Saturday, February 27, 2010

असंबद्ध, संगीतबद्ध..

गाढ़ी रातों में आदमी बहेलिये की तरह कहीं बहुत दूर अपने में कुछ ढूंढ़ता बाहर जाता है, मछुआरे के जाल-सा गहरे कहीं उतरा डूबा हुआ, ख़ामोश. रात की परछाइयां पानी में ‘गुड़प’ डोलती हैं, ऊपर आती हैं. सोयी म‍छलियों के सिलसिले किस दावत की किस अफ़ीम ने हमको हमारी मोहब्‍बत में ऐसा नाकार बना दिया! की बेकली का गाना फुसफुसाते हैं अपने सपनों, सोये जल का नील छांह-नहाया आंगन सजाते हैं. आदमी मंत्रमुग्ध इंतज़ार करता है.

औरत की साड़ी के किसी कोर खंसा होता है कहीं अनदिखता वह ज़रा-सा इंतज़ार. काम की मेज़ पर झुकी वह काम, काम लिखे जाती है, फिर सिर पर हाथ धरे पढ़ती तो पढ़ा जाता इंतज़ार.. औरत को अच्‍छा नहीं लगता इस तरह अपना काम में जिये जाना, जीने में जाने वह क्‍या है किसलिए है के इंतज़ार को अपने से बारहा हटाते, अपने में फिर-फिर वही गुंथा पाना. हाथ से लगकर दवात उछलता है, नीली सियाही आंख के भौं और हाथ की उंगलियों को नीला कर जाती है. औरत थककर बटुआ उठाती है.

रात की पीठ पर आदमी एक के बाद एक जाने कितने अनप्रोसेस्‍ड सूत्र टीपता चलता है, उमगता औरत को बताता, इतने सारे संगीत के बीच खड़ा क्‍यों भूलता रहता बार-बार मैं अपना तरन्‍नुम, इस भूले में तुम मुझे कहां छोड़े जाती हो? औरत लंबी सांस लेगी, चुप रहकर कहेगी भागते रहते हो हर वक़्त, दिखता है मेरा संगीत कहां मुंहछुपाये खड़ा है, कभी उसे पास बुलाते हो? अंजुरियों की कोमलता में थामे उन्‍हें अपने नेह में नहलाते?..

फीकी मुस्‍कराहट में लिपटी औरत कांपते सुर धीमे संभलकर अपने शब्‍द सजायेगी, ‘सच जानो, सब समय चाहती हूं तुम तरन्‍नुम में रहो, हमारा भला हो, और फिर सब समय पाती हूं कि मेरे बोलने में गाना खराब होता है, कब तुम्‍हारे काम आती हूं? तुम हर वक़्त टांगे रहते हो गले में हारमोनियम मैं एक ज़रा-सी बांसुरी तक कहां उठा पाती हूं? दिखता नहीं तुम्‍हें? इतने सारे संगीत के बीच कहीं दिखती हूं मैं?

(जारी..)


माचिस मद्धिम पुरान..



माचिस नहीं मिलता. कुछ भी कहां मिलता है. बच्‍चों का गेंदा हेराया है. लेकिन जनार्दन मिसिर का बेटियो तो हेरायी है, फिर? दू कट्ठा का एक टुकड़ा बेचा सकता है, जैसे ज़रा सा अरमान गांव के बाहर फेंका सकता है.

Friday, February 26, 2010

गिलहरी का बाघ..

औरत देखेगी मन के फांक से, कितना गहरे देख सकती हूं की झांक से, और फिर दिलटूटी आवाज़ में बुदबुदायेगी, ‘मैं तुम्‍हारा भरोसा नहीं करती. इसलिए तुमसे नफ़रत करती हूं, सुनो. और प्‍यार करती हूं इसलिए नफ़रत नहीं कर पाती!’

गोद का बच्‍चा एकदम-से गिर पड़े की तरह आदमी सुनेगा, सिर्फ़ औरत की नफ़रत सुन सकेगा, अपनी नफ़रत में सिहरता कि वह मन के किस गांव बसता है जहां भरोसे की इतनी ज़रा-सी हरियाली नहीं? हर समय दिखता है पानी में डोलती पुरानी डोंगी और अपना तैरना, बहे चले जाना, फिर क्‍यों होता है कि साथ कहीं पहुंचना नहीं होता?

बांस के जंगल में एक अकेला बाघ विचरता है. अकुलाया, अपने बाघ होने से भय खाया. बचपन के कुछ किस्‍से याद आते हैं, कुछ लगता है उसके नहीं, जंगल की कहानियां हैं. घुटने पर पैर जमाये पीठ के बल लेटी गिलहरी उस मेले की याद दिलाती है जब बाघ उसे साथ लिवा कर चकरी के चक्‍कर काटने गया था और बाद में गिलहरी ने कैसे उसकी उल्‍लू काटी थी जब कुएं में बाघ को उसकी परछाईं दिखाकर वह उसे ललकारती, उस गहरे लगभग गिराती छोड़ आई थी, याद आया, डॉन बेप्‍पे बाघानो? बाघ क्‍या करेगा एक बेचारी मनभली गिलहरी का, कातरता में अपनी बेढब मुस्‍कराता है. रात मन के सूने-हारों के अलग-अलग वृंद सजाती है. बाघ किसी बूढ़े बांस की पकी देह से माथा लगाये वही पुराना सवाल एक बार फिर पूछता है जिसे अब सुस्‍ताती हवायें तक अनसुना किये जाती हैं, ‘पुराने पुरोहित, बताओ, सचमुच वही हूं जो समझता हूं मैं हूं?’

