Thursday, February 18, 2010

ठिल-ठिल की राज और नीति..

जनहित के आशयोंवाली भीड़भरायी जमघटों में बैकग्राउंड में गाना बजता रहता है ‘ये जो पब्लिक है सब जानती है’, उत्‍साही एक्टिविस्‍ट बेसुरा गुनगुनाता घुटने थपथपाता भी रहता है, हां, हां, जानती है, जानती है, नेताजी ने राजनीतिक समीक्षा की सही शब्‍दावली सजवाकर सही पोस्‍टर बनवाया था, हम सही-सही छपवाकर सही-सही जगह चिपकवा भी आये हैं, मगर जानते रहने की इस उत्‍फुल्लित पृष्‍ठभूमि में सार्वजनिक सामाजिक कार्रवाइयों के जब मौके निकलते हैं तो फिर यही दिखता है कि सत्‍ता जिनके हाथ से भी निकलकर जिनके बीच भी पहुंची और अब नयी शक्‍लों में घूम रही है, उनकी भलाई के काम में नहीं ही लग रही है जिस सर्वजन हिताय के बैंड पर भावनाभरे पॉलिटिकल एक्टिविस्‍ट ने ठेका लगाना शुरु किया था! वेल, कहीं चूक हो ही जाती है, अच्‍छी मंशाओंवाला राजनीतिक कार्यकर्ता ज़रा समय सन्‍न, अपनी समझदारी, समीक्षाओं में कुछ डिसऑरियेंटियाआ, फिर नये सिरे से अपने साज दुरुस्‍त करता है, नेताजी की कही बानी का नया गाना फिर रटा-रटाया सिरहाने रखकर, सुर सजाने लगता है. सवाल है चूक होती कहां है?

बड़ी मारामारी है. सब चोट खाये हैं. फलाने लोढ़ा सिंह और ढिकानी क्रांति कुमारी के ही पास कॉपीराइट नहीं है, मशलीपट्टम से मिशीगन तक फैले हुए जाने कहां-कहां के दिलदुखी हैं, सब अपने-अपने व्‍यवधानों में सामाजिक बेहतरी का सपना देखते, और संजोते रहते हैं, मगर समाज उन सपनों को ठीक-ठीक ‘प्‍लेस’ करके यथार्थ में बदल नहीं पाता, बदलने का काम बेसिकली, फिर, बाज़ार और उसके एजेंट ही करते दिखते हैं. फ्रंटलाइन के ताज़ा अंक में एजाज़ एहमद ने भारतीय गणतंत्र दिवस के बहाने याद किया ही है कि मूलत: एक किसानी समाज में व्‍यापक जनसमुह के बीच अधिकारों का हस्‍तांतरण नहीं हुआ तो देर-सबेर सत्‍ता बचाये रखने का इकलौता तरीका यही होगा कि सरकार इम्पिरियलिस्‍ट, नियोलिबरल सांठगांठ में पैरों के बीच पूंछ दबाये पीछे-पीछे चलती रहे. आज के भारतीय हालातों के लिए बाबू एजाज़ एहमद सीधे-सीधे नेहरुवियन नीतियों की व्‍यापक जनहिस्‍सेदारी से मुंहचुराई को जिम्‍मेदार बताते हैं. ख़ैर, नेहरुजी को जहां जाना था, गए, पीछे-पीछे खानदान की दो नस्‍लें और गईं, और भारतीय यथार्थ जो है नम्‍बूदिरिपाद, लोहिया, नक्‍सलवाद, जयप्रकाश, मंडल, मायावती, माओ ये और माओवादी वो के बाद अब भी बहुत कुछ उन्‍हीं शक्‍लों में खड़ा है जहां आज से पचास साल पहले उसका खड़ा होना साहित्‍य में मुक्तिबोध देख रहे थे, थोड़ा आगे जाकर धूमिल और रघुवीर सहाय ने हम देखना चाहनेवालों को दिखाया था, आपके हाथ में सेल फ़ोन और गोद में लैपटॉप भले आ गया हो, जीवन के मैटर करनेवाले दूसरे भयकारी भयानक गड्ढों की पुराई नहीं हुई, कोई बेसिक फर्क़ नहीं आया है. हमारे मित्र विमल बिना व्‍यभिचारी हुए व्‍याजभारी के रास्‍ते कारधारी हो गए हैं, तो ऊलजुलूल की राजनीतिक लाइनों की बकवास बकते बहुत सारे जनाभिमुखी राजनीतिक धड़ों के लीडरानों के घरों में भी आप देखियेगा, अच्‍छी मात्रा में पैसे चले आए हैं, और हमेशा जनता की नेक़नीयती और दयानतदारियों से ही आये हों, ज़रूरी नहीं. बीसेक साल पहले पैसे का इतना प्रपंची खेल नहीं था, अब हो गया है, जैसे बहुत सारे क्षेत्रों में एनजीओज़ के खेल हो गए हैं, यही इतना भर फर्क़ आया है, मेरे घर पैसा नहीं आया, न आपकी तरह मेरी गोद में लैपटॉप है, नुक्‍कड़ नाटकों तक के जड़कारी, क्रांतिकारी आइडिया को सत्‍ता-प्रतिष्‍ठान ले उड़े हैं और एनजीओस ने उसको स्‍थूल लॉलीपाप डेकोरेशन में बदल दिया है, और मध्‍यवर्ग जो है रहा होगा कभी परिवर्तन का अगुआ दस्‍ता, फिलहाल अपनी सहूलियतों के माया-मोह में जाने कहां किस घरैती में घुसा, छिपा हुआ है, जो किन्‍हीं व्‍यवस्थित सहूलियत में प्रॉपरली सेट नहीं हो पाया है वह बेचारा वही आम आमजन, सब जाननेवाली पब्लिक है जो सब जानते हुए दांत चियारे रहता है, कुछ कबार नहीं पाता, क्‍यों?

