Friday, March 5, 2010

सब यादे बिसरा दी, काहे हो, बेबी?

रामजीत राय ब्‍याहता बेबी राय को सखी सकीना का ख़त..

कइसी है, बेबी, देख तू त हमके भुलाइये गई, हं? आज दुकानी पे चन्‍नपरकाश आके एहर-ओहर का कहानी नै छेड़ते तो ईहो खबर कहां ले लगता कि तोरा घरे डेढ़ साल का बबुआ खेल रहा है! (और देख, जलम-जल्‍मांतर का बात करे वाली तू हमको एक हाली खबरो करे लायक न बूझी? हमरा ख़याल ऐसा धूलि बनके तोरा माथा का बाजू ले उड़ गया रे, बेबी? हमरा तरफ़ ले तू अइसन निर्मोही हो गई हो?) खैर, इसी को कहते होंगे जिन्‍नगी का खेला, तोरा है न मोरा है, माया नगरिया में फोकटिया का मेला है! हो खुदा, कइसा त मौका है और देखो, का हम बोल रही हैं! पहिले ई बताव, बबुआ है कइसा? गोर है, सांवर है, केकरा ऊपर गया है? ओह, केतना त करेजा पीराय रहा है कि थोड़ा सुभीता होता त अभीये उड़के तोहरे पास चहुंप जाते, बबुआ के झांकी लेते, अऊर तोहरे हाथ को अपने हाथ में लिए दिल का बात कहके करेजा ठंडा करते, सच्‍चो में, बेबी! तुम हुआं ठेहुना पर अपना सुन्‍नर छौंड़ा को तेल लगा रही हो और हियां जो है दुख का रोज दू गो पहाड़ फूटता रहता है. पूरा सात महीना हो गया, मियां जी का कवनो खबर नहीं, कवनो पुलिया से छलान लगा लिये कि जेहल में हैं, कवनो, कुच्‍छो खबर नहीं. सब पुलिस-थाना करके, रो-हार जब हमको तनि होश हुआ तो जुम्‍मन फूफा का मदद से मकानी का नीचवा का जगह में एगो मनिहारी का छोटा सा दुकानी डाले हैं, वहीये से गुजारा चल रहा है. गुजारा क्‍या चल रहा है कवनो तरह से जिन्‍नगी कट रही है! मन के हाल त मत्‍ते पूछ..

तू अपना बोल, बेबी? चन्‍नपरकाश त बोल रहे थे राय साहेब के बहुते ठाठवाला नवकरी है, नीमन पी परकाश एंड कंपनी के कन्‍टेक्‍टरी का जाब में लगे हैं? कवन ई कहीं ऊहे तोहर नइहर वाले परेम परकास तो नै हुए, हं? रैल्‍टी हमको मालूम नहीं, चन्‍नपरकाश से पूछे के ख़यालो नै रहा, बस अइसे ही अंजाद लगाके बोल रहे हैं, वहीये हैं ई बड़का साहेब हो गए? तब त तू बड़ किस्‍मत वाली है रे, बेबिया!

और का बोलें, सखी, केतना त मने लुकाया हुआ बात है, मगर दुकानी में फिर दू गो गाहक आके ठाड़ा हुए हैं, हमरा वेटिन कर रहे हैं, कवने को टिकुली चाहिए होगा, कवने को चूड़ी. सबको पहिरायेंगे हम, हमरे हाथे कोई नहीं पहरायेगा, नहीं? तू अपने घरे सुखी है, हमरा दुख अपना करेजा में थोड़ी लगायेगी..

जोकिन कर रहे थे, सखी, तोहरा से कइसन ईर्ष्‍या अऊर कहंवा के शिकायत..

फुरसत भेटाये त एगो कारट डाल देना, पता के बाजू जोड़े मत भुलाना, बज्‍मी गौरमेंट एंड बियुटी इस्‍टोर, ठीक?

खुदा हाफिज


हरमेशा तोहरे दिल के करीब रहे वाली

सकीना

3 comments:

  1. क्या बढ़िया पतनशील साहित्य है... वाह ! जलम- जल्मांतर ...

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  2. अब का कहें ,कहत पढ के जी कैसा कैसा तो हो आया है !

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  3. sakhi ne sakhi ko dil kholkar likha hai .. dil ka jakhma chhupakar bhi nahin chupaya hai . sakhi aisi hi toh hoti hai harharaati nadi see.....

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