Sunday, March 7, 2010

रेल पर सवार औरत..

औरत कहती है मैं कभी तुम्‍हें दु:ख देने का सबब नहीं बनना चाहती, मगर मान लो ऐसा मौका बना कि तुम्‍हें तक़लीफ़ हुई, तब? मेरे बाबत ग़लत फ़ैसला सुनाओगे? अपनी नज़रों मुझे नीचे गिराओगे? आदमी देखता रहता औरत की तरफ़, चुपचाप सुनता. औरत के रोओं, पैर के नाख़ूनों पर एक खुशी की लकीर खिंची जाती कि वह देखती किस मुहब्‍बत से देखता है उसे आदमी, मगर फिर यह सोचकर दिल भारी होने लगता कि मन में इतने सारे फूल खिलते हैं, हमेशा वह करीने से सजाया बागान नहीं होता, और जब नहीं होता तो उस जंगली-वन में जाकर वह भूल जाती है कि वह कौन है, हसरतों के पहाड़ पर क्‍या खोजने आई है, तब?

आदमी देखता है औरत पास बैठी है, मगर उसके साथ नहीं है. उसके केश, उसकी उंगलियां पहुंच की ज़द में हैं लेकिन उसका होना ख़यालों के किसी और समय में, भाषा की किसी अपहचानी लिपि में सामने खुला हुआ है. मानो रेल के एक ही डिब्‍बे में आमने-सामने बैठे हों लेकिन उनके मन के स्‍टेशनों की लम्बी दुरियां हों, उन फ़ासलों में जाने कितने जंगलों, पहाड़ों का भराव हो? आदमी असमंजस की बड़ी तक़लीफ़ में है, मगर झाड़-पोंछकर खुद को बुहारता है, मुस्‍कराकर कहता है, ‘तुम्‍हें नज़रों से गिराकर फिर मेरे खड़े होने की कोई कहीं जगह होगी?’

आदमी कहता है सिर्फ़ इतना जानता हूं कि कितने भी दूर निकल जाऊं, लम्‍बे सफ़र से लौटा आऊं, तो उम्‍मीदों से बंधी उस ज़रा सी पोटली के साथ लौटना, तुम्‍हारे पास ही लौटना होगा. और मुझे मेरे गाते में, और रोते में, सुनोगी तो इसीलिए कि तुम्‍हीं को सुना रहा होऊंगा, तुमसे अलग तो ठीक-ठीक मैं खुद से ककहरा भी न कहला पाऊंगा, समझती हो?

***

आदमी शहर और अपने गहरे में उदासीन, आवारा, निस्‍संग घूमता खुद से हारकर ज़ि‍रह करता कि वह इतना आसान है, फिर मन इतना मुश्किल क्‍यों?

मन के एक दूसरे रेल पर सवार औरत आदमी के नज़दीक आकर बुदबुदाती, ‘तुम जानते तुम इतने आसान नहीं, फिर कितना तो सब आसान हो जाता!’ और बेआवाज़ गुज़र जाती.

घर की दीवारों पर, पुरानी तस्‍वीरों के माढ़े, नये तकिये के गाढ़े में आदमी औरत के होने की तस्‍दीक करता, कानों में फुसफुसाहट सुन पड़ती, ‘मैं यहीं हूं! कातरता में लजाया आदमी सवाल करता फिर वह कौन थी जिसे मैंने गुज़रती रेल में देखा?..

आदमी घबराकर फिर देर तक बताता होता कि वह फंस गया, उलझ गया है, औरत बताती कि नहीं, दरअसल वह आसान हो रहा है. आदमी कहता किसी भी क्षण रोने लगूंगा, फिर देखोगी? औरत हंसती कहती तुम अभी-अभी हंसोगे, मैं देख रही हूं..

3 comments:

  1. ‘तुम जानते तुम इतने आसान नहीं, फिर कितना तो सब आसान हो जाता!’

    सारी मुश्किलों का सबब यही तो है

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  2. औरत बताती कि नहीं, दरअसल वह आसान हो रहा है,

    सच है, मन की कितनी ही ऐसी गाँठे परत दर परत खुलती जाती हैं और व्यक्तित्व सहज होने लगता है ।

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  3. "मन में इतने सारे फूल खिलते हैं, हमेशा वह करीने से सजाया बागान नहीं होता"
    So true.

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