Wednesday, February 10, 2010

गोरखपुरिये..

जीवन में क्‍या ज़रुरी है? माथे पर विचारों का जैतून-पात सजाये मैं बीहड़ बरगद-वन चढ़ जाता हूं (या कि अंधेरे, अनमने उतर जाता हूं), और कुछ समय बीतने के उपरांत फिर ध्‍यान आता है कि अरे, हम फिर घिरे? वृक्ष और वन में क्‍या बहकना जहां विचार के पौधों तो क्‍या, घास की गुंजाइश तक बड़ी मुश्किल से बनती है्. शहर की सफाई और मंडी में तरकारी की बिकाई-गंदाई में 'सपरायों' के दिमाग में मालूम नहीं क्‍या बिम्‍ब होगा कि जीवन में क्‍या जरुरी है, पड़ोस में बाबाओं के आश्रमों के लाउडस्‍पीकरों पर उच्‍चरित होता ही रहता है यह ज़रुरी है और वह ज़रुरी है, टीवी और अख़बारी पन्‍नों पर अभिषेक कुमार ज़रुरी-संसार की मानसूनी सदाबहार बरसाते रहते ही हैं, मन 'भीड़ में अकेला' कातर, कौतुक में फिर भी फुसफुसाता, पूछता चलेगा क्‍या ज़रुरी है, बोलो, बताओ!

मुंह में रसभरे बालुशाही की मिठास है, लौंगलत्‍ता और लालमोहन की है, और मुंह चलाते, सोचकर बालसुलभ प्रसन्‍नता ही होती है कि मीठे के पीछे अब भी 'दिल तो कुत्‍ता है' गुनगुनाने का सुरुर बचा है, मगर इस मुंहभरे औंजाये मीठे के आगे? जो ज़रुरी है उसके भूगोल की सफाई? उसके बोल ठीक-ठीक बनते हैं दिमाग में, उसका सुर, सूझता है?

बच्‍चों का एक दल रिक्‍शे में स्‍कूल से लौटता दिखता है. ज़रा ज़्यादा उम्र के बच्‍चे हैं साइकिलों पर ठिठोली करते कोचिंग से लौट रहे हैं, थोड़ा पीछे चार लड़कियों का साइकिली जत्‍था है, एक के टी-शर्ट पर ऐलानिया आवाह्न है, 'ग्रैब लाइफ़ बाइ हॉर्न्‍स', मैं बालिका के चेहरे पर ऐलान का कनेक्‍ट पढ़ने की कोशिश करता हूं तो वह सहेलियों की बात पर हंसती आगे निकल गई है. पीछे भोजपुरी सिनेमा की एक नई रिलीज़ का एक भीमकाय होर्डिंग दूसरा ही ऐलान चीख़ रहा है- 'निरुहवा नंबर वन!' मेरे बैग में असद ज़ैदी के 'थ्री एसेज़' के अच्‍छे प्रकाशकीय उद्यम की वसुधा डालमिया की एक पतली किताब अपने को पढ़वाने की राह तक रही है, मन में कुछ-कुछ वैरागी भाव से 'आनेवाले वक्‍तों में हिन्‍दी का अपने समाज से क्‍या संबंध बनेगा' की एक अलग ठुमरी सुनी जा रही है, उस ठुमरी को एक ओर ठेलियाता फिर खुद से पूछता हूं, हां, बॉस, बोलो, क्‍या ज़रुरी है जीवन में?

पूरा समाज तो पैसे को गा ही रहा है, इस गाने से अलग उसे शायद और कुछ भी समझ नहीं आ रहा, लेकिन अपनी असहूलियत में असहज होता, खुद को पैसे गिनता देखता मैं खुद पर भी लजाता, तज्‍जुबाता हूं कि देखो, किधर बहा जाता हूं, एक सवाल उठाकर ठीक-ठीक उसे तक फिर ढंग से कहीं सजा नहीं पाता हूं, मन पहले सा ही अकुलाया, बुदबुदाये पूछे जाता, ज़ि‍रह बुनवाता है कि, जीवन में क्‍या ज़रुरी है..

10 comments:

  1. Masti zaroori hai aur vo aap chhan rahe ho ! jai ho lavanglata -lalmohan ki !

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  2. आपके लिखे को ओढ़ने-बिछाने को जी चाहता है...
    गज़ब है...दिमाग़ को मथ ड़ालते हैं...
    लाजवाब...

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  3. बहुत बढियाँ तो गोरखपुर में भी लौंगलता भेटा गया,आप वहां हैं और मैं आपकी पोस्ट पढ़ कर अपने बचपन को याद कर रहा था आखिर मेरे बचपन की बहुत सी समृतियाँ इस शहर से जुडी हैं ...मुंबई लौटने पर तफसील से वहाँ का हाल आपसे सुनना है|

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  4. काहे गोरखपुर की लाँगलता और लालमोहन याद दिलाये दे रहे हैं..एक तो बरफ में एसन ही जी हालाकान हुआ है और अदबादये से घूम रहे हैं लूँगी टांगे झुरियाये से हर के भीतर और उस पर आप..चैन से जीने दिजियेगा कि नहीं??

    कोई बड़ी बात नहीं कि कल को आप बथुआ का साग याद दिला दें.. :)

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  5. पूरा समाज तो पैसे को गा ही रहा है, इस गाने से अलग उसे शायद और कुछ भी समझ नहीं आ रहा, लेकिन अपनी असहूलियत में असहज होता, खुद को पैसे गिनता देखता मैं खुद पर भी लजाता, तज्‍जुबाता हूं कि देखो, किधर बहा जाता हूं,

    सर जी .....कभी कभी सोचता हूँ आपके मन को भी रस्सियों से बांध के रखना पड़ता होगा...कितने ख्याल अपने भीतर जमा रखता है ......पर कितने जरूरी .......


    ओर हाँ आखिरी तीन लाइने शायद यक्ष प्रशन है .

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  6. लौंगलता के साथ बालूशाही... का कम्बीनेशन है. जीवन में इहे त ज़रूरी है. और का हिमालय को उठाके सरका देगा का कोई? निरहुआ ता आजकल नंबर वन है ही. गोरखपुर में निरहुआ नंबर वन चल रहा है और हमरे शहर से अभी तक "निरहुआ इन लब" नहीं उतरा. एही सब ज़रूरी है. निरहुआ, बालूशाही, लौंगलता....बाकी सब ऐसेही चलेगा. गोरखपुर हो आ चाहे कलकत्ता.

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  7. इसका मतलब ये कि हमारे लौटने के बाद भी आप गोरखपुर में बालूशाही और लवंगलता का मज़ा लेते रहे. शायद तभी आप जल्दी नहीं लौटे. मज़ा कीजिए.

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  8. गोरखपुर जियरा के भेंटाय गवल का। वापस लौटे के कुल प्रोग्राम कैंसिल।

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  9. except "बालूशाही", I do not know what you are talking about?

    Please post some pictures too.

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  10. अरे भाई! कब चहुंपे आप गोरखपूर?

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