Wednesday, March 10, 2010

संझा एन्‍सांब्‍ल..

पहचान की वह जाने कैसी रेल होगी जिसके खटर-खटर बेमेल म्‍यूज़ि‍कल मुगालतों में दिल बहलता होगा, कभी सुन पड़ती होगी कोई दबी-दबी सी चीख़, मगर बेख़याली की बेसबब कहानी थी सा भूलकर उसे फिर कोई लतीफ़ा सुनता होगा, कोई जो आकर चुपके बताये कभी कि जनाब, यह ज़ि‍न्‍दगी आपकी ही है जो पकती जाती यूं ही बेमतलब, सख़्त होता एक शरीफा खराब? तो चोटखायी नज़रों इशारा करने वाले हमराज़ को हैरत में तकता होगा. जैसे याद करते हों समाज में रहने की गर्ज की तर्ज पर लोग बारहा भरने को वक़्त पूछ लेते होंगे कहां से आए, कहां जाते, भाई साब. जिसका वैसा ही वक़्त भरने को सूझता होगा कुछ एक बेहूदा सा जवाब. वर्ना तो सोचने लगने जैसा सोचने पर सन्‍न हुए जाते होंगे कि क्‍या बतायें कहां से आए किधर जाते, हाथ को हाथ सूझे तो देखें दिल पर खुदी क्‍या बात, आपको बतायेंगे कभी, अच्‍छे दोस्‍त, पहले खुद को ही टटोलकर करीब लायें?

हाय, बरसाती कंपकंपाती सांझ में लिसड़ाये कपड़ों सी क्‍या दुरदुराई, लुटी कहानी है, वह कौन था जिसकी संगत की मोहब्‍बत में आए थे शहर, और वह कौन है जिसकी संगदिल मोहब्‍बत में तकते हैं रात, दिन का ताला खोलते हैं, सारे-सारे दिन बजता रहता है फ़ोन, कभी बोलते, क्‍या हैं उसका नाम? कभी जो फुसफुसाकर गाया था किसी ने कानों में, और जिसे आप छोड़ आए थे किसी काली रात एक काली नदी की कोख में, कि शहर में दाखिल होना, आना है खाली हाथ?

शहर में सांझ ढलती होगी, फांके गिराती धूल उड़ाती, रसोई में ठिठकी कोई औरत बिलखती हंसती, तालबद्ध मवेशी अंधेरों के किन भूगोल थिरकते, मन उमड़ता नई इमारते बनती होंगी, अपहचानी आवाज़ों के आततायी शोर में एक पुलिस लॉरी साइरन बजाती, रोते बच्‍चे को सुलाती होगी, सीढ़ि‍यों के अंधेरे में भेदभरा कोई चेहरा दुभाषिया खुद को मेरा होना बताता होगा, भय में लोग चीख़ते होंगे देश, वर्ना तो जागे में बेहोश बेरहमी से रेतते खुद को चैन से बंसी बजाने के सुभीते सपनों में सुलाते होंगे, चौंककर अचानक कभी फिर सगेज़ाद को दुश्‍मन और माथे गिरते क्रेन को खूबसूरत मेम बुलाते, घबराहट में कभी बुदबुदाते हुए प्‍यार और मुझको यार कहकर छकाते, मैं अपने को बचाता, फिर हारा हुआ आता, खुद को शहर में लौटाता होऊंगा..

4 comments:

  1. अब तो वाह कहना छोड़ दिया है सर जी !!

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  2. क्या कहूँ..जो भी करते हैं..कमाल करते हैं...और फिर यह दिल का कम्बख्त जंग लगा ताला..जिसकी चाबी गुम भी हुई तो इस पासवर्ड्स वाले डिजिटल दौर मे!!!

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  3. prashansha ke liye shabda nahi hai

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