Wednesday, March 31, 2010

मतलब क्‍या है फिर देखने का, सुनने का?

कुछ बिम्‍ब, कोई स्‍वर अंदर अवचेतन में कहीं गड़ा रह जाता है, क्‍यों गड़ा रह जाता है? जैसे यही फ़ि‍ल्‍म के अंत का यह बैकग्राउंड स्‍कोर की सीधी सरल पुकार, मगर कैसी गहरी मार.. कहां से सरलता में चला आता और फिर किस अमूर्तन में छोड़े जाता, क्‍यों?

23 comments:

  1. पहले से सबक लेकर आपने असली बात अबकी पहले ही कह दी है..
    इसे देखें...
    http://laharein.blogspot.com/2010/03/blog-post_29.html

    आप कभी मिलो मुझसे, मैं आपका हाथ चूमना चाहता हूँ..

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  2. "बिल्कुल आज मै शर्मिन्दा हूँ अब तक देखी गईं तमाम हिन्दी-इंग्लिश फिल्मों को बेहोशी में देखने पर...कि मैं जिस बैकग्राउण्ड संगीत को फिल्म की जान मानता हूँ उसी के रचयिता को पहचान नहीं पाया....यकीनन संगीत के द्वारा रचे अमूर्तन अद्भुत होता है...और मैं आह्लादित हूँ आपका ब्लोग पढ़कर..."

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  3. @सागर,

    मैं इन दिनों हाथ के चर्मरोग से पीड़ि‍त हूं, सो हाथ चूमने की बातें कहकर मुझे डराओ नहीं..

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  4. हमें संगीत में तो संगीत का मजा आता है, फिलिम में फिलिम का । मैचिंग का खेल में दिमाग दर्द होता है । अज्ञान क्षम्य हो ।

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  5. आपके पॉडकास्‍ट एक बार सुनती हूं, दो बार, फिर तीन बार और लगातार जाने कितनी बार। वो बातें, जो सोचो तो क्‍या कहती हैं, फिर भी जाने कितना कुछ कह जाती हैं। सोचती ही रह जाती हूं।

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  6. बहुत अच्छी प्रस्तुति। सादर अभिवादन।

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  7. आह!! मैं कुछ पहचान क्यूँ नहीं पाता..दोष मुझमें ही होगा!

    -

    हिन्दी में अति विशिष्ट लेखन का आपका योगदान सराहनीय है. आपको साधुवाद!!

    लेखन के साथ साथ प्रतिभा प्रोत्साहन हेतु टिप्पणी करना आपका कर्तव्य है एवं भाषा के प्रचार प्रसार हेतु अपने कर्तव्यों का निर्वहन करें. यह एक निवेदन मात्र है.

    अनेक शुभकामनाएँ.

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  8. ओह..पहले यह सुना और फिर अभी जापान भी सुना..उफ़्फ़!...और हैरी लाइम?.. क्या कहूँ कुछ नही पता..कहां से है किस फ़िल्म का है..आइ एम होपलेस..और स्टॉप वाचिंग?..क्या करूँ..और आपकी आवाज..जैसे इठलाते पानी मे कोई सपना सा बहा जा रहा हो!..आइ एम होपलेस अगेन!

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  9. बात बिम्ब की, स्वर की, अवचेतन की. सरलता में अमूर्तन की बात और फिर नाम पर इतना ज़ोर? इतना कि अगर याद न आए नाम और सुना भी न हो नाम तो वन शुड स्टॉप वाचिंग फ़िल्म्स? फ़िल्म क्यों देखे आदमी.. बिम्ब, स्वर, अवचेतन और अमूर्तन के लिए या नाम याद कर लेने की मूर्तनता के लिए? और नाम याद करना भी हो तो उसके लिए भी तो फ़िल्म देखनी होगी, नहीं?

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  10. समीर जी की ब्लाग जगत फ़ेमस टिप्प्णी फ़ाईनली यहा आ ही गयी :)

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  11. चुल्लू भर पानी ढूंढ रहे थे, डूब नहीं पाए तो टिपियाने पहुँच गए.

