Wednesday, March 24, 2010

धुलियाये लैंडस्‍केप में..

जाने कैसी आवारा गोधुलि बेला है, खुले उजाड़ मैदान के एक छोर टहलते हुए लगता है मानो ग़लत पते पर आ गए हों. जैसे मैदानी नाटकीय फैलाव के किसी कोने रेज़्ड प्‍लेटफ़ॉर्म पर कोई तेलुगू बाई का राजस्‍थानी नाच हो सकता था, या प्रतापगढ़ की किसी बिसराई नौटंकी का रिपीट शो, मगर सन्‍नाटों की अधबनी कविता पसरी हुई है, इमैजिन्‍ड अतीत का मेला उखड़कर मानो हार्डकोर फ्यूचर के एक रंगहीन कैनवास में डिसॉल्‍व हो गया है. इट कुड हैव बीन द लास्‍ट पिक्‍चर शो इन द वाइल्‍डरनेस, बट इट इज़ नॉट..

व्‍हॉट इज़ इट? अ सेट फॉर अ ग्राफ़ि‍क स्‍टोरी? या साऊथ का कोई फ़ि‍ल्‍ममेकर डेढ़ सौ जूनियर आर्टिस्‍टों के साथ इस बियाबान में रौमेंटिक डुयेट शूट करने आएगा, बांस की बल्लियों और लोहे की खपच्चियों पर भारी बत्तियां लगेंगी, लाउडस्‍पीकरों के अर्द्धस्‍वप्निल शोर में मैं उचाट अकेलेपने के सुकोमल, टीसकारी गल्‍प भूल जाऊंगा? ओह, कैसे-कैसे विचार. वह भी इस आवारा गोधुलि बिलो बुली बेला में?

जुसेप्‍पे होता तो उससे पूछता कि नहीं, तुम घटक की ‘अजांत्रिक’ और राय के ‘जलसाघर’ की तो रहने ही दो, शहरी आधुनिक-गल्‍प ‘साधु और शैतान’ को भी भुलाये रखो, महमूद की ही एक और फ़ि‍ल्‍म थी, अरुणा ईरानी के साथ, ‘गरम मसाला’, उसकी कुछ याद है तुम्‍हें? या फ्रंचेस्‍को रोज़ी की ‘साल्‍वातोरे जुलियानो’.. पता नहीं क्‍यों है कि ये सारी छवियां घूम-घूमकर माथे पर गिर रही हैं, क्‍यों गिर रही हैं, कुछ तुम्‍हें सूझता है?

लेकिन जुसेप्‍पे होगा नहीं कि मेरे सवाल का जवाब देगा. मैदान के एक छोर से छूटे पाड़ों की तरह दूसरे तक भागते धूल और अपनी किशोर वय की ऊर्जा में नहाये कुछ सिरफिरे अपने में मस्‍त बच्‍चे होंगे, जिनसे कुछ देर तक हकबक उन्‍हें तकने के बाद चीख़कर मैं सवाल करुंगा, और वे अपने जवाबी चीख़ों में उसे अनसुना करते रहेंगे..

बकरी और जलावन की लकड़ि‍यों के साथ गांव लौटती एक बुढ़ि‍या होगी जो दूर से मुझे घूरती आती नज़दीक आकर ठिठक जाएगी, बिना मेरे प्रस्‍तावना के मेरे सवालों के जवाब के लिए स्‍वयं को प्रस्‍तुत करेगी, बदले में यह छोटा शर्त लादेगी कि मुझे उसके जीवन की प्रेम-कहानियां सुननी पड़ेंगी.. मैं चौंककर तीन कदम पीछे हट जाऊंगा कि तुम यह क्‍या कह रही हो, काकी? प्रेम कहानियां तो अब मैं अपनी तक नहीं सुन पाता, फिर तुम्‍हारी किस कदर सुनूंगा?..

बुढ़ि‍या इसका जवाब देने की जगह बकरी के मुंह से लकड़ी छुआने लगेगी, मानो मोहब्‍बत से घास खिला रही हो. बकरी बेवकूफ़ लकड़ी चबाने भी लगेगी, मानो सचमुच घास खा रही हो! मैं सिर थामने के बाद सिर पीट लूंगा, या मुझे लगेगा कि मैंने पीट लिया है. जैसे गोधुलि बेला के अजाने लैंडस्‍केप में टहलते होने का अहसास होगा, जुसेप्‍पे से चार बातें और किशोर वय के लौंडों पर दूर से चीख़ लेने की एक भोली, बेवकूफ़ाना ज़ि‍द होगी, हक़ीक़त में सिर्फ़ सन्‍नाटों की एक अधबनी कविता भर ही होगी, जिसे उंगलियों पर घुमा-घुमाकर मैं बीतती सांझ का घनघनाना सुनता होऊंगा.. मगर वह तंबूरी ज़ोरबा क्विन के पैरों के नीचे की थिरकती दुनिया होगी..

2 comments:

  1. बहुत अच्छी प्रस्तुति। सादर अभिवादन।

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  2. अपने से बात करते काफ़ी लोगो को पढा है पर आपकी तो शैली ही निराली है गुरुदेव..
    पढता जा रहा हू और एक स्माइल जै्सी ही कुछ होठो पर ब्राड होती जा रही है.. सिगरेट छोड चुका हू नही तो अभी ही दो पक्की थी..

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