Tuesday, April 27, 2010

बिना शीर्षक..

‘कुछ तो होता होगा जो दिखता नहीं, मगर लौकी के बतिया को रोज़ कुछ बड़ा करता चलता है, नहीं?’ मौसा दन्‍न देना बोलते, बबुनी के बालों में हल्‍के हाथ फिराते हुए, फिर एकदम हंसने लगते.

बबुनी चौंककर उनका चेहरा देखती, फिर खपड़े की लौकी पर, और आसपास, कि कहां जादू हुआ है. जानती कि हुआ होगा, मगर चूंकि उसकी पकड़ में न आता, हारी हुई कातरभाव से चोर नज़रों मौसाजी को तकती, कि इसके पहले कि घर के दूसरों बच्‍चों के आगे उसकी भद् हो, मौसा लौकी व बाकी चीज़ों का भेद साफ़ करके उसे अचक्‍के से उबार लें..

मगर हंसते मौसा का मन बहका तब तक किसी और बात में उलझ जाता, वह मौसी को छेड़ रहे होते कि वह दौरे पर बाहर रहते हैं, उनकी पीठ पीछे मौसी ने कब से पान की आदत पाल ली? क्‍योंकि ऐसे ललहर होंठ तो ‘साहब, बीबी और गुलाम’ वाली मीनाकुमारियो के नहीं होता!

मौसी हवा में हाथ पटकती तक़लीफ़ में जर्द होने का अभिनय करतीं कि सबके आगे उल्‍टा-सीधा कुछ भी बोलते रहने की उनकी आदत कब जाएगी.

मौसा राजू को अपने ठेहुने से उठाकर ऊपर अपने कंधे के पीछे से घुमाते हुए वापस ठेहुने पर लिए आते, और हंसते-हंसते मौसी के सवाल का काउंटर कोश्‍चन पूछते, ‘तुम्‍हीं बताओ, प्राणेश्‍वरी, कब जाएगी?’

खपड़ेवाले बरामदे की छांह में बाल काढ़ती दीपा दी को सुनाती आंगन से अदौरी बटोर रही कनिया बो बोलतीं, ‘सुन रही हो? प्राणेश्‍वरी, हृदयेश्‍वरी, सुकन्‍या, सुकर्णा कितना सारा नाम धरे हैं.. जैसे संधा सिरवास्‍तव न होकर कवनो साधना और मुमताज हों!’

दीपा दी बाल काढ़ती पैरों के पास पड़े पिक्‍चर पोस्‍ट के पन्‍ने पलटतीं बुदबुदातीं, ‘तुम्‍हें क्‍यों डाह होती है, कनिया बो, अपनी पत्‍नी को जो मन हो वो बुलायें.’

‘हमको काहे का डाह होगा, हम तो सिरिफ ई बोले रहें कि देखे के रंग न दू रुपिया के रूप, ओकरा पीछे काहे एत्‍ता मधुमालती के खेला, हंSS?’ कनिया बो छिनकती हुई कहतीं, मगर दीपा दी उसे सुनने की जगह तब लीना चंदरवरकर के ‘जाने अनजाने’ वाले सलवार के कट का मुआयना कर रही होतीं.

सुदीपन तेजी से आंगन के दूसरे छोर दौड़कर चिल्‍लाता, ‘हम हियां हैं! मौसाजी, देखिए, देख रहे हैं?’

तब तक राजू के ठेले से बोकारो धोबी की मझलकी बेटी बिन्‍नु साइकिल लिये-लिये धड़ाम से ढिमिलियाये गिरती और उसके भां-भां रोने में सुदीपन का चीखना एकदम गुम हो जाता..

सबकुछ छोड़कर मौसा भागे-भागे बिन्‍नु को साइकल के फंसाव से उबारने आते..

दीपा दी चिल्‍लातीं चुप कर, बदमाश, ऐसे रो रही है जैसे चार तल्‍ले के बिल्डिंग से गिरी है!

बबुनी को यह सब कुछ नहीं सुन पड़ता, मौसा के खुद से दूर होते ही उसका चेहरा उतर जाता, बच्‍ची ढली सांझ की तरह एकदम पीयरा जाती..