    आप जैसे हँसते हैं, ऐसे हंसना गलत बात है,एकदम गलत.

    सागर से बच के रहिएगा, हम तो कहते हैं जाड़े में मिलना सुरक्षित रहेगा, दस्ताने पहनना मत भूलिएगा लेकिन. :)

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  12. पचास साल का आदमी तो डाउनलोड करके रखा है.. जापान का बैक ग्राउंड तो कमाल है..
    और आप ज़रा ख्याल रखियेगा.. चूमने वाली नस्ल की तादाद बढती जा रही है.. नस्ल एक और है जो बड़ी घटक है पर मैं जानता हूँ उसकी वैक्सीन आपके पास महफूज़ रखी है...

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  13. इतनी देर इस ब्लॉग पे न आके बहुत कुछ मिस किया मैंने .स्टॉप वाचिंग फिल्म्स..हैरी लाइम..

    आवाज़ और संगीत में इतना तालमेल है..जैसे पेड़ की किसी ऊँची शाख से दो पंछियो की दूर से आती मन को मोहने वाली आवाज़ बस..

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  14. ये क्या चूतियापा है...
    नाम नहीं पता तो फिल्म देखना क्यों बंद करें?
    आप बुद्धिजीवी हैं तो क्या बिना बुद्धि वाले जीवित रहने के अधिकारी नहीं हैं. उड़न तश्तरी से सहमत हूं.
    हाथ अपने पास रखिए, संभाल कर, काम आवेंगे ... :)
    यशवंत

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  15. @लायक बाबू जसवंत,
    बिना बुद्धि के जीवित रहने ही क्‍यों, और भी बहुत कुछ करने, करते रहने के आप अधिकारी हैं. आपकी सुयोग्‍यता पर कभी किसी ने सवाल किया? और किया ही तो फिर कहीं का रहा? अलबत्‍ता आपकी बुद्धि हमेशा अपनी जगह अंगद का पांव बनी रही, सुजोग्‍यता तो रही ही. रही बात मेरे हाथ की तो मैं उसे संभाले-संभाले ही चलता हूं, नहीं संभाले चलता तो इतना आपका मुंह चलता? या ऐसे प्रखर विचोरोद्गार बनते?

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  16. ए महराज, बुढ़पवा में लपड़ियाने की धमकी देते हैं.... वो भी मुंबई से.... लइका लोग अब पहले वाला नहीं राह कि ऐसे ही बड़े-बूढ़ के लात-झापड़ खा लें.. मारेंगे तो हथवा हम लोग थाम लेंगे... फिर एकदम से भाग लेंगे फुलस्पीड में...
    भइया, बिना बुद्धि के जानवर-गोजर सब जीते हैं, हमको भी ओही केटगरी में मानिए... अउर हम जो कर पा रहे हैं या करत रहे हैं वो सब जानवर बुद्धि के वशीभूत होकर बेसिक इंस्टिक्टवा में करत रहते हैं..
    बाकी रही सुयोग्यता की बात तो फिर कहूंगा कि गुन तो ना था कोई भी अवगुन मेरे भुला देना...
    ....बाकी आपके हड़काने से अच्छा लगा. बड़े बुजुर्ग हड़कावें ना तो लइका लोग बिगड़ जात हैं. उम्मीद है गाहे बगाहे ऐसे ही हड़काते रहेंगे... नहीं हड़काएंगे तो फिर ऐसा कोई करम कर देंगे कि हड़काना लपड़ियाना मजबूरी बन जाएगा... हो हो हो हो :)

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  17. पहले एक पंक्ति या शब्द चुनें। फिर भोंपा से गरगरा कहें कि जिसने यह पंक्ति या शब्द नहीं सुना इडियट है। बहुमत गर्दनें सहमति में हिलेंगी जैसे गांव के स्कूल में संटी के डर से गणित या अंग्रेजी की क्लास में हिलती हैं। हमारा आधुनिक सामूहिक ज्ञान इसी प्रक्रिया से निर्मित हुआ है इसीलिए किसी काम नहीं आता और बिना अपने मरे स्वर्ग नहीं मिलता।

    हुंह...हां री लाइस। कहीं ढील, लीख लोग भी सलीमा बनाता है।

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  18. माना कि पृथ्वी के सिवा सिर्फ व्यर्थता में गुरूत्वाकर्षण होता है। अब यही देखिये कि दोबारा यहां....

