Mar 27, 2010

काम न करने की एक बेमतलबी का चित्र..

फ़ोन पर आदमी खुद से बात कर रहा है, कैसे करें बताओ?

फ़र्श पर तीन साल की बच्‍ची बुक्‍का फाड़े रो रही है, मानो आज रुदन-दिवस हो और वह पहले पुरस्‍कार की अपनी दावेदारी पेश कर रही हो. आदमी पहले बरजियाये, फिर रिरियाये इशारों से बच्‍ची को देखता है, कि ज़रा चुप हो जा, मेरी मां, तेरा बाप सोचने की कोशिश कर रहा है, मगर लड़की रुदन-तालाब की और हिंसक गोताख़ोर हो सकने की प्रामाणिकता बताने लगती है. आदमी की इच्‍छा होती है कि वह भी सिर हाथों में लिए अपनी किस्‍मत को रोने लगे, लेकिन हाथों में सिर की जगह उससे घुटने घेरकर वापस सोचने लगता है इतना, इतना, इतना कितना करने को है, कैसे करेंगे समझाओ. आंख खुलते ही दिखता है माथे पर कितने काम चढ़े हैं, कब करेंगे, कैसे करेंगे? और बच्‍ची है कि रोये जाती है. जैसे कमरे के दरवाज़े पैरों पर सिर गिराये बड़ी-बड़ी आंखें ऊपर उठाये कुत्‍ते का अपलक तककर पूछे जाना है कि ऐसा कौन काम है जिसकी सोच में मरे जाते हो, और मुझसे नहीं करवाते हो? बच्‍ची का चीख़ना दिखता है और मेरा चुप बैठे रोना नहीं दीखता?

आदमी हारकर जोर से आवाज़ लगाता है ये गुड़ि‍या क्‍यों रो रही है, इसे हटाओगी यहां से? मैं कुछ काम करुंगा, कैसे करुंगा?

रसोई के फ़र्श पर क्लिपर्स से निस्‍संग नाख़ून काटती औरत निस्‍संग बनी रहती है, आदमी का सवाल बेमतलब बाजू गिरता है, जैसे पड़ोस के आंगन पका कटहल धप्‍प से गिरा है ज़मीन पर, और गिरा पड़ा है, बेमतलब. जबकि संभवत: बेमतलबता के बोध में थकी फ़र्श पर बैठी रोती बच्‍ची अब खड़ी होकर रोने लगी है. जबकि कुत्‍ता अब भी बैठा हुआ ही अपनी चोटखायी अकुलाहट को शो-केस कर रहा है. आदमी की इच्‍छा हो रही है किसी को पीट दे, या कम से कम फ़ोन पटक दे, दोनों नहीं करता, भुनभुनाता बिछौने से नीचे बच्‍ची के नज़दीक आता है, बच्‍ची के पेट में अपना सिर लड़ाता है, ‘गुड़ि‍या चॉकलेट खाएगी? आं, गुड़ि‍या पप्‍पा के संग बाहर जाएगी?’

अभी तक जो बह रहा था बच्‍ची की आंख से ही बह रहा था, अब नाक के गिर्द भी कुछ सजीला कारोबार शुरु हुआ है, बच्‍ची अब रोने की जगह हिचकियों में लौटकर एक मंदताल में नाक सुड़कती है, बाप के भारी सिर से खुद को छुड़ाने की और अपने रोने की प्रामाणिकता जताने की गरज में एक बार फिर प्रलयंकारी हिचकियों के भारी ऑर्केस्‍ट्रेशन पर लौटती है. आदमी लंबी सांस खींचकर निहायत पिटी नज़रों बच्‍ची को तकता है, अलबत्‍ता सोच अभी भी अपने ही स्‍वार्थ की रहा है, इतना कितना करेंगे, कैसे करेंगे, कब करेंगे?

अब कुत्‍ता भी अपनी आरामदेही से उठकर, आदमी के बाजू, बच्‍ची के पास चला आया है, और जि़म्‍मेदारी से बच्‍ची के पैर चाटने लगा है. बच्‍ची वापस जिम्‍मेदारी से भां-भां रोने लगी है..