Monday, April 26, 2010

आंग्‍स्‍ट..

पता नहीं यह आंग्‍स्‍ट मुझे कहां ले जाएगी. जबकि आईपीएल से मेरा कुछ लेना भी नहीं. न पूर्णा पटेल या सुप्रिया सुले से है. लेना. वो चाहें भले मुझे कुछ दे दें, मुझे उनको नहीं देना. एमसीआई (मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया) तक से मेरे गुप्‍त या प्रकट किसी तरह के संबंध नहीं. होते तो शायद कुछ करोड़ मेरे घर भी होता और इतना आंग्‍स्‍ट नहीं होता, मगर है. सोचकर ताज़्ज़ुब होता है अभी ज़्यादा समय नहीं हुआ, इसी आंग्स्‍ट के बूते फ्रांस और अल्‍जीरिया में पैदा हुए पता नहीं कैसे लेखक हंसते-खेलते साहित्यिक नोबेल तक पहुंच जाते थे, जबकि मैं रोते-गाते नोबलदेश क्‍या, फ्रांस तक भी नहीं पहुंच पा रहा हूं. कहीं नहीं पहुंच पा रहा हूं. इसी कुंठा के असर में रहा होगा कि कल किसी ब्‍लॉगर मीट की ख़बर मिलते ही, खुद को छकाकर बचाते हुए, अपने डेढ़ जोड़ी के अच्‍छे कपड़ों में स्‍वयं को सजाते, मैं त्‍वरित उछाल में बुंबई विमानस्‍थली पहुंच गया. ज़ाहिर है बाहर बाला इंतज़ार कर रही थी, मैंने चिढ़कर कहा, ‘मैं फ्रांस जा रहा हूं!’

ज़ाहिर है मेरी बात सुनकर बाला हंसने लगी. जिसका अंततोगत्‍वा ले-देकर वही मतलब बनना था, वही बना भी, कि कुछ बाला के बालपन के मोह, और कुछ मुफ़्ति‍या दावत की टोह में मैं जुहू पहुंच गया. फ्रांसोन्‍मुखी होना एक बार फिर रह गया..

मैं नहीं जानता कैसे मैं इस आंग्‍स्‍ट से निकल पाऊंगा. या यही कि हजारीप्रसाद द्वि‍वेदी कैसे निकले थे. या निकलने से पहले घुसे कैसे थे इन द फ़र्स्‍ट प्‍लेस? संभवत: उनके लिए आसान रहा होगा, क्‍योंकि सिर पर रविबाबू का हाथ था. बंगाली कन्‍याओं का साथ तो था ही. जबकि मैं देखता हूं तो चारों ओर मुझे सिर्फ़ रात दीखती है, और सुबह आंख खुले उसके पहले ही कान खुल जाता है, क्‍योंकि फ़ोन की घंटी बज रही होती है, और उसे बजने देने से रोकने की कोशिश में फिर मैं जाने क्‍या ऊट-पटांग बकने लगता हूं, मतलब क़ायदे से अभी दोपहर होती नहीं कि आंग्‍स्‍ट हो जाता है. रात में तो ख़ैर, हुआ रहता ही है.

डा. लुनाचार्स्‍की ने मानव जीवन के जितने भी कल्पित झमेले हैं उनका बड़ा ही विशद अध्‍ययन किया है, और लगभग उतनी ही गहराई से उनके समाधान भी लिखे हैं, बस यही एक आंग्‍स्‍ट का सवाल था जिसपर उनकी नज़र जाते-जाते रह गई. या जाते-जाते न भी रही हो तो उनके समाधान को मैं अब तक देखते-देखते ज़रूर रह जा रहा हूं. जबकि दायानोव पेंलिस्‍की का विचार काफ़ी विचारणीय है. पेंलिस्‍की साहब ने आज से करीबन सौ वर्ष पहले, सन् 1909 में ही कह दिया था, ‘व्‍हेन इन रोम, स्‍टे अवे फ्रॉम फ़ोन!’ कहा उक्राइनी में ही था जिसके इतालवी तर्जुमा का मैं सरल अंग्रेजी आपकी तरफ़ ठेल रहा हूं.

