दौड़ना दायें बायें, दौड़ना जिधर मिले रस्ता. दौड़ना कि छाती मुंह को आए, और ज़बान पैर के छालों-सा छिले जायें. फिर भी दौड़े चले जाना, जैसे ज़िंदगी की आखिरी दौड़ हो. कि न दौड़ने से कठुआता काट खाता, थरथराता हो मन. कि दौड़ते रहना ज़िन्दा होने की इकलौती वज़ह बन जाए, फिर.. हां, फिर.. हांफें ढेर होना मुंह के बल गिर पड़ना.
ज़माने, ज़मानों बाद फिर कभी जो इक अजनबी सांझ एक मनभींजा साथ पूछे, सलीके से मुस्कराकर मीठे जवाब देना कि दौड़े थे भरपूर, हां, कभी तुमने भी इक मर्तबा प्यार किया था, उतरे थे एक जलती नदी धंसे थे नाक तक नशे में गहरे, इक मर्तबा डूबे थे हुए थे समूचा आदमी, फिर बेहोशी में खुद को उबार लिया था.
देखते-देखते देखे होंगे कई नगर, मंजर, दिल के उलझे तागों की लसर-भसर, कई दीवाने सारे, रसभरे गाने कई.
हर बार करीने से मतलबी मुस्कराहट इक पहन लिया होगा, बेमतलब-सा किस्सा एक गढ़ लिया होगा.