Tuesday, March 2, 2010

ईनारे पर गिरी हुई..

“तौफिकवा था कौन अवाजी लगा रहा था अबहीं दुआरी पर? कौन?”

कांटा लगाकर सहजन सहेजती सहजो जवाब देगी, मगर बुढ़ि‍या के सुनेगा नहीं. दो मर्तबा और कोशिश करके फिर मन ही मन हार मानके, तीन गालियां तेरह साल की मुसम्‍मात बच्‍ची पर खराब करके, वह वापस अपनी कुरती के बटनों को खोलने में जुटी, लेकिन ये उंगलियां एक जगह थिर होकर मदद करें तब न? इस उमर में यही है, हर चीज़ काम हो जाती है. बायें घूमे तो घुमे रहे बायें, दायें का हाथ थामा तो थामे रहो दायां! इसीलिए बुढ़ि‍या बटन लगाती नहीं, लेकिन मालूम नहीं देवकी की पतोह है शरम-लिहाज की मारी कि छोटकी, हंसी-हंसी में हाथ सहलाती या माथे में तेल लगाती कब कुरती का बटन जोड़ जाती हैं, पते नहीं चलता. कौन किसका इतना लिहाज है? कुरती के दो बटनों की ढांपी नहीं रहेगी तो क्‍या होगा, शंकर भगवान अंगना में तांडव करे लगेंगे? एक बार बुढ़ि‍या के मन हुआ मुसम्‍मात को बुलाकर कुरती के बटन खुलवा ले, फिर आवाज़ लगाने के ख़याल से थकान होने लगी, बेवकूफ लड़की आकर मुंह बाये खड़ी रहेगी, मदद की जगह हो सकता है दो नई मुसीबत छोड़ जाये, असल बात है बुढ़ि‍या को सहजो पर भरोसा नहीं. और उससे भी दीगर यह कि मुसम्‍मात लड़की का चेहरा उसे पसंद नहीं.

फिर एकबारगी बुढ़ि‍या को भतीजे जीवनानंद पर गुस्सा आया. कम से कम अब तलक दस मर्तबा उसके कुरते का कोना थामे उसे समझा चुकी हैं चलाये अनर्थ अपने घर में, बुढ़ौती में उन पर अपना धरम-करम न लादे, डरपोक उनके आगे माथा झुकाये ‘हां, काकी, हां, काकी!’ का जाप करेगा और तीन दिन बाद फिर खबर होगी कि फलानी माता के उपवास में आज तरकारी में लहसुन नहीं छोड़ाया है तो हल्‍दी मत खाइये, अदरक से त्रिकुष्‍टु महाराज तिक्‍त होते हैं! एक तो बड़की को जो रुप भेंटाया है. जरा नैन-नक्‍श होता तो जीवनानंद के जीवन की जाने कौन दुर्गति होती! कहीं ऐसा न हो तौफिक गुड़ लेकर आया हो और दरवाज़े आवाज़ लगाकर लौट गया हो? सब अपनी-अपनी में लगी हैं, बुढ़ि‍या की यहां किसको चिंता. हूं, उनको भी नहीं है, किसी की नहीं. कभी-कभी बच्‍चे भी दौड़े आते हैं तो बुढ़ि‍या हवा में हाथ फटकारती है, ‘दुर, दुर!’

मगर तौफिक आकर लौटेगा नहीं. जानता है वह इंतज़ार कर रही हैं. कलकत्‍ता से हाजी साहेब लौटे हों, और खाने के बाद बुढ़ि‍या की जीभ पर खजूर के गुड़ के तीन टुकड़े गिनकर चढ़े और गलें नहीं, यह आजतक तो नहीं ही हुआ है. हाजी साहेब की गाड़ी गांव लौटे इसका मतलब ही होता है बुढ़ि‍या के हिस्‍से दो भेली गुड़ आयें. अब उस पर जीवनानंद बो को जितना भी मुंह फुलाना हो, फुलायें, उसके मुंह के फेर में बुढ़ि‍या गुड़ से मुंह फेरने से तो रही. अलबत्‍ता कभी-कभी चाहती ज़रूर है कि खामख्‍वाह तनाव न तने, सबकुछ चुप्‍पे-चुप्‍पे निपट जाये, सांप भी मरे और लाठियो न टूटे! आखिर घर में अरवी के पत्‍ते की अच्‍छी तरकारी बड़की ही बनाती है, देवकी के पतोह का, या छोटकी के हाथ में वो स्‍वाद कहां? निमकी-टिमकी भी सोचो तो जीवनानंद बो कितना माहिर तैयार करती है, सोचकर बुढ़ि‍या एकदम-से भावुक हो गई. किसी तरह देह पर चार लोटा गिरा चुकने के बाद साड़ी का फेंटा बांधना क्‍या नई मुसीबत होगी उस तक़लीफ़ को भूली, पिछली मर्तबा कब था जो चंद्रमा की बहु खास तौर पर उन्‍हीं के लिए मिठाई बनवाकर भिजवाई थी, और उस मिठाई के रस कितना तो वह सुखाई थीं, कुछ उसी तरावट में था बुढ़ि‍या मीठे-मीठे तैर रही थी, जभी वह छोटी नामुराद घटना हुई, कि उल्‍टा धरे खाली कड़ुए के तेल की कटोरी पर एकदम-से पैर पड़ा और ‘हां, हां!’ करतीं देवकीनंदन की दूसरी स्‍त्री, सुचित्रा देवी, जन्‍म 1891, ग्राम-धुरनहा, बिछलतीं, संभलतीं, ईनार की फिसलन पर ढेर हुईं..

4 comments:

  1. ईनरवा पर सुचित्रा देवी जौन दिन गिरी थीं ओही दिनवा एगो और कांड हुआ था .. अमौसी के पिछवाड़े वाले बगीचिया में .. ओकर कहानी कब कहियेगा ?

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  2. अबकी पतनशील साहित्य का इंतज़ार है.

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  3. सागर से ही आपके ब्लॉग का पता चला.....और आना सुखद रहा...आपके ब्लॉग की अधिकतम पोस्ट पढ़ लीं. और दुःख हुआ कि इसका पता अब तक क्यूँ नहीं चला...टिप्पणी अभी तो बहुत कुछ नहीं...पहले बहुत कुछ समझना होगा...पढ़ते वक़्त मिश्रित भाषा के संयोग से कहीं और टहलने लग जाता हूँ..शब्दों में ही फँस जाता हूँ...मगर शब्दों का प्रयोग, तरीका अच्छा लगा...यहाँ आना होगा फिर से...पढ़कर जिम्मेदारी से टिप्पणी दूंगा...

    Nishant kaushik
    www.taaham.blogspot.com

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  4. @शुक्रिया निशांत,
    वैसे इतना जल्‍दी-जल्‍दी मत पढ़ो, ऐसे मुझे तनावधनी ही करोगे, इतनी जल्‍दी में मैंने सब लिखा भी कहां था?

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