    एक गेहूं के दाने या लंगड़ाते चींटे पर ध्यान केंद्रित करें। गर्दन मटकाते और कतिपय कोणों से देखते हुए उसके चारों ओर पूरी सुबह घूमें। फिर कलगी फटकार कर सच्चे कुक्कुट की तरह बांग दें कि जिससे इसे नहीं देखा-सुना- फिर मतलब क्या है देखने सुनने का। प्रतिउत्तर में जरूर दो-चार बांगें सुनाई देंगी और आप वाकई पाएंगे कि सलीमा का सवेरा हो रहा है। इस चितवन को चलचित्र जगत के चंचल जल में प्रवाहित स्वप्न युग के नाम से जाना जाएगा।

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  19. आवाज़, अंदाज़ , शब्द , संगीत .. एक सुर बनता है , जो पकड़ पाये उसके लिये बनता है , जो न पकड़ पाये उसकी झुँझलाहट समझ आती है , लेकिन उस झुँझलाहट का बेहूदा सार्वजनिक प्रदर्शन नहीं समझ आता है । इस बेसलीकेदार दुनिया में सलीका खोजना सचमुच इतना दुर्लभ है ?

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  20. अच्छा क्लासिकल हारमोनियम बजाते हैं अनिल भाई... सुर कुछ जाना पहचाना सा लग रहा हैं...

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  21. भई मुझे नही लगता कि यह पाडकास्टीय स्वर किसी बिन लादेन द्वारा कथित संगीतविज्ञों को दी धमकी का है..न यह कोई खुदाई आवाज मे सिनेमा के धुनी मूसाओं को दिये ग्यारहवें कमांडमेंट जैसी है (दोउ शॉल्ट नाट वाच मूवीज्‌! टाइप))..बस किसी सिनेमा को समग्ररूप मे देखने वाले व्यक्ति की फ़िल्म के इतर पक्षों पर भीए ध्यान देने की निस्वार्थ गुजारिश जैसी है..और हम जैसों के लिये बेहद जरूरी भी..वरना फ़िल्म देखने के बाद अपने पाप-कार्न तृप्त तोंद पर हाथ फेर कर वाह-वाह करते हुए बाहर निकलते वक्त कितनों को पता रहता है कि फ़िल्म के इंड-क्रेडिट के बैकग्राउंड संगीत की रिकार्डिंग के समय स्टूडियों मे पाँचवी रो के आखिरी मे बैठे उस गुमनाम सैक्सोफोन वादक ने उस म्यूजिक मे अपने अढ़तालीस सेकेंड के पीस को बजाने के रिहर्सल मे कैसे लगातार ३ दिनों तक सैक्सोफोन को फूँक-फूँक कर अपने क्षयरोग-ग्रस्त फेफड़ों को गुब्बारे जैसा फ़ुलाये रखा था..! बस यही है कि कम जाने सुखी रहें!
    अस्तु!

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  22. ई वाला पोडकास्ट भी चाहिए फिर से. कब मिलेगा?

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    1. मगर किस लय कुमारी, सच्‍चो, हमको यादो नहीं कि यह पाडकास्‍ट किस लय और ढब की दुनिया थी? द थर्ड मैन का सिग्‍नेचर ट्यून था, क्‍या था?
      हिचकॉके को कहानी सफ़ा नहीं करोगी तो हिचकी लेते रहेंगे, कहनिया कहां ले हिचकाक जी आगे ठेलेंगे ?

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