तो इस कहे का इकलौता कैच बस यही है कि मिस्‍टर पेंलिस्‍की के लिए अपने बोले पर टिकना आसान रहा होगा, मगर आज के समय में- इवन फॉर समवन इन माई शूज़ काइंड ऑफ सिचुएशन- कोई क्‍या खाकर फ़ोन से अवे रहेगा? अरे, फॉरगेट अबाउट रोम, रैदासपुर तक में फ़ोन से दूर रह पाना आज संभव है? आप दूर रह भी लीजिए, नेटवर्क आपको खींचकर जोड़े जाती है.

ख़ैर, लास्‍ट टाइम व्‍हेन आई वॉज़ इन रोम, मेरी समस्‍या का जल्‍दी ही समाधान हो गया. इसके पहले कि मैं अपने फ़ोन का कुछ करूं, एक नपोलितानो सुकुमारी थी, विया वेनेतो में फ़ोन समेत मेरे कंधे के समूचे झोले का कुछ कर गई! माने नैन चुराने की हिमाकत करने की जगह मेरा झोला मार गई.

मैंने छोकरी का शुक्रिया-टुक्रिया किया, फिर लजाये-लजाये पूछने से बाज न आ सका, कि ‘कन्‍ये, मगर ऐसा तूने किया क्‍यों?’

नपोलिताना चोट्टी नंबर वन, ज़ाहिर है नज़ाकत में सिर झुकाकर बोली, ‘प्रियवंत, जानती थी तुम हिंद के पुरुषोत्तम हो, दिल तुम्‍हारा चुरा नहीं सकती, इसीलिए झोले का ज़रा सा बिल भर हटा लिया, ग़र ग़लती हुई तो करो सर कलम, अधिकार बनता है तुम्‍हारा?’

स्‍वाभाविक है हसीना का हाथ खींचे मैं फोंताना दी त्रेवी की ओर लिए गया और राजेश खन्‍ना-नंदा अभिनीत, श्रीयुत रविकांत नगाइच निर्देशित ‘दि ट्रेन’ के ‘गुलाबी आंखें, जो तेरी देखीं, शराबी ये दिल हो गया, संभालो मुझको, ओ मेरे यारो, मोहब्‍बत मुझको हो गयाSSS.. लल्‍लाSSSS ललाSSSS..’ की तर्ज़ पर देह को झटके देने लगा, नपोलिताना नवयौवना नहीं दे पा रही थी, मेरी अदाओं पर रीझकर, घबराकर बेचारी, लता की जगह रफ़ी को गाने लगी, ‘रात के हमसफ़र, थकके घर को चले, लो सुभा आ गई एटसेट्रा एटसेट्रा..’

लेकिन डेढ़ महीने बाद मैं फिर उड़ीसा में था, और गुजराती में कविता लिखने की कोशिश में लगातार नाकाम हो रहा था, जबकि हिंदी में जो लिखे थे, विदेशी प्रकाशक उनका डच या फ्रेंच अनुवाद छापने से एकदम मुंह चुरा रहे थे. मैं लगातार हिल रहा था मगर कुछ ठीक से हिला नहीं पा रहा था, मतलब वर्तनी में भले गलत होऊं, भाव में फिर वही, आंग्‍स्‍ट पीड़ि‍त था.

अभी भी हूं. और फ़ोन की घंटी फिर बजने लगी है..

Thursday, April 22, 2010

मन की बात..

रहते-रहते आती है जाने कहां से आती है, कि गहीन अंधारे सन्‍न् सुबेर हो जाता हूं, सिर नवाये, घबराये लजाये की कंगलई में कुबेर. बरसाती नाला-सा भहर बहा आता है, बेहयायी हंसी-बसी पुलकदायी खुशी में समूचा ढेर.. मुलतानी पठान, विज्ञापन फ़ि‍ल्‍मों का बबर शेर हो जाता हूं, ओह, गर्वीला शमशेर.

बीच जंगल तारोंभरी सुलगती रात फुसफुसाके गाती है- अच्‍छा? मैं गाल बजाता खिला, बच्‍चे-सा किलकिलाता हूं- हां, हां!

