Tuesday, March 2, 2010

हिंदी में लिखना..

स्‍फूर्ति की सजीली, कंकड़ीली सड़क पर लहकते दौड़ते, बेपरवाह कि गहरे घाव लगेंगे, लेकिन हम घाव से खुद को न लगायेंगे, के दूसरे छोर फिर दिखता क्‍या है? भागने की बहकी बदहवासी में खोज लेने का अर्थसघन सुख मिलता है? गहरे तानों की देर-देर तक स्‍वरबंध बनते रहें का सुरबहार बुनता है? फर्र फर्र उड़े उड़ते हैं ढेरों काग़ज़, विचार-पुर्जियां, भीतर घिर्र घिर्र की कोई चकरी घूमती है अस्थिर, गुपचुप, अनवरत, असमंजस के लहरीले रेशमी परदे लहराते हैं, जमा होते ज़ि‍न्‍दगी के चीथड़ों की गिनती गिनवाते, भूलना नहीं लिखते हो हिन्‍दी में का पहाड़ा रटवाते, माथे एक ज़ाहिल गंवार मास्‍टर की हिंसा, कोई नुकीला डंडा बरसाते.

कोई लिखवैया होता अपनी मेज़ पर झुका आत्‍मा की आग में झुलसता, अपनी चौंध में चमकाये, बीहड़ अंतरंगता में खुद को पाये हुए, पाविच, पावेल, या कोई इब्‍ने संगीन, पूछता मैं हिन्‍दी के हाशिये की एक गुमनाम दस्‍तख़त, एक ज़रा-ज़रा सी की गुफ़्तगू का एक भोला सवाल मासूम, कि हुज़ूर, मेहरबानी कीजिए, जंगलगे ताले की कुंजी दीजिए, खुद को आग में चमकाने और ज़ि‍न्‍दगी के चीथड़ों से बचाने का अदबी राज़ क्‍या है, बड़ा बिगड़ा चावल चढ़ा है बटुली में, आप ही इसको सींझिये?

पिटे गदहे से गिरे चिनकते धोबी पर हंसता मित्र सन्‍नायेगा, अरे, अजब आदमी हो, मुंह में रसभरा गुजिया दबाये हिन्‍दी का हिलगा ब्‍लूज़ गा रहे हो? लिखना तकिये के नीचे धरी, एक वो क्‍या तो है जो कहते हैं की ज़रा इतनी सी, मोहब्‍बत की बागबानी है, उसे खमखौव्‍वा समूचा जीवन बता रहे हो? कौन निर्मल हो कहां के बरुमा कि ऐसा बचकाना, बेहूदा गा रहे हो?

घबराया अपने से चिढ़ा, कतराया मैं लिखने पर लौटूंगा, सुध में बेसुध कि हुलेबेक की ज़बान और तारांतिनो की तान में नहीं लिख रहा, न चिनुआ अचेबे की रातभर जलती अंग्रेजी हो रहा हूं, एक बेमतलब सिलसिले में जाने क्‍या है का कोई एक अपहचाना भूगोल बुन रहा हूं, या शायद पुरानी किसी न रिलीज़ होनेवाली फ़ि‍ल्‍म का गाना है, या अप-इन-द-एयर किसी मकड़जाल का हुलुलु फ़साना, कट रहा हूं, और फिर-फिर शब्‍द जोड़ रहा हूं, पीछे-पीछे, हाय, नये चीथड़े उधेड़ रहा हूं.

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