Thursday, March 4, 2010

एक अनुपयोगितावादी नेक़ सलाह..

जाने क्‍या थे कहां थे मगर समझते थे खुद को जनता का आदमी ठेपी सज्‍जन, सो वही ऊंचा खटराग चिल्‍लाये, दिल में छेद हो जाये का छेदकराग साधे फैलाये, ‘ओ लिखवैये, अबे क्‍यों? सतरह से होते सत्‍तर सात सौ पन्‍ने रंगोगे मगर फिर उसके बाद हज़ार, सात हज़ार क्‍या, बरखुर्दार? हुआं से कहां ओकरे बाद कौन बेड़ा पारोगे, पन्‍नों के माथे टांकोगे सुनहरी चिड़ि‍या, अपने अनोखे इस जनविमुख ज्ञान को कहां गाड़ोगे? क्‍या काम आएगी तोहरी यह लिखाई? लाएगी इन छौंड़ों के चेहरे हंसी, मदनमोहन के पालटिक्‍स में कोई नई अंगड़ाई? बताओ, बताओ, पूछता है जनता का आदमी समझ सके उसे ज़रा उसी आसान ज़बान में समझाओ!’

वही मौका हुआ जब तैयन चचा खखारे, पीछे निवाड़ में हड़ि‍यल पैर रगड़ते बैठे अबकी सीन के फोरग्राउंड में पधारे, ‘सज्‍जन यार, सुनो तुम, करते हो यही टुच्‍ची बातें कि दिल टूटा जाता है. ज़िंदगी डेढ़ बखत की रोटी और हवाई चप्‍पल का फकत टूटा फीता नहीं होती, न बच्‍चे का मदरसे से छूटे पतंग के पीछे भागना और ठेहुना पर घाव साटना मुंह बचाये की कारवाई होती है, बच्‍चे के बास्‍ते बच्‍चा होने का सलीका होता है, मगर तुम दुर्जन क्‍या जानो, बस वही गिनती के तीन पहाड़े पढ़ा जानते हो, तुम्‍हारी किस्‍मत कि कोई नेकबंद अच्‍छी गज़ल पढ़ रहा है, चरनामृत की तरह धरो हथेलियों में इसका तो शऊर तुम्‍हें कभी भला क्‍या होगा जीवन में, मगर भैय्ये, यह काली दाल क्‍यों फैला रहे हो?’


3 comments:

  1. इशारों- इशारों में दिल लेने वाले बता ये हुनर तुमने सीखा कहाँ से ?

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  2. हमें उपयोगितावादी गलत सलाह चाहिए, ऐं?

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