Tuesday, March 23, 2010

क्‍या होगा गरमी का असर होगा?

बहुत गर्मी झेलते रहने के बाद अभी झेलने को और गर्मी रहेगी. जैसे काफी कुछ पढ़ते रहने के बाद भी काफी कुछ पढ़ने को बचा, मुंह बिराता अपने में निस्‍संग बुदबुदाता दिखेगा. आलिफ़ बे से छूटे हुए फ़ैलन की डिक्‍शनरी लजाती और शास्‍त्रीयता से बाज आये बाबू हमें आलोक राय के ज़ि‍रह चमकाते दिखेंगे. तरबूज के कटे हुए फांकों की ख़बर होगी कि आसपास ही कहीं हैं, है ख़बर है का भन् भन्र पंखा बेमतलब घूमता होगा, मगर मुंह तक पहुंच जायें की हर वक़्त चुकाई होगी, जैसे की-बोर्ड पर डोलती उंगलियां हमेशा तैयार हैं के दिलफ़रेब इशारे अच्‍छा अभिनय करती होंगी, मगर उड़ाकर कहीं लिये जायें की वाजिब कलम टाइप उंगली-घिसाई नहीं होगी. फिर हकलाये, अलबलाये तीन कदम बायें, चार फीट आगे अझुराये कहां से किधर ठीक-ठीक शुरु होगा, होगा? ठीक-ठीक तो बाद में फरियाते बैठेंगे, सरकार, बेठीके शुरु होगा? हे फ़कीर मोहन सेनापति, हे गुरु गुणग्राही इनविजिबल सिटी के जनकैया श्री श्री कालबलि कल्विनो कृपालु महाराज, देह और आत्‍मा की टंकी से रोज़ टप्-टप् पेट्रोल चू रहा है, मालिक, कवने करखाने में जा रहा है, हमरे हाथ क्‍यों नहीं आ रहा है, बताइयेगा, पहेली? बुझाइयेगा? अंधेरे बंद कमरों की तरह वृतांते वृतांत है, अंत कहीं है? पंथ? कोई सा उंगली पकड़ा दीजिए, मन बझा रमा रहे का गाना, सुनवा दीजिए? मगर काहे, उसके पहिले ही माथे कोई सेंटेनियल पटकवा दीजिएगा, कहीं से उठवाकर कहीं औरे लटकवा दीजिएगा, फिर कातर कलम कइसे नहीं रोवेगी, की-बोर्ड औंजाके कइसे नहीं अरबरायेगा, कंपूटरजी हैंगिंग गार्डन में घबरायेगा?

3 comments:

  1. बहुत अच्छी प्रस्तुति। सादर अभिवादन।

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  2. टैग सही किया है पोस्ट को... इहे ब्लागिग है साहिब :)

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  3. फैलन की लुग़त तब शिकागो विवि वाली साइर पर नहीं आई थी क्या?

    http://dsal.uchicago.edu/dictionaries/fallon/

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