारीगर हो ,उसका ऐसा हाल...खुदा खैर करे..

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  2. कल कुछ मित्रों के साथ बैठे थे तो बात निकली की बिहारी इतना गरजते क्यों हैं .
    पता चला हरी मिर्ची बहुत खाते हैं :)

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  3. ये कहाँ आ गए हम
    लिखने वाले ही नहीं टिपयाने वाले ने भी घूंघट ओढ़ रखा है

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  4. बहुत ही मजेदार. शब्द की ऐसी बुनाई, जोताई तो आप ही कर सकते है. आपकी लेखनी से भावनात्मक जुडाव है मेरा. इतना कि दिल कहता है कि आप हमेशा मस्त रहे.

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  5. अद्भुत गुरुदेव.. अद्भुत...

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