ठिलता, ढुलमुलाता आता है, ‘आये हैं, आये हैं!’ बताता, अदेखे पुराने काठ के-से बक्‍से में छुपे बजते रहते हैं शब्‍द, बिम्‍ब कई अजाने तानों के अपहचाने ज़मानों के, खुशी में पुलकता हूं कि हाय, लिखना जानता नहीं, अभी खुद तक को पहचानता नहीं, लेकिन फिर भी मेरे संगी हैं, मेरे सियाह के सतरंगी!

फिर सोचता हूं चमकती रात की अनूठी इस बारात में, कभी तो लिखने जैसा लिख लूंगा, जैसे हंसने जैसा हंस लेता हूं, अपने में अदेखे के सपनों में. रोते-रोते जी लेता हूं, वैसे ही कभी हंसते-हंसते देख आऊंगा, अपने को उलझे में कित्‍ता सीधे-सीधा लिख पा रहा हूं, जैसा खुद को सन्‍न् देखूंगा और बजते शब्‍दों के वाद्यबहुरंग सजाऊंगा.

ओहोहो, पूरी-पूरी रात लिक्‍खे जाऊंगा.

(यह खा़स म. के लिए)

हाय रे हाय, दुपहरिया नींद नै आय..

का करे अमदी, सिर फोर ले? मगर सिर तS फुटले है, मतलब खांचावाला ऊ कपार, जेकरा बीच बाबू किस्‍मतकुमार अपना सेटिंग लिये हैं, ऊ किस्‍मत-कसार तS फुटलके हाथ भेंटाइल है, फिर सिर फोरे का अरमान में कवन नवका ऐलीमेंट ठेल रहे हैं? पुरनके सेंटीमेंटल नै बोल रहे हैं?

मगर ई एतना गरमी में अमदी का करे? केतना तरबूज का फांकी खाये और फ्रिज का बोतल-बोतल पानी पिये? तरबूज का पइसा मगर आपका बापजी देंगे? नहीं ऊ काहे ला देंगे, देना होगा त आपको देंगे, हमको ई गरमी में मां-बहिन का गारी देंगे, तरबूज अऊर खरबूज का मीठा काहे ला देंगे? हमरा तS सच्‍च पूछिये इच्‍छा हो रहा है कि अपना गरम कपार हियें छोर के, आत्‍मा का नरम मुलायमी पे सवार पहाड़ोन्‍मुखी हो जायें, हुआं बरफ़ का सोहाना वादी में अपना जाकिट हवा में ओछाल, महेंदर कपूर का मानबता का सलामी गावे लगें, ‘हे नील गगन के तले, धरती का पियार पले, हे हे!..’

या चीनार का पेड़ का तना से पीठ लगाके किसनचन्‍नर वाला सब ऊ रोमानी कहानी लिख दें.. कि हमरा पाछे तीन गो लइकी अपना घर से भागके ‘एगो गदहा का आतमकथा’ चरितार्थ करे लगे? हंसते जख़म का गाना रोवे लगे.. कि ‘तुम जो मिल गये हो, त जहां मिल गया है.. जमीं मिल गया अऊर आसमां मिल गया..’

मगर सब ई फलतू का गाना है! जमीन अऊर आसमां तS मिलले जाता है.. ज़रूरत का बखत बस एगो पानीये है जो नहीं भेंटाता.. बीच बरफ़ में टहिलते रहिये तब्‍बो नै भेंटायेगा, हां.. जइसे हम तरबूज कीन के ले आते हैं, लेकिन खाये का हिम्‍मत नहीं होता.. या भूलल-भटकल कवनो दोस्‍ती का दोष आ जाये, तS ओकरा आगे हरीयर गोला देखाये का!

अदमी का, या अदम का.. जवनो है ऊ.. ई हाल कब से हो गया? हमरे बापोजी के टैम में था? मगर ऊ तS अराम से आम का चुसनी चूसते रहते थे? ई हम्‍मे हैं कि तरबूजी का फांकी काटते हैं अऊर दूसरका तरफ हमरा करेजा का फांकी-फांकी कटने लगता है.. कि सब्‍ब खरबूजा आजे खा लेंगे त कल कौची खावेंगे? घेंवड़ा?