अपनी उलझन में बेसुध धुत्‍त आदमी बुदबुदाता है मालूम नहीं भरोसा किस चिड़ि‍या का नाम, जिस गांव बसती है मैं उस गांव शायद कभी गया नहीं. या सपने में गया होऊं तो भरोसे से कभी मुलाकात नहीं हुई, मैंने देखा नहीं चेहरा, तुम्‍हारी नफ़रत का चेहरा दिखता है, भूखे होने की सी शर्मिंदगी होती है, भूख के बंजारे भूगोल पर तुम्‍हें एक सच्‍चा गाना गुनगुनाता मिला, ग़लती हुई?

औरत जुडी हथेलियों पर ठोढ़ी गड़ाये खुद को बताती है, ‘एक गुमनाम शहर के बिसराये पुराने सिनेमाघर के अंधेरों में रुपहली छायाएं डोलती हैं, टॉर्च लिए एक बूढ़ा संतरी खोजता है अब हाथ न आनेवाला ज़माना, पुराना, भूला गाना..’

(जारी..)

होगा जैसा जितना..

होंगी बहुत सारी कभी बर्फ़ की बरसात नहीं होगी

जैसे स्निग्‍ध सितारों की आभा हमारी आत्‍माओं पर

झरे सारी रात झरती रहे, खुले में नंगे पैर भागें वो

सचमुच की चांदनी रात सी रात कब होगी, नहीं होगी

दिखेगा जीवन नाखुश कुछ झुंझलाया-सा, अचक्‍के

सामने पड़े पुराने गरीब दोस्‍त के मुंह चुराया-सा

हंसना मिलना कमीज़ उतारकर चप्‍पल पहनना

गिलास की शराब होगी, मनबस रस पिये का सुरुर

बने, आंखें खुशी में धंसीं चमकती चकमकायें वो

बातें नहीं होंगी, थरथराती रेशमी रातें

नहीं होंगी, जीवन होगा जैसे बटुली में ढंकी

बसाइन रोटी, गिरते-भहराये बेमुरव्‍वत शब्‍द होंगे

महक-सिंझा सुहाना, समूचा भरपूर गाना नहीं होगा.


Thursday, February 25, 2010

कितनी भाषाओं कितनी सभ्‍यताओं में..

औरत कहती है मन की रेल पर ये जो तुम हसरतों की ऐसी मीठी, पगलायी लतरें बिछाये जाते, कुछ सूझता है मुझे कहां-कहां खींचे लिए जाते हो? यह समय है और कितना अच्‍छा है हम ज़ि‍न्‍दा हैं, मगर फिर?

'फिर क्‍या?', आदमी हंसता है चार वर्ष के बच्‍चे-सी निष्‍पाप हंसी. बेवकूफ़, भूला हुआ कि किस भूले से आया है किस भटकन जायेगा, कि मोहब्‍बत की देह के हाड़-मांस नहीं होता, कि ख़्यालों के मीठन में संजोकर रोपे पौधे के ज़रा-सी हवा की कमी कितना तकलीफ़ देगी, मन मुंह को आयेगा, सांस खुद से छूटी-छूटी सी जाएगी. फिर क्‍या नहीं सोचता आदमी, सिर्फ़ बच्‍चे-सी हंसी हंसता है. बेवकूफ़.

औरत दूर तक देखे जाती और दूर तक सोचती दंग होती है. जब और सोचना दिल को डुबाने लगता है तो आदमी के ख़्यालों की महीन रेशोंवाली चटाई पर गिरकर ढेर होती है, अपनी खुशी में मीठे उदास, उस उदासी मेंमदहोश, मानो वह हथेली पर दिये गए ज़रा-से समय को नहीं जी रही, ताउम्र ख़त्‍म न होनेवाले शराब पी रही हो, और फिर अपने को वैसा बोलता सुनती जिस मिठास को हवाओं में महसूसती वह लगभग बेहोश हुई जाती हो, ‘लो, मैं अपनी जिरह में तुमसे हारी, अब?’

आदमी सुरीलेपन के महीन तागों पर खुशियों की बहुत दूर तक उड़ाई पतंग की संगत में डूबा चला जाता, और फिर उसी तेज़ी से वापस लौटा आता, ‘तुम बताओ!’

