
औरत कहती है मन की रेल पर ये जो तुम हसरतों की ऐसी मीठी, पगलायी लतरें बिछाये जाते, कुछ सूझता है मुझे कहां-कहां खींचे लिए जाते हो? यह समय है और कितना अच्छा है हम ज़िन्दा हैं, मगर फिर?
'फिर क्या?', आदमी हंसता है चार वर्ष के बच्चे-सी निष्पाप हंसी. बेवकूफ़, भूला हुआ कि किस भूले से आया है किस भटकन जायेगा, कि मोहब्बत की देह के हाड़-मांस नहीं होता, कि ख़्यालों के मीठन में संजोकर रोपे पौधे के ज़रा-सी हवा की कमी कितना तकलीफ़ देगी, मन मुंह को आयेगा, सांस खुद से छूटी-छूटी सी जाएगी. फिर क्या नहीं सोचता आदमी, सिर्फ़ बच्चे-सी हंसी हंसता है. बेवकूफ़.
औरत दूर तक देखे जाती और दूर तक सोचती दंग होती है. जब और सोचना दिल को डुबाने लगता है तो आदमी के ख़्यालों की महीन रेशोंवाली चटाई पर गिरकर ढेर होती है, अपनी खुशी में मीठे उदास, उस उदासी मेंमदहोश, मानो वह हथेली पर दिये गए ज़रा-से समय को नहीं जी रही, ताउम्र ख़त्म न होनेवाले शराब पी रही हो, और फिर अपने को वैसा बोलता सुनती जिस मिठास को हवाओं में महसूसती वह लगभग बेहोश हुई जाती हो, ‘लो, मैं अपनी जिरह में तुमसे हारी, अब?’
आदमी सुरीलेपन के महीन तागों पर खुशियों की बहुत दूर तक उड़ाई पतंग की संगत में डूबा चला जाता, और फिर उसी तेज़ी से वापस लौटा आता, ‘तुम बताओ!’
अपने में भूली हुई औरत जवाब नहीं देती, सिर्फ़ देखती देखे चली जाती, हवा में टटोलती हरफों का एक भोला मजमून बनाती, धीमे-धीमे फिर बुदबुदाती, ‘यह अनमने, असमंजस का हिसाब अच्छा नहीं ठीक-ठीक बता दो तुम्हारे बारे में कितना सोचें. कम सोचते हों ज्यादा कर दें और ज्यादा हो रहा हो तो कम कर दें स्केल बाहर करो आज ठीक-ठीक हिसाब कर ही लें. दफ़्तर के समय की तरह तय वक़्त शुरू करें और घड़ी देखकर तुम्हें दिमाग़ से उतार दें? दायें देखें तो तुमको और बस तुमको ही देखे जाएं ओर बायें भुला दें सब, ऐसा? सब्जियों पर से छिलके की तरह हटा दें, किताबों में जो कहीं नज़र आओ मिटा दें. दूर तक सड़क पर बेसुध चलते चले जाएं और तुम्हारी हर बात को हवा में उड़ा दें. बोलो न, अकेले कितनी दूर निकल जाएं आगे फिर कहां ठहरकर सिरा पकड़ें, करें सोचना शुरू और कितना सोचें. निर्जन रात में कपाटों के बीच बंद कर दें सुबह के उजाले तुमको चादर ढंक दें. हंसते-हंसते सोचकर अन्यमनस्क उदासी में बदल दें, बीस शब्द सोचकर बाईस खारिज़ करें, बोलो न, कितना सोचें. किस रंग में सोचें और किस रंग में सोचने से बचकर निकल जाएं. सोच का हल्कापन बनाए रखें और इतना न ऊपर जाएं कि भार के नीचे दब जाएं. कितनी भाषाओं में पढ़ें तुमको और कितनों में भूल जाएं, बोलो न, कितने शब्दों और कितनी सभ्यताओं में सोचें तुमको?
(जारी..)