Tuesday, March 9, 2010

बच्‍चा और बेहयायी..


‘भाग जाऊंगा हाथे नहीं आऊंगा, फिर?’

बच्‍चा मुंह बनाये पूछेगा, मैं मुंह बनाये सोचूंगा, ‘भाग जाओगे तुम्‍हीं पछताओगे, सुबही उठोगे, मुट्ठी में चवन्‍नी नहीं पाओगे, फिर?’

ना!’ चिढ़के बच्‍चा पैर पटकेगा, ना ना ना! धम्‍म् धम्‍म् ज़मीन पर, चोट छाती लगेगी. चव्‍न्‍नी बचाता मैं अदद छाती नहीं बचा पाऊंगा.

चार कदम दूर भागा, बच्चा चिंहुकता पलटेगा, जैसे नफ़रत का ककहरा सीखता हो, ‘कब्‍बो बात नहीं करुंगा, साथ नहीं करुंगा, फिर?’

बेहयायी का पाठ बना थेथर मैं गाल बजाऊंगा, ‘नहीं करोगे तुम्‍हीं पछताओगे, हमारे साथ फिर कहीं नहीं जाओगे, बुनिया तुम्‍हें भूल जाएगी, कनिया बुलाके अपनी गोदी नहीं लुकायेगी?’

बच्‍चा भां भां रोने लगेगा मैं फां फां हंसने. खींचकर बच्‍चा मुट्ठी चलाएगा, भींचकर जीता हुआ मैं हारा जाऊंगा..

3 comments:

  1. वाह क्या खूब लिखा है बातों ही बातों में आप बेला के महकते फूलों की माला बनाते चलते हैं .. हार कर भी हर बार जीतते हैं . बधाई ...

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  2. वाह!
    घुघूती बासूती

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  3. बहुत सुन्दर, मन के भाव पचाना तो बड़ों के खेल हैं, बच्चे तो मन के भाव यथारूप व्यक्त कर देते हैं ।

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