Friday, March 26, 2010

दु:स्‍साहसी दिबाकर बहादुर!

फ़ि‍ल्‍म देखे अब कुछ चौबीस घंटों से ज्‍यादा हुआ, उस देखे पर कुछ लिखना चाह रहा था, मगर दिमाग में जो बेचैनी तनी है, उसका वाजिब संगठन नहीं हो पा रहा, लगता है जो भी लिखूंगा, वह अधूरा, अपर्याप्‍त होगा, 'नये' सिनेमा की बुनाई का जो एक 'डिज़ाइन' दिबाकर ने 'ओय लकी, लकी ओय' के बाद 'एलएसडी' में गढ़ लिया है, उसकी धार को, उसके अलग-अलग चमकदार तत्‍वों की ठीक-ठीक पहचान करने से मैं रह जाऊंगा, तो बेहतर है ऐसी लिखाई में स्‍वयं को फंसाने, फ़ि‍ल्‍म को गिराने से फ़ि‍लहाल बचाये रखूं.. अभय का कहना है फ़ि‍ल्‍म में जितना है, मैं उससे कहीं ज्‍यादा उसमें पढ़ ले रहा हूं. ऐसे ख़याल से मुझे थोड़ा ऐतराज़ है. हो सकता है अपनी पसंद में मैं ज़रा अतिशयता की तरफ़ खिंचा चला गया होऊं, मगर अगर वह किसी तरह की भावुकता है, तो इस वक़्त मुझे एम्‍बैरेस नहीं कर रही. यही इतना सोचना भर अपने में बहुत खुशी दे रहा है कि 'ओय लकी..' की एक्‍सेसिबल सफलता के बाद दिबाकर सहूलियत और कन्‍वेन्‍शन के आसान रस्‍ते के पीछे दौड़े नहीं गए, होलसम फैमिली एंटरटेनमेंट का राष्ट्रीय पुरस्‍कार जीतनेवाले नौजवान फ़ि‍ल्‍मकार ने अपना होलसम और एंटरटेनिंग होना भुनाना नहीं शुरु कर दिया, अगली छलांग एक ऐसी दिशा में लगाई, जिसका शीर्षक भले ही कितना भी सनसनीखे़ज हो, फ़ि‍ल्‍म कुछ भुनाती और एंटरटेन तो किसी तरह से, कतई नहीं करती है. दरअसल मनोरंजन के प्रचलित हिंदी सिनेमाई प्रतीकों को वह सिर के बल खड़ा करके हमारी मध्‍यवर्गीय सामाजिक उदासियों और बीमार समय का एक अंतरंग, डिस्‍टर्बिंग डॉक्‍यूमेंटशन बनाने लगती, बनती जाती है. देखिए, मोह में मैं फिर फ़ि‍ल्‍म पर बात करने लगा, जबकि मैंने खुद से अभी ज़रा दरकिनार बने रहने का वादा किया हुआ है..

वैसे यह देखकर अच्‍छा लग रहा है कि दिबाकर की फ़ि‍ल्‍म के बहाने फ़ि‍ल्‍म पर बात करनेवाले गद्य की बुनावट भी 'अफेक्‍टेड' और 'एफेक्‍टेड' हो रही है. इमोशनल अत्‍याचार के गिल्‍टी प्‍लेज़र्स से झट बहुत आगे जाकर 'एलएसडी' एक बीहड़, गंभीर, सामाजिक विमर्श के मैदान में हिंदी सिनेमा को खींचे लिए गई है, इससे आगे की हिंदी सिनेमाई यात्रा इससे आगे की यात्रा ही होगी, वह दुबारा लौटकर बिपाशा बसु के 'बीड़ी जलाय ले' वाले लटके-झटकों पर खुद को न्‍यौछावर नहीं करने लौटेगी, और करती दिखेगी तो सिर्फ़ यह बताने के लिए कि बतौर सिनेमाई दर्शक व्‍यस्‍क होने की हमें तमीज़ नहीं, और सिनेमा पर हमारी सारी अकुलाहटें अंतत: महज चवन्‍नी छाप ही हैं..