अपने में भूली हुई औरत जवाब नहीं देती, सिर्फ़ देखती देखे चली जाती, हवा में टटोलती हरफों का एक भोला मजमून बनाती, धीमे-धीमे फिर बुदबुदाती, ‘यह अनमने, असमंजस का हिसाब अच्‍छा नहीं ठीक-ठीक बता दो तुम्‍हारे बारे में कितना सोचें. कम सोचते हों ज्‍यादा कर दें और ज्‍यादा हो रहा हो तो कम कर दें स्‍केल बाहर करो आज ठीक-ठीक हिसाब कर ही लें. दफ़्तर के समय की तरह तय वक़्त शुरू करें और घड़ी देखकर तुम्‍हें दिमाग़ से उतार दें? दायें देखें तो तुमको और बस तुमको ही देखे जाएं ओर बायें भुला दें सब, ऐसा? सब्जियों पर से छिलके की तरह हटा दें, किताबों में जो कहीं नज़र आओ मिटा दें. दूर तक सड़क पर बेसुध चलते चले जाएं और तुम्‍हारी हर बात को हवा में उड़ा दें. बोलो न, अकेले कितनी दूर निकल जाएं आगे फिर कहां ठहरकर सिरा पकड़ें, करें सोचना शुरू और कितना सोचें. निर्जन रात में कपाटों के बीच बंद कर दें सुबह के उजाले तुमको चादर ढंक दें. हंसते-हंसते सोचकर अन्‍यमनस्‍क उदासी में बदल दें, बीस शब्‍द सोचकर बाईस खारिज़ करें, बोलो न, कितना सोचें. किस रंग में सोचें और किस रंग में सोचने से बचकर निकल जाएं. सोच का हल्‍कापन बनाए रखें और इतना न ऊपर जाएं कि भार के नीचे दब जाएं. कितनी भाषाओं में पढ़ें तुमको और कितनों में भूल जाएं, बोलो न, कितने शब्‍दों और कितनी सभ्‍यताओं में सोचें तुमको?

(जारी..)

Sunday, February 21, 2010

जाने किस काले समय में..


‘सहरा के चेहरे पर क्‍या भाव हैं? क्‍या किस तरह के भेद बंद हैं इन आंखों में सहरा कभी कुछ बोलती क्‍यों नहीं?’ सूती का सफ़ेद दुपट्टा सहरा की सांवली कलाई के दबे रंगोंवाली चुड़ि‍यों पर ज़रा-सा कांपकर फिर थिर हो जाएगा, मंजुनाथ का मन नहीं होगा, एक आलोड़न से निकल फिर दूसरे में डूबने लगेगा. और ऐसा नहीं कि सहरा सामने बैठी हो और अपने चुप रहने में अस्थिर मंजुनाथ को और उद्वि‍ग्न कर रही हो, नहीं, सहरा कहीं नहीं होगी, मगर उससे क्‍या फर्क़ पड़ेगा, उसका ख़्याल जंगली अमरुद में कीड़े की तरह हर वक़्त मंजुनाथ के होने में गुंथा होगा, साथ की ज़रुरत क्‍यों होगी?, नहीं होगी.
जैसे वर्तमान के किसी पूर्व-परिभाषित, स्थिर, स्‍टैटिक बिम्‍ब के बंधाव की न हो पाएगी, वर्तमान लगातार छिटक-छिटककर अलग-अलग काल खण्‍डों में अपनी यात्राएं करने लगता होगा, और मंजुनाथ अबस उस बहाव में स्‍वयं को भूले सहरा को खोजते होंगे, और तब बहुत मर्तबा ऐसा भी होता होगा कि सहरा वर्तमान में मंजुनाथ के सामने बैठी होती होगी लेकिन वह अपनी समय-भटकन में उस वर्तमान तक पहुंच न पाते होंगे?
जैसे फ़ि‍लहाल मंजुनाथ को अपनी आंखों के आगे सहरा नहीं, एक लहरदार, ठाठ में पंख फैलाये मोर कच्‍ची, मटैली सड़क पार करता दिखा. मंजुनाथ दृश्‍य की भव्‍यता में भरे आंखें मलकर दुबारा तकने को हुए तो पैरों के नीचे संकरे ईंटों की पुरानी, इस्‍पाहानी किसी और समय की सख़्त, चौड़ी सड़क महसूस हुई, ज़रा दूर एक वृहताकार जानवर एक करवट गिरा दिखा, नज़दीक जाकर देखने पर दिखता एक सिरकटे घोड़े की लाश थी, बहुत सारा सूखा काला होता खून था, एक ज़रा-ज़रा सी खुली कहानी थी जिसमें अभी और कुछ आयाम जुड़ने थे.
घबराये मंजुनाथ ने आंखें मूंद लीं. क्‍या करे, किस सुबह, कैसी सांझ, क्‍या समय, कैसी हवा में वह सहरा को छिपाये लिए जाए कि खौफ़ में एक अदद आदमी की इक ज़रा-सी अच्‍छाई का दम न फूलने लगे, कोई हंसे तो अपनी हंसी में हंसने जैसा हंसे, कोई कहे तो.. मगर सहरा कहां कुछ कहती है? हर बखत चुप रहती है. चुप, चुप, चुप.
चुप समय, हां. अलग-अलग समयों में घूमते सुस्थिरता के किसी क्षण मंजुनाथ से पहचानने में भूल नहीं होती कि उनकी मुश्किल की एक वज़ह यह भी है कि बहुत सारे बोलते वक़्त में उनके समाज का वर्तमान दरअसल एक चुप समय है. हां. देश भर के चहेते इतने बड़े फ़ि‍ल्‍मी स्‍टार, सुपरस्‍टार हैं, सारे-सारे समय बकवास बकते रहते हैं, अपने निहायत क्षुद्र अर्थ-स्‍वार्थों से परे किसी भी ज़रूरी सामाजिक मसले पर हमेशा चुप रहते हैं. शर्म नहीं आती, हंसते रहते हैं, उनकी संगत में पूरा समूचा मुल्‍क बेहयायी में हाथ गिराये हंसता, खुश होता है, कमज़ोर की गरदन रेती जाती है, लाल खून की नदी फैलती रहती है, खून को ठहरकर काला होने की फ़ुरसत नहीं बनती, अलबत्‍ता समय पर काला रंग चढ़ता चलता है. हिंदी सिनेमा के जाने कौन-कौन होते हैं, अजिताभ, नरप्रताप सुनहले परदे पर इसकी ये और उसकी वो कर देने की हेकड़ी ठेले रहते हैं, मगर सब अंतत: धंधे के उनके अपने दो कौड़ि‍या फ़ायदे के लिए ही होता है, हिंदी सिनेमा लाख दांत पीस-पीसकर भी एक मारलन ब्रांडो, जॉर्ज क्‍लूनी, सॉन पेन पैदा नहीं कर पाता..
जैसे सहरा फिर बोल नहीं पाती, जैसे मंजुनाथ कैसी भी सुरमई सांझ हो, प्रसन्‍न–मदन हो नहीं पाता..
‘सहरा, तुम कुछ बोलती क्‍यों नहीं?’, मंजुनाथ आखिर हारकर कहता है सहरा जिसे सुन नहीं पाती.
‘मैं हर समय बोल ही तो रही हूं’, सहरा चुप रहकर जवाब देती है.