मालूम नहीं ई जीबन में एतना दुख काहे ला है? जोबनाबस्‍था में तS था ही, ई बुढ़ौतियो में मुक्ति नै है! जब दुनिया छोरके निकल जायेंगे तब दुख हेरायेगा, हट जायेगा हरमखोर? एगो साथी से हार के बोले, ‘बड़ संकट है, साथी, तुम अपना सोनाओ, तुम्‍मर ओर कइसे कट रहा है?’ तS बाबू बोले, ‘शहीदों की मांडों पर भी लगते हैं मेले’.. अऊर ओकरा बाद, ‘बंगलोरु का मौसम खुशनुमा है’ अब अइसे रहस्‍सबाद का कोई का करे, आपै बताइये! हियां ससुर अमरीका तक ले में जीना मुहाल है, हम नहीं, हुंवे वाली सपनमहिर्षी बोल रही हैं, और एक नहीं, दू जगहीं का कोटिन दे रही हैं, अऊर ई दिलदार बंगलोर बकलोल का चिरकुट गान कै रहे हैं?

मगर, का करे अदमी? जी, सिर फोर ले? कि पद्द में आत्‍मा बोर के कबिता करे लगे?

मालूम नहीं.. आप कनफुजिया के सपनमहिर्षी वाला लिंकिंन सब काहे ला पढ़े नै लगते हैं?

Sunday, April 11, 2010

इस एकदम ज़रा देर के लिए में जितना जीवन होगा..

एक‍दम ज़रा देर के लिए होगा, बस ज़रा ज़रा देर के लिए कि जिजीविषा भरी वह आवाज़ धौंकती आएगी, बगल से गुज़र जाएगी इक सिसकारी, छाती पर भारी लिपटे लपेटे जैसे आग और धुएं के धुंध में दगे गुज़रते थे वो गुज़रे ज़मानों के इंजन, धक् कलेजा मुंह को आता था और माथे के केश उड़े, खुद से छूटे जाते, आह्, नज़र किस कदर थरथरायी थरथराती जाती थी. हूकती उस दीवानी पुकार में सब कैसा जड़वत ठहर जाता, देह फुसफुसाकर शिकायत करता यह हमें किस ठहरे ठांव ठहराव में बांध रखा है, सांसें गश खाकर गिरी जातीं, बस, उस ज़रा देर के लिए.

एक आवाज़ को अचानक इस तरह इतना अर्थ क्‍यों मिल जाता है? इस बेरहम जीने को? एक नज़र ज़रा सी, खुली आंखों मुस्‍काना किसी का इस तरह खुद से खुद को बेग़ाना बनाता, धम्म ऊंचे पहाड़ की नोक खींचे लिए जाता और वहां से नीचे फिर कहीं और गहरे छोड़े आता, मन-मोहिल, चोटिल फिर भी सारंगियों के सुर तनी बजती चलतीं, उस ज़रा सा में, हाय, ऐसा क्‍या होता कि आत्‍मा खिल-खिल सुधखोयी खिलखिलाती, सजी-संवरी खुद में क्‍या-क्‍या बजाती रहती.

मालूम नहीं किस देश की तुम हो, ओ अनजानी ज़बान की गानेवाली, और मेरा मुलुक कहां है, और यह सबकुछ बिसरा देनेवाले संगीत का ठीक मतलब क्‍या है, जैसे जीवन को इतना जान लेने का कि फिर जीया पहचानने तक में मुश्किल हो? यूं भी सोचनेवाली बात है इस छोटी सी देह में कहां से आता है इतना जीवनघुला संगीत, कि तुम तभी तो गाती भी नहीं, माइक के करीब सिर्फ़ मुंह लिये जाती, गाने के पहले नज़रों में ज़रा सा रार मुस्‍काती हो, और फिर कैसे इतने में होता है कि आत्‍मा में वे सारे गाने गूंथे, बिछे महक राह बने जाते हैं जिन्‍हें कभी बहुत बाद के वर्षों तक तुम गाती रहोगी, धुएं और कालिख के बीच कौंधती खुलकर हंस सकने की गरिमा में इस पिटे, पटके मुंहखुले जीवन को बारहा बार-बार नहलाती रहोगी..