ज़रा ठहरकर फिर कभी लिखूंगा, दिबाकर पर, 'एलएसडी' पर, फि‍लहाल इतने से ही काम चलाइए, और समझदार सिनेमा और अपने तकलीफ़देह समाज की संगत को ज़रा समय देने के नाम पर जाकर फ़ि‍ल्‍म देख आइए, इतना भर ही इस पोस्‍ट का मक़सद है. और हां, इसे याद रखकर फ़ि‍ल्‍म देखने जाइएगा कि वह आसान मनोरंजन नहीं है. दरअसल फ़ि‍ल्‍म इस लिहाज़ से भी कुछ लाजवाब है कि वह जहां कहीं किन्‍हीं छोटे हिस्‍सों में आसान मनोरंजक होने की कोशिश करती है, वहां-वहां वह खुद को छोटा करती है, और जहां सीधे, निर्मम बात करती है, फट से एक ऐसी ऊंचाई पर चली जाती है, जहां से ऐक्‍टरों की कास्टिंग और उनके आपसी इंटरऐक्‍शन को वापस हिंदी सिनेमा के इकहरेपने पर लौटालना कतई नामुमकिन होगा..

सोच रहा हूं यह फेनोमेनन दरअसल है क्‍या, कलकत्‍ते की बजाय, वाया दिल्‍ली हिंदी सिनेमा का एक बंगाली पुनर्जागरण? हिंदी सिनेमा की एक ऐसी पैकेजिंग जिसमें सिनेमा और हिंदी- सबका एक पुनर्संस्‍कार जैसा कुछ हो जाए? मैं अभी भी सोच रहा हूं..

19 comments:

  1. आपके ब्लॉग पर कभी-कभी ही आना होता है. आज देखा दिबाकर का नाम आपकी पोस्ट में तो लगा कि आपने कुछ हटकर ही लिखा होगा. आपने कम लिखा है, पर फ़िल्म देखने की उत्सुकता जगा दी. दरअसल, दिबाकर की पहले की दोनों फ़िल्में अलग सी फ़िल्में हैं और मुझे बेहद पसंद हैं, भले ही मनोरंजक हों, पर इस फ़िल्म (एल.एस.डी.) के साथ एकता कपूर का नाम जुड़ जाने की वजह से कुछ डर सा लग रहा था. लेकिन, आपने कह दिया तो ये फ़िल्म ज़रूर देखूँगी.

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  2. अब तो पक्के से देखनी होगी.. इस रविवार को पक्का..

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  3. @मुक्ति,
    कुछ दु:स्‍साहस एकता ने भी किया है, ऐसे उद्यम में पैसा, और अपना नाम लगाया, इस लिहाज़ से मिस कपूर भी उस बहादुरी की हक़दार हैं.

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  4. देखकर आते हैं! तब तक आप और कुछ बताइये इसी बहाने!

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  5. देख आती हूँ रविवार को ..आपकी पोस्ट का ही इन्तिज़ार कर रही थी.

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  6. मैं भी फिल्‍म देखकर चकित ही हो रही थी। लेकिन प्रमोद, फिल्‍म से ज्‍यादा इंटरेस्टिंग अनुभव था भोपाल जैसे शहर के एक सिनेमाहॉल में, जो चीप दर्शकों से खचाखच भरा था और जहां पूरे हॉल में बहुत कम, शायद 6-7 लड़कियां रही होंगी, में अकेले फिल्‍म देखना था। शुरू में पब्लिक ऐसे पागल हो रही थी, मानो इटैलियन कामसूत्र देखने आई हो और इंटरवल के बाद चिल्‍ला रही थी। सेक्‍स देखने आए दर्शकों के साथ जबर्दस्‍त धोखा हो गया था।
    लेकिन फिल्‍म कमाल है। सचमुच।

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  7. यक़ीनन चौका दिया है एकता ने ....हम भी इस गठजोड़ से थोड़े कन्फ्यूज़ थे ....पर फिल्म बावजूद सारे तकलीफ देह समाज की परते खोलने के एक अजीब सी उदासी अंत में दर्शक को देकर जाती है .......