Friday, February 19, 2010

दो लिंक्स..

दो चीज़ें यहां अपने रेफ़रेंस के लिए टांक रहा हूं, पहली कुछ दिनों पहले गोरखपुर में फ़ि‍ल्‍मकार कुंदन शाह से की भूपेन की बातचीत है, भूपेन की बेतैयारी के सवालों का जहां कुंदन की ओर से दिया गया बड़े धीरज, सलीके और व्‍यापक संदर्भों को समेटे बड़ी समझदारी के विस्‍तृत जवाब हैं. दूसरी चीज़ फैज़ के पाठ पर इलाहाबाद विश्‍वविद्यालय में हिंदी के अध्‍यापक प्रणय कृष्ण की छपी सिलसिलेवार टिप्‍पणी है.

Thursday, February 18, 2010

ठिल-ठिल की राज और नीति..

जनहित के आशयोंवाली भीड़भरायी जमघटों में बैकग्राउंड में गाना बजता रहता है ‘ये जो पब्लिक है सब जानती है’, उत्‍साही एक्टिविस्‍ट बेसुरा गुनगुनाता घुटने थपथपाता भी रहता है, हां, हां, जानती है, जानती है, नेताजी ने राजनीतिक समीक्षा की सही शब्‍दावली सजवाकर सही पोस्‍टर बनवाया था, हम सही-सही छपवाकर सही-सही जगह चिपकवा भी आये हैं, मगर जानते रहने की इस उत्‍फुल्लित पृष्‍ठभूमि में सार्वजनिक सामाजिक कार्रवाइयों के जब मौके निकलते हैं तो फिर यही दिखता है कि सत्‍ता जिनके हाथ से भी निकलकर जिनके बीच भी पहुंची और अब नयी शक्‍लों में घूम रही है, उनकी भलाई के काम में नहीं ही लग रही है जिस सर्वजन हिताय के बैंड पर भावनाभरे पॉलिटिकल एक्टिविस्‍ट ने ठेका लगाना शुरु किया था! वेल, कहीं चूक हो ही जाती है, अच्‍छी मंशाओंवाला राजनीतिक कार्यकर्ता ज़रा समय सन्‍न, अपनी समझदारी, समीक्षाओं में कुछ डिसऑरियेंटियाआ, फिर नये सिरे से अपने साज दुरुस्‍त करता है, नेताजी की कही बानी का नया गाना फिर रटा-रटाया सिरहाने रखकर, सुर सजाने लगता है. सवाल है चूक होती कहां है?

