
गाढ़ी रातों में आदमी बहेलिये की तरह कहीं बहुत दूर अपने में कुछ ढूंढ़ता बाहर जाता है, मछुआरे के जाल-सा गहरे कहीं उतरा डूबा हुआ, ख़ामोश. रात की परछाइयां पानी में ‘गुड़प’ डोलती हैं, ऊपर आती हैं. सोयी मछलियों के सिलसिले किस दावत की किस अफ़ीम ने हमको हमारी मोहब्बत में ऐसा नाकार बना दिया! की बेकली का गाना फुसफुसाते हैं अपने सपनों, सोये जल का नील छांह-नहाया आंगन सजाते हैं. आदमी मंत्रमुग्ध इंतज़ार करता है.
औरत की साड़ी के किसी कोर खंसा होता है कहीं अनदिखता वह ज़रा-सा इंतज़ार. काम की मेज़ पर झुकी वह काम, काम लिखे जाती है, फिर सिर पर हाथ धरे पढ़ती तो पढ़ा जाता इंतज़ार.. औरत को अच्छा नहीं लगता इस तरह अपना काम में जिये जाना, जीने में जाने वह क्या है किसलिए है के इंतज़ार को अपने से बारहा हटाते, अपने में फिर-फिर वही गुंथा पाना. हाथ से लगकर दवात उछलता है, नीली सियाही आंख के भौं और हाथ की उंगलियों को नीला कर जाती है. औरत थककर बटुआ उठाती है.
रात की पीठ पर आदमी एक के बाद एक जाने कितने अनप्रोसेस्ड सूत्र टीपता चलता है, उमगता औरत को बताता, इतने सारे संगीत के बीच खड़ा क्यों भूलता रहता बार-बार मैं अपना तरन्नुम, इस भूले में तुम मुझे कहां छोड़े जाती हो? औरत लंबी सांस लेगी, चुप रहकर कहेगी भागते रहते हो हर वक़्त, दिखता है मेरा संगीत कहां मुंहछुपाये खड़ा है, कभी उसे पास बुलाते हो? अंजुरियों की कोमलता में थामे उन्हें अपने नेह में नहलाते?..
फीकी मुस्कराहट में लिपटी औरत कांपते सुर धीमे संभलकर अपने शब्द सजायेगी, ‘सच जानो, सब समय चाहती हूं तुम तरन्नुम में रहो, हमारा भला हो, और फिर सब समय पाती हूं कि मेरे बोलने में गाना खराब होता है, कब तुम्हारे काम आती हूं? तुम हर वक़्त टांगे रहते हो गले में हारमोनियम मैं एक ज़रा-सी बांसुरी तक कहां उठा पाती हूं? दिखता नहीं तुम्हें? इतने सारे संगीत के बीच कहीं दिखती हूं मैं?
(जारी..)