दिललगाये जान झोंके एक राजनीतिक कार्यकर्ता से भी उसे उसकी प्राइवेसी में घेरिये, पता चलेगा भले आदमी का दिमाग घनघनाया हुआ है, बीस तरह के ऑरिजनल विचार फूट रहे हैं, आप ही नहीं वह भी उतनी ही बखूबी से जानता है कि जातीय संगठनों, समीकरणों से जन-गन का उद्धार नहीं होनेवाला, ऐन ज़रुरत के मौके पर जातीय नेता अपने जाति के साथ नहीं, अपने आर्थिक हितों का ध्‍यान रखकर दलबंद होते हैं, इतना तो लातखायी जनता भी जानती है, मगर नेताओं की लामबंदी के मौके पर इसी घनघनाये दिमाग की बेचारगी देखिए, नेता बाबू की ‘दस वर्ष पहले हमारी यह चिरकुट लाइन थी और दस वर्ष बाद हम इस चिरकुट नतीजे पर पहुंचे हैं’ को सुनता हुआ वह फिर मूड़ी हिलाने और लगभग वही-वही बेहूदगी दोहराने लगता है. कभी बिंदास सामने आकर नेता बाबू से सवाल नहीं करता कि बीस वर्षों की राजनीति में आपका हासिल यही फकत इन दो लाइनों की चिरकुट समझ है? यही इतने भर कबारने के लिए आप राजनीति में आए थे? और वह आपके पैर में चमकदार सैंडल है वही वाली चमक हमारे पैर में क्‍यों नहीं है, महाराज? राजनीतिक कार्यकर्ता ऐसी कोई हिमाकत नहीं करता क्‍योंकि उसे अपने 'संशोधनवादी' पार्टी में 'संशोधनवादी' गिना लिये जाने का डर है!