बड़ी मारामारी है. सब चोट खाये हैं. फलाने लोढ़ा सिंह और ढिकानी क्रांति कुमारी के ही पास कॉपीराइट नहीं है, मशलीपट्टम से मिशीगन तक फैले हुए जाने कहां-कहां के दिलदुखी हैं, सब अपने-अपने व्‍यवधानों में सामाजिक बेहतरी का सपना देखते, और संजोते रहते हैं, मगर समाज उन सपनों को ठीक-ठीक ‘प्‍लेस’ करके यथार्थ में बदल नहीं पाता, बदलने का काम बेसिकली, फिर, बाज़ार और उसके एजेंट ही करते दिखते हैं. फ्रंटलाइन के ताज़ा अंक में एजाज़ एहमद ने भारतीय गणतंत्र दिवस के बहाने याद किया ही है कि मूलत: एक किसानी समाज में व्‍यापक जनसमुह के बीच अधिकारों का हस्‍तांतरण नहीं हुआ तो देर-सबेर सत्‍ता बचाये रखने का इकलौता तरीका यही होगा कि सरकार इम्पिरियलिस्‍ट, नियोलिबरल सांठगांठ में पैरों के बीच पूंछ दबाये पीछे-पीछे चलती रहे. आज के भारतीय हालातों के लिए बाबू एजाज़ एहमद सीधे-सीधे नेहरुवियन नीतियों की व्‍यापक जनहिस्‍सेदारी से मुंहचुराई को जिम्‍मेदार बताते हैं. ख़ैर, नेहरुजी को जहां जाना था, गए, पीछे-पीछे खानदान की दो नस्‍लें और गईं, और भारतीय यथार्थ जो है नम्‍बूदिरिपाद, लोहिया, नक्‍सलवाद, जयप्रकाश, मंडल, मायावती, माओ ये और माओवादी वो के बाद अब भी बहुत कुछ उन्‍हीं शक्‍लों में खड़ा है जहां आज से पचास साल पहले उसका खड़ा होना साहित्‍य में मुक्तिबोध देख रहे थे, थोड़ा आगे जाकर धूमिल और रघुवीर सहाय ने हम देखना चाहनेवालों को दिखाया था, आपके हाथ में सेल फ़ोन और गोद में लैपटॉप भले आ गया हो, जीवन के मैटर करनेवाले दूसरे भयकारी भयानक गड्ढों की पुराई नहीं हुई, कोई बेसिक फर्क़ नहीं आया है. हमारे मित्र विमल बिना व्‍यभिचारी हुए व्‍याजभारी के रास्‍ते कारधारी हो गए हैं, तो ऊलजुलूल की राजनीतिक लाइनों की बकवास बकते बहुत सारे जनाभिमुखी राजनीतिक धड़ों के लीडरानों के घरों में भी आप देखियेगा, अच्‍छी मात्रा में पैसे चले आए हैं, और हमेशा जनता की नेक़नीयती और दयानतदारियों से ही आये हों, ज़रूरी नहीं. बीसेक साल पहले पैसे का इतना प्रपंची खेल नहीं था, अब हो गया है, जैसे बहुत सारे क्षेत्रों में एनजीओज़ के खेल हो गए हैं, यही इतना भर फर्क़ आया है, मेरे घर पैसा नहीं आया, न आपकी तरह मेरी गोद में लैपटॉप है, नुक्‍कड़ नाटकों तक के जड़कारी, क्रांतिकारी आइडिया को सत्‍ता-प्रतिष्‍ठान ले उड़े हैं और एनजीओस ने उसको स्‍थूल लॉलीपाप डेकोरेशन में बदल दिया है, और मध्‍यवर्ग जो है रहा होगा कभी परिवर्तन का अगुआ दस्‍ता, फिलहाल अपनी सहूलियतों के माया-मोह में जाने कहां किस घरैती में घुसा, छिपा हुआ है, जो किन्‍हीं व्‍यवस्थित सहूलियत में प्रॉपरली सेट नहीं हो पाया है वह बेचारा वही आम आमजन, सब जाननेवाली पब्लिक है जो सब जानते हुए दांत चियारे रहता है, कुछ कबार नहीं पाता, क्‍यों?

दिललगाये जान झोंके एक राजनीतिक कार्यकर्ता से भी उसे उसकी प्राइवेसी में घेरिये, पता चलेगा भले आदमी का दिमाग घनघनाया हुआ है, बीस तरह के ऑरिजनल विचार फूट रहे हैं, आप ही नहीं वह भी उतनी ही बखूबी से जानता है कि जातीय संगठनों, समीकरणों से जन-गन का उद्धार नहीं होनेवाला, ऐन ज़रुरत के मौके पर जातीय नेता अपने जाति के साथ नहीं, अपने आर्थिक हितों का ध्‍यान रखकर दलबंद होते हैं, इतना तो लातखायी जनता भी जानती है, मगर नेताओं की लामबंदी के मौके पर इसी घनघनाये दिमाग की बेचारगी देखिए, नेता बाबू की ‘दस वर्ष पहले हमारी यह चिरकुट लाइन थी और दस वर्ष बाद हम इस चिरकुट नतीजे पर पहुंचे हैं’ को सुनता हुआ वह फिर मूड़ी हिलाने और लगभग वही-वही बेहूदगी दोहराने लगता है. कभी बिंदास सामने आकर नेता बाबू से सवाल नहीं करता कि बीस वर्षों की राजनीति में आपका हासिल यही फकत इन दो लाइनों की चिरकुट समझ है? यही इतने भर कबारने के लिए आप राजनीति में आए थे? और वह आपके पैर में चमकदार सैंडल है वही वाली चमक हमारे पैर में क्‍यों नहीं है, महाराज? राजनीतिक कार्यकर्ता ऐसी कोई हिमाकत नहीं करता क्‍योंकि उसे अपने 'संशोधनवादी' पार्टी में 'संशोधनवादी' गिना लिये जाने का डर है!

