Wednesday, February 17, 2010

एक पुरानी दिलनहायी यारी की सोहबत में..

गोरखपुर गया था. अर्से से बहुत सारे दूसरे कामों के साथ-साथ यह भी एक छूटा पड़ा ‘पेंडिंग’ काम था, एक पुराने लापरवाह वादे की निबाही की जिम्‍मेदारी, सो ग़ैर-जिम्‍मेदार मैं, फ़ि‍ल्‍म-समारोह के अंधेरों में छुप सकने के सुभीते के साथ गोरखपुर गया. बड़े शहर के अलियनेटेड एकाकीलोक में मुंदे रहने की अभ्‍यस्‍तता के बाद, छोटे शहर के हंसोड़, ठिलन-नवाजी में उतरना, सामनेवाले के कंधे में उंगली धंसाकर बतरस के सुर में बने रहना, एक ख़ास तरह के हौसला, और हौसले से ज़्यादा हिम्‍मत की मांग करती है, फिर मैं पुराना असमंजसी, एप्रिहेंसिव आदमी. बालसुलभ हर समय नये विश्‍वास बुनना चाहता हूं, मगर साथ ही हर दसवें मिनट शुबहा भी होता है, और फिर रात को छाती पर हाथ धरे छत तकते हुए चहुंओर की हर शै हंसाने भी लगती है, सबसे ज़्यादा हंसी आती है अपने अन्‍तर में चमकते सुलगनकारी, अपने से बाहर, विस्‍तारकारी सामाजिक उद्दमों के कहीं पहुंच सकने की असंभाव्‍यता पर. मगर सफ़ेद कुर्ते-पाजामा सवारी, दाढ़ी के खूंटधारी कवि ने पंजाब से लेकर असम के चाय-बागानों तक नया ऐलान ठेल ही दिया है, कि ‘दिल तो बच्‍चा है..’ तो उस बच्‍चाधारी दिल के भोले लुभावनपन में सने मैं गया गोरखपुर..
हिन्‍दी के लुच्‍चालोक की सच्‍चाइयों से बहुत वाकिफ़ न रहनेवाले भी जानते हैं कि हिन्‍दी का बड़ा सारा साहित्यिक लोबान छोटे शहरों से ही प्राप्‍त होता रहा है. बड़े शहरों की मन उमेठती धमक साहित्‍य में उपस्थित हो सके, इसका एक सरलीकृत, भाववादी रोमानी गल्‍प कहीं-कहीं भाइयों ने बुन भले लिया हो, उसकी ऐसी कोई चमकदार प्रोसेसिंग नहीं हुई जिससे हम पोस्‍ट-नब्‍बे के हिंदुस्‍तान की साहित्‍य के चश्‍मे से कोई वाजिब पहचान बना सकें. हिन्‍दी आलोचना की ही तरह यह एक ऐसा लुच्‍चा, अघोषित वर्जित क्षेत्र है कि कवि पुनि:-पुनि: घबराकर मलय, मलबे, मलिनता के लघुकारी मोहों में छोटे शहर की ओर भागता है. छोटे शहरों के चाय-ठेलेवाले की आत्‍मीयता और रिक्‍शेवाले की हुज्‍जत अपने अपनापों के व्‍यभिचार में उसे आश्‍वस्‍त करती है. मुझे आश्‍वस्‍त करने के लिए मिठाई की दुकानें और अशोक चौधरी की विश्‍वविद्यालय के दिनों की पुरानी औधड़ यारी थी, मगर चूंकि यार से सन् 86 के बाद अब पच्‍चीस वर्षों के लम्बे फ़ासले पर 2010 में मिल रहा था, और बखूबी जानता था कि उसके औधड़ई के धुओं में उतर रहा था, ज़ाहिरन अलबलाया, घबराया हुआ भी था.
विगत पच्‍चीस वर्षों में मैं और कुछ नहीं तो पांच किताबें तो लिख ही सकता था, नहीं लिखा, बैंक से आते-जातों को लापरवाही से नज़रअन्‍दाज़ किये बादलों के फाहे गिनता रहा, अशोक के बारे में कभी ख़बर मिली तो यही इतना भर कि माले का पूर्णकालिक कार्यकर्ता हो गया है तो अब नहीं है, इस हिन्‍दी अख़बार से निकलकर उस दूसरे में पत्रकार हो गया है. इससे ज़्यादा मुझे ख़बर नहीं थी, अपने खोये में खोया, एक प्रादेशिक अख़बार के ख़बरकार के बेमतलब जीवन-प्रसंगों का मुझे यूं भी क्‍या करना था? फिर पच्‍चीस वर्षों का फ़ासला कम नहीं होता, जीवन की एक तिहाई होती है, अशोक के शोक-सुख की सुनी-सुनायी कल्पियायी कहानी बचपन में पढ़े किसी बिसरायी कहानी के कटे-फटे किस्‍सा लगते, ज़ि‍न्‍दा अशोक के सामने जाकर यूं यकबयक खड़े हो जाना किसी पुरानी तक़लीफ़ से रूबरू होने की आशंक जगाते, शायद इसीलिए गोरखपुर पहुंचने का न्‍यौता पिछले पांच वर्षों से पा रहा था, लेकिन निकल जाऊं इसके लिए ऐन वक़्त अपने को बचाये लिये भी जा रहा था!
सच पूछिये तो पुरानी दोस्तियों के सामने जाकर खड़ा हो जाना वैसे भी बड़े दु:स्‍साहस का काम है. जीवन में रोज़ हम बदलते रहते हैं (मेरे जैसा असमंजसी आदमी तो खुद को ही रोज़ पहचानने में अलबलाया रहता है!), फिर भी पहले का छूटा कोई एक तार होता है, कभी-कभी बड़े मीठे बजता है, कभी सीली लकड़ी के वाद्य सा कोई भी आवाज़ नहीं पैदा करता. दोनों ही बातें होती हैं, और दोनों के ही जितने मिठास हैं, कुछ वैसी ही खटास भी है.. दिल्‍ली में और दूसरी जगहों बहुत बार पुरानी दोस्तियों के सामने पड़ने पर बड़ी आसानी से मन में खटका बैठता है कि साथ की संगत के इस भाववादी समय में जकड़े हुए रोमानीपने का क्‍या उपचार किया जाए, तेजी से झटककर फेंक दिया जाए, या उस पर गर्म पानी का लोटा गिरा दिया जाए, हिन्‍दी के भावुक लुच्‍चालोक से ऐसे बेमतलब के भावुक बैगेज़ेस को कैसे बहरियाया जाए..
एक अच्‍छे दोस्‍त से हम क्‍या उम्‍मीद करते हैं? बहुत कुछ वही नहीं जो हम खुद से भी उम्‍मीद करते रहते हैं? मन की मुर्दनी में खोये, डरे, घबराये मुर्चीले होते, बेसबब की बौद्धिकताओं में बहलते, गोल-गोल चक्‍कर खाते बड़ी सारी यारियों से इसीलिए अच्‍छा लगा सीधे जाकर अशोक की खांटी अराजक, औधड़ई में मुंह के बल गिर जाना, अपनी जड़ों में बढ़े उसकी संलग्‍नता के बेसुरे गानों में कोई जीवन के अर्थ का मतलबी राग पढ़ते, बुनते रहना बजाय इसके कि एक छिटके से छूटकर दूसरे छंटाव की पस्‍त, थकायी में जाकर जाने कैसी, किन बेमतलब बतकहनियों में अपने को गंदाना..
शुक्रिया, अशोक, कि तुमने अपने शहर हमें बुलाया, हम गए, और तुम वही उसी पहचानी अपनी सुलगन में हमें पूरे, समूचे खालिस मिले..
आगे की बात पीछे और पीछे की आगे सजाकर यह अलग से एक छोटा पॉडकास्‍ट. अशोक के हरामीपन की बाबत. कि जो वह कर सकता था उसने किया नहीं, मतलब अपने यहां काम करनेवाली सोनाबाई की दुलरिनी बेटी, अशोक की अपनी मुंहबोली भतीजी, पांच साल की स्‍कूल न जानेवाली रेशमा से मुझे चार दिन दूर किये रखा, और सोने के लिए दो धुरंधर क्रांतिधमी-संस्‍कृतिकर्मियों के बीच धंसाकर छोड़ गया जो जागते तो जागते, सोते में भी कुछ खर्राट किस्‍म के बम दाग़े जाते थे.. मालूम नहीं ऐसे कुकृत्‍य के लिए अशोक को माफ़ किया जाना चाहिए या नहीं.. 