नेता बाबू मंच से सुखी-सुखी थके-थके लाइन की बकवास बोलते रहते हैं, राजनीतिक कार्यकर्ता बकवास सुनने की आदत बनाता चलता है, (आनेवाले वर्षों में या तो वह यही बकवास अपने धीरज को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाता सुनता चलेगा, या हारकर पागल-दीवाना होकर होकर घर बैठ जाएगा, और पार्टी के पुराने साथी उसे 'संशोधनवादी-संशोधनवादी!' कहकर आपस में फुसफुसाये, मुस्‍करायेंगे, या ज्‍यादा जीवट वाला हुआ तो किसी नये दल में घुसेगा, डंडा चलायेगा, या फिर एक नयी हार हारकर दलाली करने लगेगा..). दल की बहुत सारी महत्‍वपूर्ण ऊर्जा एक-दूसरे को नव-क्रांतिकारी गिनवाने और नव-संशोधनवादी कहकर दुरदुराने में जाया होती रहती है, इस छोटे से चिल्‍ले, संकीर्ण परिदृश्‍य से बाहर के बड़े समाज में नोट काटनेवाली और काट-काटकर आपस में बांटनेवाली ताक़तें सुखी-सुखी अपना संसार चलाती रहती है, उन्‍हें क्रांति के इस लघु चिलम व गांजे से कोई विशेष्‍ा फर्क़ पड़ता, आता-जाता नहीं. मैं चेर्निश्‍वेस्‍की के ‘क्‍या करें’ और गोंचारोव के ‘ओब्लोमोव’ के बीच असमंजस में डोलता फिर यही तय करता हूं ओब्‍लोमोव की राह सोफ़े में गिरे, धंसे रहना क्रांतिकारी कृत्‍य भले न समझा जाये, कम से कम अपनी इमोशनल धकापेल में तक़लीफ़देह कम है.

पुनश्‍च: पहाड़ के कलाधर्मी साथियों के लिए अचानक प्राप्‍त हुई एक दु:खद सूचना यह है कि साथी निर्मल पांडे का आज हार्ट अटैक से देहावसान हुआ..

6 comments:

  1. तमाम वाद ये वाद फलाना वाद, ढेकाना वाद सब तो चलते ही रहता है। आम जनता एक जूनून के तहत इसमें उसमे कभी कभार हो आती है। कभी वह सपाई जोर मारती है तो कभी ललुवाई....कभी संघी और कभी कंघी (फिल्म स्टारों को देख उन्हें वोट दे देना)।

    लेकिन एक बडा तबका इन तमाम वाद-फवाद के बीच भी निष्पक्ष हो अपना काम करता रहता है। ट्रक पर लिखा रहेगा - रामकली भर के चली तो अभी एक रिक्शे के पीछे सिप्झ इलाके में लिखा देखा - नोट छापो टांग से

    मैं इस नोट छापो टांग से का मतलब ढूंढते रहता हूँ , एक मतलब निकलता है कि गाडी चलाते वक्त पैरों का यथासमय सही उपयोग करो, इंधन बचाओ.....एक मतलब निकलता है कि जो आए उसे टांग दिखाओ, अपना काम बनाओ.....लोकल डाईलेक्ट में कहूं तो अपना काम बनता....मां *** जनता।

    अब जनता भी इन सब चीजों को समझने लगी है, सो वह भी टांग दिखाने लगी है। ऐसे में सारे वाद निर्विवाद रूप से खुद-ब-खुद अपवाद हो रहे हैं।

    बहुत उम्दा पोस्ट।

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  2. सब धका पेल मे है अपनी अपनी आने वाली नस्लों की सेटिंग मे व्यस्त ....... देश की किसको फुरसत? बेचारा कौन से पिलर से लटका पड़ा है ....कौन जाने ....

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  3. निर्मल पांडे जी के बारे में जानकार बहुत दुख हुआ.

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  4. Its been a long time since I last saw him, I am dumbfounded with this shocking news.

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  5. दस वर्ष बाद का नतीजा जाने क्या होगा..? नतीजो के कोपीराईट किसके पास होंगे..

    निर्मल पांडे का जाना दुखद रहा..

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