Friday, February 26, 2010

गिलहरी का बाघ..

औरत देखेगी मन के फांक से, कितना गहरे देख सकती हूं की झांक से, और फिर दिलटूटी आवाज़ में बुदबुदायेगी, ‘मैं तुम्‍हारा भरोसा नहीं करती. इसलिए तुमसे नफ़रत करती हूं, सुनो. और प्‍यार करती हूं इसलिए नफ़रत नहीं कर पाती!’

गोद का बच्‍चा एकदम-से गिर पड़े की तरह आदमी सुनेगा, सिर्फ़ औरत की नफ़रत सुन सकेगा, अपनी नफ़रत में सिहरता कि वह मन के किस गांव बसता है जहां भरोसे की इतनी ज़रा-सी हरियाली नहीं? हर समय दिखता है पानी में डोलती पुरानी डोंगी और अपना तैरना, बहे चले जाना, फिर क्‍यों होता है कि साथ कहीं पहुंचना नहीं होता?

बांस के जंगल में एक अकेला बाघ विचरता है. अकुलाया, अपने बाघ होने से भय खाया. बचपन के कुछ किस्‍से याद आते हैं, कुछ लगता है उसके नहीं, जंगल की कहानियां हैं. घुटने पर पैर जमाये पीठ के बल लेटी गिलहरी उस मेले की याद दिलाती है जब बाघ उसे साथ लिवा कर चकरी के चक्‍कर काटने गया था और बाद में गिलहरी ने कैसे उसकी उल्‍लू काटी थी जब कुएं में बाघ को उसकी परछाईं दिखाकर वह उसे ललकारती, उस गहरे लगभग गिराती छोड़ आई थी, याद आया, डॉन बेप्‍पे बाघानो? बाघ क्‍या करेगा एक बेचारी मनभली गिलहरी का, कातरता में अपनी बेढब मुस्‍कराता है. रात मन के सूने-हारों के अलग-अलग वृंद सजाती है. बाघ किसी बूढ़े बांस की पकी देह से माथा लगाये वही पुराना सवाल एक बार फिर पूछता है जिसे अब सुस्‍ताती हवायें तक अनसुना किये जाती हैं, ‘पुराने पुरोहित, बताओ, सचमुच वही हूं जो समझता हूं मैं हूं?’

अपनी उलझन में बेसुध धुत्‍त आदमी बुदबुदाता है मालूम नहीं भरोसा किस चिड़ि‍या का नाम, जिस गांव बसती है मैं उस गांव शायद कभी गया नहीं. या सपने में गया होऊं तो भरोसे से कभी मुलाकात नहीं हुई, मैंने देखा नहीं चेहरा, तुम्‍हारी नफ़रत का चेहरा दिखता है, भूखे होने की सी शर्मिंदगी होती है, भूख के बंजारे भूगोल पर तुम्‍हें एक सच्‍चा गाना गुनगुनाता मिला, ग़लती हुई?

औरत जुडी हथेलियों पर ठोढ़ी गड़ाये खुद को बताती है, ‘एक गुमनाम शहर के बिसराये पुराने सिनेमाघर के अंधेरों में रुपहली छायाएं डोलती हैं, टॉर्च लिए एक बूढ़ा संतरी खोजता है अब हाथ न आनेवाला ज़माना, पुराना, भूला गाना..’

(जारी..)

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