Apr 8, 2010

बच्‍ची और मैं और धू-धू जलता दिन..

बच्‍ची फिर आकर अपने पोज़ीशन पर खड़ी हो गई है और आंखें फाड़े मुझे घूर रही है! अरे, इसे कोई रोकेगा नहीं? शरीफ़ों के मुहल्‍ले में ये क्‍या तमाशा है! (ठीक है कि मुहल्‍ले में मैं भी रहता हूं, मगर मुहल्‍ला शरीफ़ ही है. बच्‍ची के घरवाले तक शरीफ़ लोग हैं. बच्‍ची के बारे में भी अभी कुछ दिनों पहले तक मेरी ऐसी ही ग़लतफ़हमी थी. अब नहीं हैं. मतलब अरे, कोई तरीका है ये? एकदम अच्‍छी बात नहीं, माने पड़ोस की है तो इसका क्‍या मतलब हुआ..) ख़ैर, तो मैं कह रहा था पड़ोस की बच्‍ची है, जब-तब मुंह उठाये मेरे दरवाज़े आकर खड़ी हो जाती है, और फिर उसी नज़र से मुझे ऊपर-नीचे ताकती है जैसे पुलिस का कोई घिसारा यारख़ां जाली नोट छापनेवाले किसी घसियारे को ताड़ता होगा. आम तौर पर मैं दरवाज़ा भेड़े ही रहता हूं. क्‍योंकि यूं भी अच्‍छा नहीं लगता कि कोई आठ साल की बच्‍ची, या उसकी मां ही, आकर जाने, या मुझे जनवाती फिरे मैं किस कोटि का घसियारा हूं. मगर वही है इन दिनों मौसम की मार है (किन्‍हीं और दिनों कोई और मार रहती है, बिना मारिल, चोटिल दिन कहां रहते हैं?), लू भले नहीं चल रही, मगर समूचा दिन धू-घू जलता ही रहता है, तो इसमें वही होता है कि मेरे जैसी कड़ी इच्‍छाशक्ति का व्‍यक्ति भी एक पॉयंट के बाद ठहरी हवा से हारकर जिस तरह देह के सारे कपड़े उतार फेंकता है, उसी तरह मजबूरी में लात मारकर बंद दरवाज़ा खोलने को भी बाध्‍य हो जाता है. और ज़ाहिरन, उसके बाद वही होता है कि बच्‍ची बबुनी मुंह उठाये खुले दरवाज़े की दहलीज़ पर मिस बाघ की मानिंद आ खड़ी होती हैं और मुझ अज़ीज़ को किसी नाचीज़ जानवर की तरह निरखने लगती हैं. पता नहीं क्‍या दिक़्क़त है लड़की इस तरह ओछे जानवरत्‍व में मुझे नहलाती क्‍यों रहती है. जबकि ऐसी जानलेवा गरमी के बावजूद मुझे याद नहीं पड़ता कि कभी बेहोशी में भी जबर्दस्‍ती उसके नहानघर घुसकर ठंडे पानी से नहा लेने जैसी गुस्‍ताख़ी की हो मैंने. नहीं की है. मतलब होश में की है जैसा तो नहीं ही याद पड़ता. फिर भी लड़की दरवाज़े पर खड़ी मुझे ऐसे घूरती रहती है मानो मैं ‘तीसरी कसम’ का सीएस दुबे हूं. या ‘मदर इंडिया’ का कन्‍हैयालाल. जबकि दोनों निहायत बदसूरत थे और मेरे साथ ऐसी कोई बात है नहीं.

