दो चीज़ें यहां अपने रेफ़रेंस के लिए टांक रहा हूं, पहली कुछ दिनों पहले गोरखपुर में फ़िल्मकार
कुंदन शाह से की
भूपेन की
बातचीत है, भूपेन की बेतैयारी के सवालों का जहां कुंदन की ओर से दिया गया बड़े धीरज, सलीके और व्यापक संदर्भों को समेटे बड़ी समझदारी के विस्तृत जवाब हैं. दूसरी चीज़ फैज़ के पाठ पर इलाहाबाद विश्वविद्यालय में हिंदी के अध्यापक प्रणय कृष्ण की छपी सिलसिलेवार
टिप्पणी है.