Wednesday, January 20, 2010

ओ सफरिये, ओ..


फटफटिया से निकल जाना सीरिया, वहां से कोहे-माहिर पहुंचना, रस्‍ते के किसी सस्‍ते कहवाघर पूछना कोई जानता है ज़मदूल-ऊलैब-बिन ताहिब, उसके खानदान का खुराफाती किस्‍सा? कब किस गांव से निकले, कब समुंदर पार किया, लुटेरे के धोखे में कब स्‍पेन के जंगख़ार देहात पहुंचे, एक ज़िंदगी-लुटी आर्मेनीयन हूर का बेड़ा पार किया, लब्‍बोलुबाब यह कि बत्‍तीस की चढ़ी उम्र गारत हैजे के हाथों मरने के पहले कहां-कहां क्‍या गुलज़ार किया.
या उत्‍तरी कोरिया के सन्‍न, सुन्‍न विकराल, मोहजाल से छूट दिखना पच्छिमी अफ़रीका के चमकीले, हरीले मैदान, ज़िंदगी के धमकते धम-धम लोहुलुहान में. काठ के बस की जगर-मगर छत पर झंझावात होगा, एक टांगकटे लड़के के हाथ ऑटोमैटिक बंदूक होगी, एक पेटभारी जनाना के कांधे पर मुर्गा सुहाना, उसके आवारा ठोर से छूटता कोई पुराना तराना होगा, दहलते धकधक तुम्‍हारे दिल में मगर कपुचिंस्‍की का कोई सजीला फ़साना होगा?
या बिछलती साइकिल से फिसलता दीखना किसी सिसिलियन सूनसान में, दूर मुहानों पर समुंदर नीली, महीन, डूबती-उतराती होगी, कहीं दूर गायब एकॉर्डियन की मीठी ऐंठ मन को छकाती, एक दीवानी ललक साइकिल के चमकते लोहे से उठकर नज़रों के हल्‍कों पर पसर-पसर जाती होगी..

No comments:

Post a Comment