Friday, February 26, 2010

होगा जैसा जितना..

होंगी बहुत सारी कभी बर्फ़ की बरसात नहीं होगी

जैसे स्निग्‍ध सितारों की आभा हमारी आत्‍माओं पर

झरे सारी रात झरती रहे, खुले में नंगे पैर भागें वो

सचमुच की चांदनी रात सी रात कब होगी, नहीं होगी

दिखेगा जीवन नाखुश कुछ झुंझलाया-सा, अचक्‍के

सामने पड़े पुराने गरीब दोस्‍त के मुंह चुराया-सा

हंसना मिलना कमीज़ उतारकर चप्‍पल पहनना

गिलास की शराब होगी, मनबस रस पिये का सुरुर

बने, आंखें खुशी में धंसीं चमकती चकमकायें वो

बातें नहीं होंगी, थरथराती रेशमी रातें

नहीं होंगी, जीवन होगा जैसे बटुली में ढंकी

बसाइन रोटी, गिरते-भहराये बेमुरव्‍वत शब्‍द होंगे

महक-सिंझा सुहाना, समूचा भरपूर गाना नहीं होगा.


3 comments:

  1. That's great Pramod Bhai. Reshami shabdon mein khurduri vyatha...

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  2. जीवन होगा जैसे बटुली में ढंकी
    बसाइन रोटी,

    वाह, कितनी तो अच्छी है ये उक्ति, जैसे कोई चमत्कार. आभास होता है ऐसा कितनी बार पर इसे शब्दों में शायद ही कोई ऐसे व्यक्त कर पाता जिसे पूरी सहजता के साथ आपने कह दिया.

    आपको और आपकी कलम को प्रणाम!

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  3. कितना सरल है अच्छी तरह जीना, हम ही इसे कठिन बना लेते हैं।

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