हां, कुछ दिन पहले अलबत्‍ता इतना ज़रूर हुआ था (मगर वह मामूली घटना थी, गरमी के दिनों ऐसा आम तौर पर होता है, कम से कम मेरे साथ तो होता ही है) कि मैं उघारे बदन कुर्सी पर बेहाल पसरा हुआ, लाचार पैर बिछौने के मसनद पर गिरे पड़े, और मुंह में संतरे के फ्लेवर वाला सस्‍ता चुसनी आइसक्रीम. अभी तीन या चार काटे ही काटे होंगे कि बेशरम बच्‍ची बजाय इसके कि अपने घर फालतू की पढ़ाई करती रहे, या अपनी मां के फालतू घरेलू कामों में हाथ बंटाये, मेरे दरवाज़े आकर खड़ी हो गई. और लगी घूरने. चूंकि मुंह में चुसनी आइसक्रीम के आनंद के मैं बीचों-बीच था, इसलिए बच्‍ची के अचानक चले आने से दम भर को चौंकन्‍ना हुआ, मगर तत्‍क्षण ही फिर लापरवाह भी हो गया. लड़की भी हुई, और तत्‍क्षण ही बोली, ‘मैं भी आइसक्रीम खाऊंगी!’ आइसक्रीम एक ही था, जिसका फ़ि‍लहाल एक चौथाई मेरे पेट में, एक चौथाई मुंह में था, और बाकी का जो भी था उसे बच्‍ची पर लुटाने की मेरी मंशा नहीं थी, इसीलिए मेरे मुंह से भी तत्‍क्षण उसी लापरवाही से बात छूटी होगी, ‘खाओ, अपने बाप से लेकर खाओ, मैंने मना थोड़ी किया है!’ इसके बाद यही हुआ कि बच्‍ची चुपचाप मुझे आइसक्रीम खाता देखती रही था, और मैं सड़प्- सड़प् के शोर में संतरे के पता नहीं किस तरह के फ्लेवर के आनंद में डूबा रहा. गोकि अचानक बीच में मुझे भय जरूर हुआ था कि मेरा आइसक्रीम लूटने से रह गई कंगलिन कुमारी भां-भां रोने लगेगी और उसके शोर में तमाशबीन इकट्ठा हो जाएंगे और मैं अपने आइसानंद से वंचित रह जाऊंगा, मगर अच्‍छा हुआ, बेवकूफ़ लड़की ने ऐसी कोई बेवकूफ़ी नहीं की, और बावज़ूद दरवाज़ा के खुले रहने के, एक निजी आनंद के सार्वजनिक बंटवारे से मैं किसी तरह खुद को बचा ले गया.

मगर फिर भी मान लेनेवाली बात है कि घटना मामूली ही थी. मामूली न होती तो उस रुपल्‍लीभर के चुसनी आइसक्रीम के लिए लड़की ने मेरा जीना- मतलब चैन से चूसना- हराम ज़रूर कर दिया होता, लेकिन ऐसा लड़की ने कुछ नहीं किया था, वह चुपचाप देखती रही थी और मैं ज़रा कम चुपचाप चपर-चपर ऑरेंज-फ्लेवर चबाता रहा था. इसीलिए कभी-कभी मैं कहता हूं सही ही कहता हूं कि अच्‍छे घरों में पैदा होकर बच्‍चे अच्‍छे संस्‍कार पा ही जाते हैं. क्‍योंकि इसकी पूरी संभावना है कि वह बच्‍ची अपने घर की बजाय कहीं मेरे यहां पैदा हुई होती तो फिर असंभव ही होता कि एक बार मांग चुकने के बाद मैं चुपचाप आइसक्रीम चबाता होता और वह मुझे ताड़ती चुप खड़ी बनी रहती! जबकि उस अबव मेंशंड मामूली घटनाकारी दिन के बाद यह ज़रूर जाने कैसे हो गया है बच्‍ची मुझे कुछ ऐसे घूरती है मानो मैंने उसके घर कोई चोरी की हो! (अलग बात है वह की भी है, मगर वह बच्‍ची क्‍या उसकी मां को भी कहां मालूम है? आपको भी बताऊंगा इस मुग़ालते में मत रहिए..)

ख़ैर, आजवाले मामले पर लौटें. थोड़ी देर तक बेहया मुझे घूरती रही तो मैंने भी बेहयायी में नज़रअंदाज़ करके अपने को उसकी स्‍क्रूटनी से निकाल एक अन्‍य ज़रूरी काम में डाल लिया. फ्रि‍ज़ का बर्फ़ निकालकर एक कठवत के पानी में मिला फिर चैन से उस ठंडे जल में पैर डाले धू-धू जलते दिन की काट का ठंडा, मीठा आनंद लेता बैठूंगा का रोमानी सोच ही रहा था कि चुपचाप खड़ी बच्‍ची एकदम से हरकत में आई और बिछौने पर पड़े मेरे डिब्‍बे के चारों सिगरेटों को तेजी से कठवत के पानी में पलटकर उसी तेजी से मुझे एकदम सन्‍न कर दिया, मैं गुस्‍से के पहाड़ पर चढ़ा दहाड़ा, ‘अबे, दिमाग खराब है तुम्‍हारा? उसको पानी में क्‍यों डाल दिया? अब पियूंगा कैसे?’

बच्‍ची इतमिनान से बोली, ‘जैसे पानी पीते हो, मुंह से.’

अबकी घूरने का काम बच्‍ची की जगह मैं कर रहा था, लेकिन घुराई के लिए कोई वहां था नहीं, अलबत्‍ता सिगरेट थे मगर कठवत के पानी में तेजी से दम तोड़ रहे थे. धू-धू दिन अलबत्‍ता अपनी जगह जल रहा था..