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Apr 6, 2010

फिर हुआ..

फिर हुआ हम अपनाइयों में घिरे
किरकिरायी कितनीं, टूटे कांच के
टुकड़े, किरकिराती थकाती, बनाती
रहीं ग़लतफ़हमियां, ज़ाहिर है होना था
आख़ि‍र आदमी की जात हैं, हुआ
हम चौंके चौंकते रहे, मगर सच्‍चा
डरे, बहुत आसानी से बड़ी रवानी में
सीधे एकदम साफ़-साफ़ गिरे
.

9 कमेंट:

अपूर्व said...

जब-तब आपकी पहेलीदार पोस्टें दिमाग को बड़े चक्कर-टाइप मे डाल देती हैं...कि पालिटिकली-करेक्ट हो पाने का मन करता है.अपनाइयों मे घिरना तो बढ़िया बात लगता है..फिर डर काहे का..मगर यह चौंक-चौंक कर फिर साफ़-साफ़ गिरना मुझे पोस्ट पढ़ कर अपनी अकल पर गिरने वाले परदों को तरह सुनाई देता है..और क्या..

Ashok Pandey said...

आपके मन की गांठ को समझना बड़ा मुश्किल होता है।

Udan Tashtari said...

अपनाइयों को ठीक ठीक पहचान लिए थे न आप??

संजय भास्कर said...

बहुत सुन्दर रचना । आभार
ढेर सारी शुभकामनायें.

Sanjay kumar
http://sanjaybhaskar.blogspot.com

प्रवीण पाण्डेय said...

अपनों से किरकिराना केवल स्वयं को अनुभव होता है । घटना हो तो व्यक्त करें, अहसास कैसे पिरोयें शब्दों में ।

कुश said...

उफ़! ज़िन्दगी की वो गलतफहमिया..!

Beji said...

ab gaanTh bandhane ke liye khinchne ka dard to jhelna hi padega na.....

Beji said...

बात को सिरे से
उठाकर
हाथ की उँगलियों में
पिरोया
मीनार सा फिर
बना कर
उसे ठुड्डी पर चढ़ाया
ख्याल से थोड़ा उलझा...
कुछ खिंचा
अंगूठे के सिरे से...
आवेग आवेश
के बीच
हिलाते झुलाते
उलझते सुलझते
बनते बिगड़ते
गाँठ पड़ गई।

Amitraghat said...

"सही बात है आदमी सीधे-सादे जीवन को चक्करदार बना देता है नतीजे में फिर ऐब्सट्रक्ट कविता निकलती हैं............"