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Mar 18, 2010

दायें या बायें..


जीवन के ट्रैफिक में मैं कहीं उलझा रह गया था, मौका अभय बाबू ने मार लिया था, मेरे देखने का छींका आज टूटा, उसी मीठी जलेबी का एक छोटा सा मजमून है..

5 कमेंट:

Meenu Khare said...

चिट्ठाचर्चा के लिंक से यहाँ पहुँची. सोचा इस पोस्ट की पहली टिप्पणीकार होने का क्रेडिट ले उड़ूँ ! आपका ब्लॉग च्यू ऐंड डायजेस्ट की श्रेणी में आता है अत: आगे की टिप्पणियाँ पढ़ कर, समझ कर करूँगी.

Pramod Singh said...

मीनू जी खरी जी,
शुक्रिया, साभार, मतलब आपके उड़ जाने के उपरांत के भार तले अजीब सा भारीपन महसूस हो रहा है.

हेमंत कुमार ♠ Hemant Kumar said...

दाएं हो या बायें---लेकिन फ़ोटोग्रैफ़ बहुत जोरदार है--सुन्दर्।

Pankaj Upadhyay (पंकज उपाध्याय) said...

हा हा , जी मीनू जी भी और खरी जी भी...
:)

शुक्रिया, साभार, मतलब आपके उड़ जाने के उपरांत के भार तले अजीब सा भारीपन महसूस हो रहा है.

अभी इसके लिये ही ’वाह’ बोलकर जा रहा हू..

ankur said...

दाये या बाए फिल्म कहा रह गयी..?
कुछ लाइनों की ज़रुरत महसूस हो रही है...