Saturday, February 27, 2010

माचिस मद्धिम पुरान..



माचिस नहीं मिलता. कुछ भी कहां मिलता है. बच्‍चों का गेंदा हेराया है. लेकिन जनार्दन मिसिर का बेटियो तो हेरायी है, फिर? दू कट्ठा का एक टुकड़ा बेचा सकता है, जैसे ज़रा सा अरमान गांव के बाहर फेंका सकता है.

2 comments:

  1. प्रमोद जी,
    बड़े अरसे के बाद आपका लम्बा पाडकास्ट सुनने को मिला, आनंद आ गया, इसे भी सहेज के रख लिया है आगे के लिए | चलिए अभी जा कर रूना लैला की तड़कती भड़कती आवाज में एक गीत सुनते हैं, ;-)

    Neeraj

    ReplyDelete
  2. अद्भुत... जो स्वाद भूल आया हूँ, बोलने का, भासा का, नाम का अपनी बोली का ... मेरे पास शब्द नहीं मिलते... आपका पोडकास्ट जानलेवा होता है... इस शोर में कितनी शांति है... अद्भुत.

    दियासलाई किनना पड़ेगा अब :)

    ReplyDelete