नेता बाबू मंच से सुखी-सुखी थके-थके लाइन की बकवास बोलते रहते हैं, राजनीतिक कार्यकर्ता बकवास सुनने की आदत बनाता चलता है, (आनेवाले वर्षों में या तो वह यही बकवास अपने धीरज को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाता सुनता चलेगा, या हारकर पागल-दीवाना होकर होकर घर बैठ जाएगा, और पार्टी के पुराने साथी उसे 'संशोधनवादी-संशोधनवादी!' कहकर आपस में फुसफुसाये, मुस्‍करायेंगे, या ज्‍यादा जीवट वाला हुआ तो किसी नये दल में घुसेगा, डंडा चलायेगा, या फिर एक नयी हार हारकर दलाली करने लगेगा..). दल की बहुत सारी महत्‍वपूर्ण ऊर्जा एक-दूसरे को नव-क्रांतिकारी गिनवाने और नव-संशोधनवादी कहकर दुरदुराने में जाया होती रहती है, इस छोटे से चिल्‍ले, संकीर्ण परिदृश्‍य से बाहर के बड़े समाज में नोट काटनेवाली और काट-काटकर आपस में बांटनेवाली ताक़तें सुखी-सुखी अपना संसार चलाती रहती है, उन्‍हें क्रांति के इस लघु चिलम व गांजे से कोई विशेष्‍ा फर्क़ पड़ता, आता-जाता नहीं. मैं चेर्निश्‍वेस्‍की के ‘क्‍या करें’ और गोंचारोव के ‘ओब्लोमोव’ के बीच असमंजस में डोलता फिर यही तय करता हूं ओब्‍लोमोव की राह सोफ़े में गिरे, धंसे रहना क्रांतिकारी कृत्‍य भले न समझा जाये, कम से कम अपनी इमोशनल धकापेल में तक़लीफ़देह कम है.

पुनश्‍च: पहाड़ के कलाधर्मी साथियों के लिए अचानक प्राप्‍त हुई एक दु:खद सूचना यह है कि साथी निर्मल पांडे का आज हार्ट अटैक से देहावसान हुआ..

Wednesday, February 17, 2010

एक पुरानी दिलनहायी यारी की सोहबत में..

