Saturday, March 6, 2010

घर के खोखे में जो तुझको बिठाकर..

होते हैं तो फिर हुए ही रहते हैं. झमेले. लगता है उनसे पार पाया जा सकता है, मगर फिर यह भी दिखता है कि झेलाइयां पीछे-पीछे ही चल रही हैं, झमेले जो हैं उनका कुछ सदाबहार-सा बना ही रहता है. मतलब कुछ वैसा ही सा.


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8 comments:

  1. आवाज़ बहुत कम है. परेशानी हुई

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  2. MP -3 डाउन लोड करके सुना, मस्त है... पता नहीं क्यों, सब कुछ अपने साथ बीता हुआ लगता है और सारे संवाद दोहराया सा लगता है.

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  3. भर्राई जिंदगी पर .....पैदल होती जिंदगानी पर ये पॉडकास्टिंग गज़ब के करीब तो है .....प्रयोग सही है मित्र .....पर ऐसे मनाई को घर से निकालिए भाई जो दू साल से पैसवे नहीं दिया है ...और छाती पर मूंग दर रहा है ...का ?

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  4. रोंआ कांपि गइल रे भयवा एक हालि हम्हूं फंस चुकल बानी चक्कर में।

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