Tuesday, February 16, 2010

इतना भर..


छोटे शहर की यह इतनी मानवीयता होगी कि
रोज़ सुबह नौ को गुल होनेवाली बिजली
शिवरात्री के दिन लजा जाएगी, जा नहीं पाएगी.

फुन्‍नन मियां की विहंगम दिलनवाजी होगी कि
बार-बार ललकारे, दरकिनारे जाने पर, आजिज आकर
भाजपा शहर कमेटी के वह मेम्‍बर हो जाएंगे, फिर उसी मज़े
से पान कतरेंगे, बात-बेबात बेवज़ह मुस्‍करायेंगे.

मेरा यह इतने भर का ठसकपना होगा कि
पूर्णकालिक राजनीतिक कार्यकर्ताओं की संगत में
अलबल एकदम-से चुपा जाऊंगा, अच्‍छा होगा
आधी-अधूरी बेहुदई ठेलने की जगह
खड़े-खड़े अपने को सोता पाऊंगा.

16 comments:

  1. आपका भाषा मुझे बहुत सुन्दर लगती है। आपका कोई क्लेक्शन है? किस्सो कहानियों का? या कोई अन्य किताब?

    ReplyDelete
  2. बहुत खूब कहा आपने , ।

    ReplyDelete
  3. अद्भुत।

    एकदम-से चुपवा दिया आप ने।

    ReplyDelete
  4. अच्‍छा होगा आधी-अधूरी बेहुदई ठेलने की जगह खड़े-खड़े अपने को सोता पाऊंगा.

    लेकिन यहां ब्लॉग के चित्र में तो आप सोये सोये सो रहे हैं :)

    बढिया है। मस्त लिखा।

    ReplyDelete
  5. गोरखपुर से लौटकर ये कहां खो गए हुजूर?

    ReplyDelete
  6. @चन्‍दन बाबू,
    क्‍लेक्‍शनों आ रहा है, चिंता मत कीजिए, एक नहीं, चार-चार आयेंगे, बस कौन छाप रहा है पता चल जाने दीजिए, आपो को खबर करते हैं.

    ReplyDelete
  7. ई तो वही हाल हुआ कि कमरे का किराया दे देंगे, बस प्रकाशक का चेक आने भर की देर है।

    भईया प्रकाशक का चेक कब आएगा?
    अरे बस, उपन्‍यास लिखने भर की देर है। मैं लिखा नहीं कि भेजा नहीं कि बस आया नहीं।

    ReplyDelete
  8. कलेक्शन की हमें भी खबर कर देना..कहर दोस्तों पर भी जरुरी है. :) चीन यात्रा का कलेक्शन जरुरे हमें बताईयेगा..बहुते झेले हैं आपके साथ साथ..आप तो जानते ही हैं..

    आधी-अधूरी बेहुदई ठेलने की जगह
    खड़े-खड़े अपने को सोता पाऊंगा

    -ऐसेन गहन कवि हैं तो काहे नहीं एक ठो कविता संग्रह भी ठेल दें साथे.

    ReplyDelete
  9. देखिये ख़रीदार जुट रहे हैं.. सही है!

    ReplyDelete
  10. झकास लिखे है सर जी ..एक दम चक चक

    ReplyDelete
  11. हिंदी के दरिद्दर संसार में कम से कम ब्‍लॉग के साढ़े बारह साथियों के बीच अपना कविता संग्रह बिकना तय जानें।

    ReplyDelete
  12. मनीषा समझ रही हैं कि लोग खरीदने जमा हुए हैं..अरे, सब पहले से पहचान बैठाल रहे हैं कि फ्री वाली कॉपी मिल जाये. :)

    ReplyDelete
  13. दरअसल मुझे आपकी भाषा भली लगती है और शब्द नये इसलिये ही मैने पूछा था जरा।

    ReplyDelete
  14. चंदन मेरी तरह सरल हैं। मैं भी ऐसे सवाल मन में रखती हूं। पूछती इसलिए नहीं कि यह ब्लॉग भी एक किताब की तरह ही है।

    ReplyDelete
    Replies
    1. किताब नहीं, दुख उमड़ाये का सिलाव का खाजा है, अगली मरतबा बस पर चहड़ियेगा, त तीन गो झोली का अखबार में लपेट के रख लीजिएगा, हं!

      Delete