Friday, April 9, 2010

नक्‍सलवाद का जवाब है हमारे पास?

ऐसे में यह मज़ेदार है जब घेरे में फंसे दोनों पालों का देवों और दानवों में स्‍थूल विभाजन करके, देवों का पाला थामे दानवों के चिथड़े उड़ाये जा रहे हों, एक बुजुर्ग गांधीवादी ऐसी सन्-सन् फिजा में भी तटस्‍थता की चंद समझदार बातें करते दीखें.

आप भी भरी हुई बंदूक लिये देश के जितने भी हैं सब माओवादियों को सिर्फ़ भून आने की मंशा और गुस्‍सा न रखते हों, ठंडे मन एक बार फिर सवाल पर विचार करना चाहते हों, तो आप भी एक नज़र मारें विस्‍फोट पर श्री बजरंग मुनि जी कह क्‍या रहे हैं.

कुछ सवाल साथ-साथ अभी उतने बुजूर्ग नहीं हुए, लेकिन समूची बुर्जूगीयत से ही पूछ रहे बाबू रवीश कुमार हैं, और बहुत ग़लत नहीं ही पूछ रहे हैं, थोड़ा उधर भी ध्‍यान गिराइए..

Thursday, April 8, 2010

बच्‍ची और मैं और धू-धू जलता दिन..

बच्‍ची फिर आकर अपने पोज़ीशन पर खड़ी हो गई है और आंखें फाड़े मुझे घूर रही है! अरे, इसे कोई रोकेगा नहीं? शरीफ़ों के मुहल्‍ले में ये क्‍या तमाशा है! (ठीक है कि मुहल्‍ले में मैं भी रहता हूं, मगर मुहल्‍ला शरीफ़ ही है. बच्‍ची के घरवाले तक शरीफ़ लोग हैं. बच्‍ची के बारे में भी अभी कुछ दिनों पहले तक मेरी ऐसी ही ग़लतफ़हमी थी. अब नहीं हैं. मतलब अरे, कोई तरीका है ये? एकदम अच्‍छी बात नहीं, माने पड़ोस की है तो इसका क्‍या मतलब हुआ..) ख़ैर, तो मैं कह रहा था पड़ोस की बच्‍ची है, जब-तब मुंह उठाये मेरे दरवाज़े आकर खड़ी हो जाती है, और फिर उसी नज़र से मुझे ऊपर-नीचे ताकती है जैसे पुलिस का कोई घिसारा यारख़ां जाली नोट छापनेवाले किसी घसियारे को ताड़ता होगा. आम तौर पर मैं दरवाज़ा भेड़े ही रहता हूं. क्‍योंकि यूं भी अच्‍छा नहीं लगता कि कोई आठ साल की बच्‍ची, या उसकी मां ही, आकर जाने, या मुझे जनवाती फिरे मैं किस कोटि का घसियारा हूं. मगर वही है इन दिनों मौसम की मार है (किन्‍हीं और दिनों कोई और मार रहती है, बिना मारिल, चोटिल दिन कहां रहते हैं?), लू भले नहीं चल रही, मगर समूचा दिन धू-घू जलता ही रहता है, तो इसमें वही होता है कि मेरे जैसी कड़ी इच्‍छाशक्ति का व्‍यक्ति भी एक पॉयंट के बाद ठहरी हवा से हारकर जिस तरह देह के सारे कपड़े उतार फेंकता है, उसी तरह मजबूरी में लात मारकर बंद दरवाज़ा खोलने को भी बाध्‍य हो जाता है. और ज़ाहिरन, उसके बाद वही होता है कि बच्‍ची बबुनी मुंह उठाये खुले दरवाज़े की दहलीज़ पर मिस बाघ की मानिंद आ खड़ी होती हैं और मुझ अज़ीज़ को किसी नाचीज़ जानवर की तरह निरखने लगती हैं. पता नहीं क्‍या दिक़्क़त है लड़की इस तरह ओछे जानवरत्‍व में मुझे नहलाती क्‍यों रहती है. जबकि ऐसी जानलेवा गरमी के बावजूद मुझे याद नहीं पड़ता कि कभी बेहोशी में भी जबर्दस्‍ती उसके नहानघर घुसकर ठंडे पानी से नहा लेने जैसी गुस्‍ताख़ी की हो मैंने. नहीं की है. मतलब होश में की है जैसा तो नहीं ही याद पड़ता. फिर भी लड़की दरवाज़े पर खड़ी मुझे ऐसे घूरती रहती है मानो मैं ‘तीसरी कसम’ का सीएस दुबे हूं. या ‘मदर इंडिया’ का कन्‍हैयालाल. जबकि दोनों निहायत बदसूरत थे और मेरे साथ ऐसी कोई बात है नहीं.