गोरखपुर गया था. अर्से से बहुत सारे दूसरे कामों के साथ-साथ यह भी एक छूटा पड़ा ‘पेंडिंग’ काम था, एक पुराने लापरवाह वादे की निबाही की जिम्‍मेदारी, सो ग़ैर-जिम्‍मेदार मैं, फ़ि‍ल्‍म-समारोह के अंधेरों में छुप सकने के सुभीते के साथ गोरखपुर गया. बड़े शहर के अलियनेटेड एकाकीलोक में मुंदे रहने की अभ्‍यस्‍तता के बाद, छोटे शहर के हंसोड़, ठिलन-नवाजी में उतरना, सामनेवाले के कंधे में उंगली धंसाकर बतरस के सुर में बने रहना, एक ख़ास तरह के हौसला, और हौसले से ज़्यादा हिम्‍मत की मांग करती है, फिर मैं पुराना असमंजसी, एप्रिहेंसिव आदमी. बालसुलभ हर समय नये विश्‍वास बुनना चाहता हूं, मगर साथ ही हर दसवें मिनट शुबहा भी होता है, और फिर रात को छाती पर हाथ धरे छत तकते हुए चहुंओर की हर शै हंसाने भी लगती है, सबसे ज़्यादा हंसी आती है अपने अन्‍तर में चमकते सुलगनकारी, अपने से बाहर, विस्‍तारकारी सामाजिक उद्दमों के कहीं पहुंच सकने की असंभाव्‍यता पर. मगर सफ़ेद कुर्ते-पाजामा सवारी, दाढ़ी के खूंटधारी कवि ने पंजाब से लेकर असम के चाय-बागानों तक नया ऐलान ठेल ही दिया है, कि ‘दिल तो बच्‍चा है..’ तो उस बच्‍चाधारी दिल के भोले लुभावनपन में सने मैं गया गोरखपुर..
हिन्‍दी के लुच्‍चालोक की सच्‍चाइयों से बहुत वाकिफ़ न रहनेवाले भी जानते हैं कि हिन्‍दी का बड़ा सारा साहित्यिक लोबान छोटे शहरों से ही प्राप्‍त होता रहा है. बड़े शहरों की मन उमेठती धमक साहित्‍य में उपस्थित हो सके, इसका एक सरलीकृत, भाववादी रोमानी गल्‍प कहीं-कहीं भाइयों ने बुन भले लिया हो, उसकी ऐसी कोई चमकदार प्रोसेसिंग नहीं हुई जिससे हम पोस्‍ट-नब्‍बे के हिंदुस्‍तान की साहित्‍य के चश्‍मे से कोई वाजिब पहचान बना सकें. हिन्‍दी आलोचना की ही तरह यह एक ऐसा लुच्‍चा, अघोषित वर्जित क्षेत्र है कि कवि पुनि:-पुनि: घबराकर मलय, मलबे, मलिनता के लघुकारी मोहों में छोटे शहर की ओर भागता है. छोटे शहरों के चाय-ठेलेवाले की आत्‍मीयता और रिक्‍शेवाले की हुज्‍जत अपने अपनापों के व्‍यभिचार में उसे आश्‍वस्‍त करती है. मुझे आश्‍वस्‍त करने के लिए मिठाई की दुकानें और अशोक चौधरी की विश्‍वविद्यालय के दिनों की पुरानी औधड़ यारी थी, मगर चूंकि यार से सन् 86 के बाद अब पच्‍चीस वर्षों के लम्बे फ़ासले पर 2010 में मिल रहा था, और बखूबी जानता था कि उसके औधड़ई के धुओं में उतर रहा था, ज़ाहिरन अलबलाया, घबराया हुआ भी था.
विगत पच्‍चीस वर्षों में मैं और कुछ नहीं तो पांच किताबें तो लिख ही सकता था, नहीं लिखा, बैंक से आते-जातों को लापरवाही से नज़रअन्‍दाज़ किये बादलों के फाहे गिनता रहा, अशोक के बारे में कभी ख़बर मिली तो यही इतना भर कि माले का पूर्णकालिक कार्यकर्ता हो गया है तो अब नहीं है, इस हिन्‍दी अख़बार से निकलकर उस दूसरे में पत्रकार हो गया है. इससे ज़्यादा मुझे ख़बर नहीं थी, अपने खोये में खोया, एक प्रादेशिक अख़बार के ख़बरकार के बेमतलब जीवन-प्रसंगों का मुझे यूं भी क्‍या करना था? फिर पच्‍चीस वर्षों का फ़ासला कम नहीं होता, जीवन की एक तिहाई होती है, अशोक के शोक-सुख की सुनी-सुनायी कल्पियायी कहानी बचपन में पढ़े किसी बिसरायी कहानी के कटे-फटे किस्‍सा लगते, ज़ि‍न्‍दा अशोक के सामने जाकर यूं यकबयक खड़े हो जाना किसी पुरानी तक़लीफ़ से रूबरू होने की आशंक जगाते, शायद इसीलिए गोरखपुर पहुंचने का न्‍यौता पिछले पांच वर्षों से पा रहा था, लेकिन निकल जाऊं इसके लिए ऐन वक़्त अपने को बचाये लिये भी जा रहा था!
सच पूछिये तो पुरानी दोस्तियों के सामने जाकर खड़ा हो जाना वैसे भी बड़े दु:स्‍साहस का काम है. जीवन में रोज़ हम बदलते रहते हैं (मेरे जैसा असमंजसी आदमी तो खुद को ही रोज़ पहचानने में अलबलाया रहता है!), फिर भी पहले का छूटा कोई एक तार होता है, कभी-कभी बड़े मीठे बजता है, कभी सीली लकड़ी के वाद्य सा कोई भी आवाज़ नहीं पैदा करता. दोनों ही बातें होती हैं, और दोनों के ही जितने मिठास हैं, कुछ वैसी ही खटास भी है.. दिल्‍ली में और दूसरी जगहों बहुत बार पुरानी दोस्तियों के सामने पड़ने पर बड़ी आसानी से मन में खटका बैठता है कि साथ की संगत के इस भाववादी समय में जकड़े हुए रोमानीपने का क्‍या उपचार किया जाए, तेजी से झटककर फेंक दिया जाए, या उस पर गर्म पानी का लोटा गिरा दिया जाए, हिन्‍दी के भावुक लुच्‍चालोक से ऐसे बेमतलब के भावुक बैगेज़ेस को कैसे बहरियाया जाए..
एक अच्‍छे दोस्‍त से हम क्‍या उम्‍मीद करते हैं? बहुत कुछ वही नहीं जो हम खुद से भी उम्‍मीद करते रहते हैं? मन की मुर्दनी में खोये, डरे, घबराये मुर्चीले होते, बेसबब की बौद्धिकताओं में बहलते, गोल-गोल चक्‍कर खाते बड़ी सारी यारियों से इसीलिए अच्‍छा लगा सीधे जाकर अशोक की खांटी अराजक, औधड़ई में मुंह के बल गिर जाना, अपनी जड़ों में बढ़े उसकी संलग्‍नता के बेसुरे गानों में कोई जीवन के अर्थ का मतलबी राग पढ़ते, बुनते रहना बजाय इसके कि एक छिटके से छूटकर दूसरे छंटाव की पस्‍त, थकायी में जाकर जाने कैसी, किन बेमतलब बतकहनियों में अपने को गंदाना..
शुक्रिया, अशोक, कि तुमने अपने शहर हमें बुलाया, हम गए, और तुम वही उसी पहचानी अपनी सुलगन में हमें पूरे, समूचे खालिस मिले..
आगे की बात पीछे और पीछे की आगे सजाकर यह अलग से एक छोटा पॉडकास्‍ट. अशोक के हरामीपन की बाबत. कि जो वह कर सकता था उसने किया नहीं, मतलब अपने यहां काम करनेवाली सोनाबाई की दुलरिनी बेटी, अशोक की अपनी मुंहबोली भतीजी, पांच साल की स्‍कूल न जानेवाली रेशमा से मुझे चार दिन दूर किये रखा, और सोने के लिए दो धुरंधर क्रांतिधमी-संस्‍कृतिकर्मियों के बीच धंसाकर छोड़ गया जो जागते तो जागते, सोते में भी कुछ खर्राट किस्‍म के बम दाग़े जाते थे.. मालूम नहीं ऐसे कुकृत्‍य के लिए अशोक को माफ़ किया जाना चाहिए या नहीं.. 