10 comments:

  1. गोरखपुर भी हो आए! परन्तु हमें क्यों इतने सारे लिंक्स की भूल भुलैय्या में घुमा लाए कि क्या टिपियाना था ही भूल गई? खैर, अगली बार।
    घुघूती बासूती

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  2. क्या बात है जी। एकदम हमको भी कुछ पुराना सा याद आने लगा है।

    गर्मीयों में छत पर पडे हुए तारों का टूटना देखते थे, कभी कभार एक गूँगा जहाज निकल जाता था चुपचाप। इधर जमीं पर कंटीया फसाये होने से कभी किसी ओर ट्रांसफार्मर के भडाक से उडने की आवाज आती और उस ओर उजाला हो जाता। छत पर सोते ही सोते कहते - लो मजा, ट्रांसफारमर तो उड गया। और तभी आकाश में कहीं से एक लुक्क छूटता .....मन कहता ......मनौती।

    छत पर तो औंधे पडे होने में भी वहां एक सुख है।

    लेकिन ई बम्मई ....धूप सिंकोड कर खिडकियों से पीस दर पीस काट कर मिलती है धूप.....

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  3. पॉडकास्‍ट कमाल है। आप तो खैर हैं ही हैं। बाकी वहां और क्‍या क्‍या हुआ, के बाबत भी कुछ ज्ञान देंगे कि बस परसाई जी वाली मुद्रा ही धरे रहेंगे।
    और दादा, सीली लड़की है या लकड़ी। आप भी न कनफ्यूज करते रहते हैं।

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  4. कैसे लिख लेते हैं इतना सब कुछ ....आपको सलाम.

    पोडकास्ट कमाल का है.

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  5. मैं बिल्कुल ऐसे ही लिखना चाहता हूं। जैसे आप लिखते हैं।

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  6. Are bhai Ashutosh Aligarhi ke khararaoton ne to kamaal hi kar diya. Sona ki bitiya se ki gayi batcheet bhi majedaar hai bas yahi laga ki bahut jaldi yah podcast khatam ho gaya.

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  7. खर्राटों का कापीराईट तो इन्ही खुर्राटों के पास होगा, आप ने कैसे टेप लिया?इसे कहतें हैं चोरी और सीनाजोरी!बहरहाल ,पोस्ट पढ़ कर 'प्रतीत होता' है, मुंबई से गोरखपुर जाना भी किसी छोटी मोटी क्रांतिकारी कार्रवाई से कम नहीं. मुबारक हो.

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  8. मस्त भाई..आनन्द आ गया.

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  9. सर,
    एक लंबे समय बाद मैं कुछ टिप्पणी कर रहा हूं, आपके
    ब्लॉग पर, लेकिन मूल सवाल यही कि कैसे आप इतना जीवंत और अपने अंदर से बहता हुआ लिख लेते हैं, मैं भी सीखना चाहूंगा

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