Sunday, February 21, 2010

जाने किस काले समय में..


‘सहरा के चेहरे पर क्‍या भाव हैं? क्‍या किस तरह के भेद बंद हैं इन आंखों में सहरा कभी कुछ बोलती क्‍यों नहीं?’ सूती का सफ़ेद दुपट्टा सहरा की सांवली कलाई के दबे रंगोंवाली चुड़ि‍यों पर ज़रा-सा कांपकर फिर थिर हो जाएगा, मंजुनाथ का मन नहीं होगा, एक आलोड़न से निकल फिर दूसरे में डूबने लगेगा. और ऐसा नहीं कि सहरा सामने बैठी हो और अपने चुप रहने में अस्थिर मंजुनाथ को और उद्वि‍ग्न कर रही हो, नहीं, सहरा कहीं नहीं होगी, मगर उससे क्‍या फर्क़ पड़ेगा, उसका ख़्याल जंगली अमरुद में कीड़े की तरह हर वक़्त मंजुनाथ के होने में गुंथा होगा, साथ की ज़रुरत क्‍यों होगी?, नहीं होगी.
जैसे वर्तमान के किसी पूर्व-परिभाषित, स्थिर, स्‍टैटिक बिम्‍ब के बंधाव की न हो पाएगी, वर्तमान लगातार छिटक-छिटककर अलग-अलग काल खण्‍डों में अपनी यात्राएं करने लगता होगा, और मंजुनाथ अबस उस बहाव में स्‍वयं को भूले सहरा को खोजते होंगे, और तब बहुत मर्तबा ऐसा भी होता होगा कि सहरा वर्तमान में मंजुनाथ के सामने बैठी होती होगी लेकिन वह अपनी समय-भटकन में उस वर्तमान तक पहुंच न पाते होंगे?
जैसे फ़ि‍लहाल मंजुनाथ को अपनी आंखों के आगे सहरा नहीं, एक लहरदार, ठाठ में पंख फैलाये मोर कच्‍ची, मटैली सड़क पार करता दिखा. मंजुनाथ दृश्‍य की भव्‍यता में भरे आंखें मलकर दुबारा तकने को हुए तो पैरों के नीचे संकरे ईंटों की पुरानी, इस्‍पाहानी किसी और समय की सख़्त, चौड़ी सड़क महसूस हुई, ज़रा दूर एक वृहताकार जानवर एक करवट गिरा दिखा, नज़दीक जाकर देखने पर दिखता एक सिरकटे घोड़े की लाश थी, बहुत सारा सूखा काला होता खून था, एक ज़रा-ज़रा सी खुली कहानी थी जिसमें अभी और कुछ आयाम जुड़ने थे.
घबराये मंजुनाथ ने आंखें मूंद लीं. क्‍या करे, किस सुबह, कैसी सांझ, क्‍या समय, कैसी हवा में वह सहरा को छिपाये लिए जाए कि खौफ़ में एक अदद आदमी की इक ज़रा-सी अच्‍छाई का दम न फूलने लगे, कोई हंसे तो अपनी हंसी में हंसने जैसा हंसे, कोई कहे तो.. मगर सहरा कहां कुछ कहती है? हर बखत चुप रहती है. चुप, चुप, चुप.
चुप समय, हां. अलग-अलग समयों में घूमते सुस्थिरता के किसी क्षण मंजुनाथ से पहचानने में भूल नहीं होती कि उनकी मुश्किल की एक वज़ह यह भी है कि बहुत सारे बोलते वक़्त में उनके समाज का वर्तमान दरअसल एक चुप समय है. हां. देश भर के चहेते इतने बड़े फ़ि‍ल्‍मी स्‍टार, सुपरस्‍टार हैं, सारे-सारे समय बकवास बकते रहते हैं, अपने निहायत क्षुद्र अर्थ-स्‍वार्थों से परे किसी भी ज़रूरी सामाजिक मसले पर हमेशा चुप रहते हैं. शर्म नहीं आती, हंसते रहते हैं, उनकी संगत में पूरा समूचा मुल्‍क बेहयायी में हाथ गिराये हंसता, खुश होता है, कमज़ोर की गरदन रेती जाती है, लाल खून की नदी फैलती रहती है, खून को ठहरकर काला होने की फ़ुरसत नहीं बनती, अलबत्‍ता समय पर काला रंग चढ़ता चलता है. हिंदी सिनेमा के जाने कौन-कौन होते हैं, अजिताभ, नरप्रताप सुनहले परदे पर इसकी ये और उसकी वो कर देने की हेकड़ी ठेले रहते हैं, मगर सब अंतत: धंधे के उनके अपने दो कौड़ि‍या फ़ायदे के लिए ही होता है, हिंदी सिनेमा लाख दांत पीस-पीसकर भी एक मारलन ब्रांडो, जॉर्ज क्‍लूनी, सॉन पेन पैदा नहीं कर पाता..
जैसे सहरा फिर बोल नहीं पाती, जैसे मंजुनाथ कैसी भी सुरमई सांझ हो, प्रसन्‍न–मदन हो नहीं पाता..
‘सहरा, तुम कुछ बोलती क्‍यों नहीं?’, मंजुनाथ आखिर हारकर कहता है सहरा जिसे सुन नहीं पाती.
‘मैं हर समय बोल ही तो रही हूं’, सहरा चुप रहकर जवाब देती है.

1 comment:

  1. मंजू नाथ अब सकोच व्हिस्की के बाद या किसी कोफ़ी की टेबल में बहसों -मुबाहिसो में शामिल नाम भर है ..... प्रेक्टिकल्टी में" साली मोरालिटी इतनी होनी चाहिए के अफोर्ड की जा सकी "का बोर्ड इस देश के आई ए एस ...अकादमी बोर्ड में में गेट पर हेरी पोर्टर के किसी अद्रश्य बोर्ड सा टंगा है.....


    आज दिल ले गए सर जी...

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