Tuesday, February 16, 2010

इतना भर..


छोटे शहर की यह इतनी मानवीयता होगी कि
रोज़ सुबह नौ को गुल होनेवाली बिजली
शिवरात्री के दिन लजा जाएगी, जा नहीं पाएगी.

फुन्‍नन मियां की विहंगम दिलनवाजी होगी कि
बार-बार ललकारे, दरकिनारे जाने पर, आजिज आकर
भाजपा शहर कमेटी के वह मेम्‍बर हो जाएंगे, फिर उसी मज़े
से पान कतरेंगे, बात-बेबात बेवज़ह मुस्‍करायेंगे.

मेरा यह इतने भर का ठसकपना होगा कि
पूर्णकालिक राजनीतिक कार्यकर्ताओं की संगत में
अलबल एकदम-से चुपा जाऊंगा, अच्‍छा होगा
आधी-अधूरी बेहुदई ठेलने की जगह
खड़े-खड़े अपने को सोता पाऊंगा.

Wednesday, February 10, 2010

गोरखपुरिये..

जीवन में क्‍या ज़रुरी है? माथे पर विचारों का जैतून-पात सजाये मैं बीहड़ बरगद-वन चढ़ जाता हूं (या कि अंधेरे, अनमने उतर जाता हूं), और कुछ समय बीतने के उपरांत फिर ध्‍यान आता है कि अरे, हम फिर घिरे? वृक्ष और वन में क्‍या बहकना जहां विचार के पौधों तो क्‍या, घास की गुंजाइश तक बड़ी मुश्किल से बनती है्. शहर की सफाई और मंडी में तरकारी की बिकाई-गंदाई में 'सपरायों' के दिमाग में मालूम नहीं क्‍या बिम्‍ब होगा कि जीवन में क्‍या जरुरी है, पड़ोस में बाबाओं के आश्रमों के लाउडस्‍पीकरों पर उच्‍चरित होता ही रहता है यह ज़रुरी है और वह ज़रुरी है, टीवी और अख़बारी पन्‍नों पर अभिषेक कुमार ज़रुरी-संसार की मानसूनी सदाबहार बरसाते रहते ही हैं, मन 'भीड़ में अकेला' कातर, कौतुक में फिर भी फुसफुसाता, पूछता चलेगा क्‍या ज़रुरी है, बोलो, बताओ!

मुंह में रसभरे बालुशाही की मिठास है, लौंगलत्‍ता और लालमोहन की है, और मुंह चलाते, सोचकर बालसुलभ प्रसन्‍नता ही होती है कि मीठे के पीछे अब भी 'दिल तो कुत्‍ता है' गुनगुनाने का सुरुर बचा है, मगर इस मुंहभरे औंजाये मीठे के आगे? जो ज़रुरी है उसके भूगोल की सफाई? उसके बोल ठीक-ठीक बनते हैं दिमाग में, उसका सुर, सूझता है?

बच्‍चों का एक दल रिक्‍शे में स्‍कूल से लौटता दिखता है. ज़रा ज़्यादा उम्र के बच्‍चे हैं साइकिलों पर ठिठोली करते कोचिंग से लौट रहे हैं, थोड़ा पीछे चार लड़कियों का साइकिली जत्‍था है, एक के टी-शर्ट पर ऐलानिया आवाह्न है, 'ग्रैब लाइफ़ बाइ हॉर्न्‍स', मैं बालिका के चेहरे पर ऐलान का कनेक्‍ट पढ़ने की कोशिश करता हूं तो वह सहेलियों की बात पर हंसती आगे निकल गई है. पीछे भोजपुरी सिनेमा की एक नई रिलीज़ का एक भीमकाय होर्डिंग दूसरा ही ऐलान चीख़ रहा है- 'निरुहवा नंबर वन!' मेरे बैग में असद ज़ैदी के 'थ्री एसेज़' के अच्‍छे प्रकाशकीय उद्यम की वसुधा डालमिया की एक पतली किताब अपने को पढ़वाने की राह तक रही है, मन में कुछ-कुछ वैरागी भाव से 'आनेवाले वक्‍तों में हिन्‍दी का अपने समाज से क्‍या संबंध बनेगा' की एक अलग ठुमरी सुनी जा रही है, उस ठुमरी को एक ओर ठेलियाता फिर खुद से पूछता हूं, हां, बॉस, बोलो, क्‍या ज़रुरी है जीवन में?

पूरा समाज तो पैसे को गा ही रहा है, इस गाने से अलग उसे शायद और कुछ भी समझ नहीं आ रहा, लेकिन अपनी असहूलियत में असहज होता, खुद को पैसे गिनता देखता मैं खुद पर भी लजाता, तज्‍जुबाता हूं कि देखो, किधर बहा जाता हूं, एक सवाल उठाकर ठीक-ठीक उसे तक फिर ढंग से कहीं सजा नहीं पाता हूं, मन पहले सा ही अकुलाया, बुदबुदाये पूछे जाता, ज़ि‍रह बुनवाता है कि, जीवन में क्‍या ज़रुरी है..