हां, कुछ दिन पहले अलबत्‍ता इतना ज़रूर हुआ था (मगर वह मामूली घटना थी, गरमी के दिनों ऐसा आम तौर पर होता है, कम से कम मेरे साथ तो होता ही है) कि मैं उघारे बदन कुर्सी पर बेहाल पसरा हुआ, लाचार पैर बिछौने के मसनद पर गिरे पड़े, और मुंह में संतरे के फ्लेवर वाला सस्‍ता चुसनी आइसक्रीम. अभी तीन या चार काटे ही काटे होंगे कि बेशरम बच्‍ची बजाय इसके कि अपने घर फालतू की पढ़ाई करती रहे, या अपनी मां के फालतू घरेलू कामों में हाथ बंटाये, मेरे दरवाज़े आकर खड़ी हो गई. और लगी घूरने. चूंकि मुंह में चुसनी आइसक्रीम के आनंद के मैं बीचों-बीच था, इसलिए बच्‍ची के अचानक चले आने से दम भर को चौंकन्‍ना हुआ, मगर तत्‍क्षण ही फिर लापरवाह भी हो गया. लड़की भी हुई, और तत्‍क्षण ही बोली, ‘मैं भी आइसक्रीम खाऊंगी!’ आइसक्रीम एक ही था, जिसका फ़ि‍लहाल एक चौथाई मेरे पेट में, एक चौथाई मुंह में था, और बाकी का जो भी था उसे बच्‍ची पर लुटाने की मेरी मंशा नहीं थी, इसीलिए मेरे मुंह से भी तत्‍क्षण उसी लापरवाही से बात छूटी होगी, ‘खाओ, अपने बाप से लेकर खाओ, मैंने मना थोड़ी किया है!’ इसके बाद यही हुआ कि बच्‍ची चुपचाप मुझे आइसक्रीम खाता देखती रही था, और मैं सड़प्- सड़प् के शोर में संतरे के पता नहीं किस तरह के फ्लेवर के आनंद में डूबा रहा. गोकि अचानक बीच में मुझे भय जरूर हुआ था कि मेरा आइसक्रीम लूटने से रह गई कंगलिन कुमारी भां-भां रोने लगेगी और उसके शोर में तमाशबीन इकट्ठा हो जाएंगे और मैं अपने आइसानंद से वंचित रह जाऊंगा, मगर अच्‍छा हुआ, बेवकूफ़ लड़की ने ऐसी कोई बेवकूफ़ी नहीं की, और बावज़ूद दरवाज़ा के खुले रहने के, एक निजी आनंद के सार्वजनिक बंटवारे से मैं किसी तरह खुद को बचा ले गया.

मगर फिर भी मान लेनेवाली बात है कि घटना मामूली ही थी. मामूली न होती तो उस रुपल्‍लीभर के चुसनी आइसक्रीम के लिए लड़की ने मेरा जीना- मतलब चैन से चूसना- हराम ज़रूर कर दिया होता, लेकिन ऐसा लड़की ने कुछ नहीं किया था, वह चुपचाप देखती रही थी और मैं ज़रा कम चुपचाप चपर-चपर ऑरेंज-फ्लेवर चबाता रहा था. इसीलिए कभी-कभी मैं कहता हूं सही ही कहता हूं कि अच्‍छे घरों में पैदा होकर बच्‍चे अच्‍छे संस्‍कार पा ही जाते हैं. क्‍योंकि इसकी पूरी संभावना है कि वह बच्‍ची अपने घर की बजाय कहीं मेरे यहां पैदा हुई होती तो फिर असंभव ही होता कि एक बार मांग चुकने के बाद मैं चुपचाप आइसक्रीम चबाता होता और वह मुझे ताड़ती चुप खड़ी बनी रहती! जबकि उस अबव मेंशंड मामूली घटनाकारी दिन के बाद यह ज़रूर जाने कैसे हो गया है बच्‍ची मुझे कुछ ऐसे घूरती है मानो मैंने उसके घर कोई चोरी की हो! (अलग बात है वह की भी है, मगर वह बच्‍ची क्‍या उसकी मां को भी कहां मालूम है? आपको भी बताऊंगा इस मुग़ालते में मत रहिए..)