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  8. दोनों ही देखनी होगी ।

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  9. देखने की कोशिश करते हैं.

    वैसे आपने कमीने और माय नेम इज खान के बारे में नहीं लिखा. दिल बोले हडीप्पा के बारे में भी नहीं लिखा. ऐसा क्यों?

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  10. देखने की कोशिश करते हैं.

    वैसे आपने कमीने और माय नेम इज खान के बारे में नहीं लिखा. दिल बोले हडीप्पा के बारे में भी नहीं लिखा. ऐसा क्यों?

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  11. @बाबू सी कुमार,
    मैंने राखी सावंत के बारे में भी कहां लिखा. कभी-कभी तो सोचता हूं आपही के बोहेमियनपने के बारे में तीन लाइन लिखूं, मगर फिर यही होता है कि तीन शब्‍द के बाद नज़र लड़खड़ाने लगती है, और घरबराकर कंप्‍यूटर बंद करके एक ओर हट जाता हूं, तो त्रासदियां तो बहुत सारी हैं, ऐसे ही थोड़ी है कि खुद की बजाय दूसरों को दु:स्‍साहसी बुलाने की मजबूरी बनती हो, आं?

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  12. "अभय का कहना है फ़ि‍ल्‍म में जितना है, मैं उससे कहीं ज्‍यादा उसमें पढ़ ले रहा हूं. ऐसे ख़याल से मुझे थोड़ा ऐतराज़ है. हो सकता है अपनी पसंद में मैं ज़रा अतिशयता की तरफ़ खिंचा चला गया होऊं, मगर अगर वह किसी तरह की भावुकता है, तो इस वक़्त मुझे एम्‍बैरेस नहीं कर रही."

    काफी सहजता से आपने कहा। यह बात यूं आसानी से मैं नहीं कह पाता। कुछ इमरतियां, जलेबियां ज्यादा बनानी पड़तीं।

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  13. ..और हां, फिल्म तो यकीनन देखनी ही है। ओय लकी...भी तभी देखी थी जब आपने जिक्र किया।

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  14. अभी तक नेट पर "ओय लक्कि,लक्कि ओय" और LSD का writer नही मिल पा रहा ,सिर्फ़ screenplay है , director के नाम पर !

    "खोस्ला का घोस्ला" के तो जयदीप साहनी थे !!

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  15. @बंधु abcd,
    "ओय लकी.." का स्क्रिप्‍ट दिबाकर और उर्मि जुवेकर ने लिखा था, संवाद मनु रिशी के थे (जिसने फ़ि‍ल्‍म में लकी के दोस्‍त, बंगाली का रोल भी किया था), जबकि "एलएसडी" दिबाकर, उर्मि और कनु बहल ने लिखी है.

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  16. aapne Road dekhi kya???? LSD par kuchh shaq hai mujhe.. ye ek naya prayog to hai kuchh theek bhi hai magar bahut-bahut jyada tareef atishykti hi hai..

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  17. एलएसडी देखी तो नहीं है.............सुना तो बहुत था अब आपने भी लिखा है तो कुछ खास तो होगा ही .............मगर अब देखूँगा ज़ुरूर कमेन्ट भी आपको बताऊँगा.....

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  18. पहले दिन ही पहुँच गए थे सिनेमा.. कुल मिलाके पंद्रह लोग थे.. "ओये लकी" में तो ग्यारह ही थे इस बार नाम की वजह से थोडा बढ़ गए थे शायद.. मनीषा जी वाली बात हमने भी देखी.. तीन लोग तो कुछ ना मिलने की वजह से इंटरवल में ही खिसक लिए..

    फिल्म से बहुत कुछ ले लिया हमने तो..

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  19. सारी प्रणालियों को तोडा है उसने.... digital है, कोई स्टार नहीं, कोई फार्मूला नहीं, बड़ा budget नहीं....फिर भी entertaining है..इस फिल्म से नए फिल्मकारों के लिए level playing field बनता है....ये आने वाले समय के लिए एक काफी महत्वपूर्ण फिल्म है...

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