ख़ैर, आजवाले मामले पर लौटें. थोड़ी देर तक बेहया मुझे घूरती रही तो मैंने भी बेहयायी में नज़रअंदाज़ करके अपने को उसकी स्‍क्रूटनी से निकाल एक अन्‍य ज़रूरी काम में डाल लिया. फ्रि‍ज़ का बर्फ़ निकालकर एक कठवत के पानी में मिला फिर चैन से उस ठंडे जल में पैर डाले धू-धू जलते दिन की काट का ठंडा, मीठा आनंद लेता बैठूंगा का रोमानी सोच ही रहा था कि चुपचाप खड़ी बच्‍ची एकदम से हरकत में आई और बिछौने पर पड़े मेरे डिब्‍बे के चारों सिगरेटों को तेजी से कठवत के पानी में पलटकर उसी तेजी से मुझे एकदम सन्‍न कर दिया, मैं गुस्‍से के पहाड़ पर चढ़ा दहाड़ा, ‘अबे, दिमाग खराब है तुम्‍हारा? उसको पानी में क्‍यों डाल दिया? अब पियूंगा कैसे?’

बच्‍ची इतमिनान से बोली, ‘जैसे पानी पीते हो, मुंह से.’

अबकी घूरने का काम बच्‍ची की जगह मैं कर रहा था, लेकिन घुराई के लिए कोई वहां था नहीं, अलबत्‍ता सिगरेट थे मगर कठवत के पानी में तेजी से दम तोड़ रहे थे. धू-धू दिन अलबत्‍ता अपनी जगह जल रहा था..

Wednesday, April 7, 2010

हिंदी का कवि होगा..

बड़ा भेड़ होगा हिंदी का कवि होगा
लहकेगा, तीन पत्‍ते की डाल के पीछे
बहकेगा, जाने कौन नैतिकता की रास
होगी (रास माने रस्‍सी) कि भाषा की खास
नाद से बंधे होंगे, उसी में फुत्‍कारेंगे, दुम
झारेंगे, जैसे रेलवे की रिर्जव सीट है उससे
हट नहीं सकते, किसी भी सूरत में वाक़ई जैसे
जीवन में जब फटी होती है उस ज़बान में फट
नहीं सकते, बीवी को किसी और बोली में
चुमकारेंगे, बच्‍चे की खातिर कांख-कांखकर
किसी औरे बुलवन में हारेंगे, लेकिन हाथ में
कलम आते ही मां सरस्‍वती की साड़ी, चढ़ी हुई
ताड़ी होने लगेंगे, आप गुनगुनाते रहियेगा मज़रूह
और आनंद बक्षी, साहित्‍याकाश के लिए आप बने
रहियेगा पप्‍पूलाल, वो खिलाड़ी हो लेगे, मतलब
साहित्‍य की वही पुरानी पहचानी चाल होगी, नाक में
बाल और समाज वही अपनी जगह बेहाल होगा.

Tuesday, April 6, 2010

फिर हुआ..

फिर हुआ हम अपनाइयों में घिरे
किरकिरायी कितनीं, टूटे कांच के
टुकड़े, किरकिराती थकाती, बनाती
रहीं ग़लतफ़हमियां, ज़ाहिर है होना था
आख़ि‍र आदमी की जात हैं, हुआ
हम चौंके चौंकते रहे, मगर सच्‍चा
डरे, बहुत आसानी से बड़ी रवानी में
सीधे एकदम साफ़-साफ़ गिरे
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