Friday, April 9, 2010

नक्‍सलवाद का जवाब है हमारे पास?

ऐसे में यह मज़ेदार है जब घेरे में फंसे दोनों पालों का देवों और दानवों में स्‍थूल विभाजन करके, देवों का पाला थामे दानवों के चिथड़े उड़ाये जा रहे हों, एक बुजुर्ग गांधीवादी ऐसी सन्-सन् फिजा में भी तटस्‍थता की चंद समझदार बातें करते दीखें.

आप भी भरी हुई बंदूक लिये देश के जितने भी हैं सब माओवादियों को सिर्फ़ भून आने की मंशा और गुस्‍सा न रखते हों, ठंडे मन एक बार फिर सवाल पर विचार करना चाहते हों, तो आप भी एक नज़र मारें विस्‍फोट पर श्री बजरंग मुनि जी कह क्‍या रहे हैं.

कुछ सवाल साथ-साथ अभी उतने बुजूर्ग नहीं हुए, लेकिन समूची बुर्जूगीयत से ही पूछ रहे बाबू रवीश कुमार हैं, और बहुत ग़लत नहीं ही पूछ रहे हैं, थोड़ा उधर भी ध्‍यान गिराइए..

12 comments:

  1. इलाज कुछ लगता तो सही है। लेकिन इस दवा को बनाएँगे कैसे?

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  2. @द्वि‍वेदी जी,
    केस लड़ने का आपको अनुभव है, तो दवा तो आपे बताइएगा, हमारा तो लड़ाई का सारा अनुभव सिर्फ़ जबान लड़ाने भर का है, वह भी बीच-बीच में मुरझाये मूड के रस्‍ते चलता और गिरता रहता है..

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  3. मामला उतना सीधा नहीं जितना दिखाई देता है

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  4. ये कोई इलाज नहीं है
    क्योंकि एनडीटीवी और उसके कारिंदे किसके लिए काम करते हैं जग जाहिर है .

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  5. @महेश सिन्‍हा जी,
    ऐसे लोगों को सिर्फ़ उनकी कारिंदगी तक सीमित करके देखना शालीनता का तरीका नहीं. ऐसे बात कीजिएगा तो सबसे पहले देश के गृहमंत्री जी किसकी कारिंदगी करते रहे हैं उसकी बातें सामने आने लगेंगी. उनके गिरेबान में हम-आप झांकते फिरेंगे, और फिर वहीं इतना फिरते फिरेंगे कि सिर घूम जाएगा. मैं एक बात कह रहा था.

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  6. केंद्र सरकार निर्णय लेने में क्यों ढीलमढाल करती रही . दरअसल यह देन ही काँग्रेस की नीतियों है . काँग्रेस का तो बस्तर से जन्म जन्म का बैर है . प्रवीरचन्द्र भंजदेव से लेकर आजतक . कल तक इनका समर्थन करने वाले कारत ने भी पाला बदल दिया ? पंकज जो नाम आपने गिनाए हैं वह लिस्ट इतनी छोटी नहीं है .
    तथाकथित मानवाधिकार की बात करने वाले देश के सबसे बड़े दुश्मन हैं .
    नक्सलवाद का सच
    http://indian-sanskriti.blogspot.com/2010/04/blog-post_08.html .
    ये भी पढ़ें षड्यंत्र :तथाकथित मानवाधिकार वादियों बस्‍तर के आदिवासियों को मुहरा बनाना बंद करो
    http://aarambha.blogspot.com/2010/04/blog-post_09.html


    http://kabaadkhaana.blogspot.com/2010/04/1.html प्रवीर चन्द्र भंजदेव

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  7. @श्री महेश सिन्‍हा जी,
    लिंक पढ़ तो लूंगा, लेकिन फिर कहता हूं, लिंक की भी यह जबान, कि मानवाधिकार की बात करनेवाले देश के सबसे बड़े दुश्‍मन, आदिवासियों को मुहरा बनाना बंद करो, ज़हर फैलाना बंद करो टाइप.. आपको सचमुच लगता है यह बातचीत की भाषा है? या हाथ और लात चलाने वाली जबान है.. फिर आप यह भी सूचित कर रहे हैं कांग्रेस का तो बस्‍तर जनम जनम का बैर है. मैं आपसे पूछता हूं देश के किस हिस्‍से के आदिवासी हैं जिनसे कांग्रेस का जनम-जनम की मोहब्‍बत भी है, मेरे ज्ञान में कुछ संवृद्धि करें. वही बातें तो बाबू बजरंग मुनि ने विस्‍फोट की अपनी टिप्‍पणी में करी है, कांग्रेस की नीतियों की ही तो पड़ताल के सवाल हैं, और हां, सिर्फ़ कांग्रेस की बात ही नहीं, कर्नाटक में रेड्डी बंधु भी माफियात्‍व की नई ऊंचाइयां फलांगते हुए राष्‍ट्रोत्‍थान के कोई नये प्रतिमान नहीं स्‍थापित कर रहे, उनको देश की खनिज संपदा की इस लूट का अधिकार किसने दिया है, बीजेपी के चहेते और उस सरकार में मंत्रीपद पर हैं वे, ऐसी लूट मानवाधिकार की बात उठानेवाली एजेंसियां तो नहीं ही करतीं, सरकारें चुप रहती हैं, वहां स्‍थानीय लोग बहुत समय तक गुंडागर्दी के दबाव में नहीं चुप रहेंगे, फिर? उनके खिलाफ़ शिकायत उठानेवालों को फिर आप किसी का कारिंदा बताने लगिएगा?

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  8. hmm, post se jyada comments dhyaan khich reahi hai aur sahi dhyaan khich rahi hain kynki mool mudde ki baat in comments me hi ho rahi hai...
    padh lu fir kuchh kahna sahi hoga...

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  9. "फिलहाल कुछ महीनों या फिर कुछ सालों तक कुछ नहीं हो सकता सरकारों ने कई बेहतरीन मौके गँवाए हैं ...अब बदला लेने की बारी सीआरपीफ की है........."

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  10. @ प्रमोद सिंह जी
    आप लिंक तो पढ़िए . क्षद्म मानावधिकारी क्या क्या षड्यंत्र कर रहे हैं .
    रही बात माफिया की तो दोनों ओर वही हाल है आज नक्सलवाद और नेता आमने सामने खड़े हैं . बात घर के दो लोगों की लड़ाई का ही होता तो भी बात समझ में आती . नक्सलवाद के साथ चीन का हाथ है और यह उनके एक नेता भी कह चुके हैं की उनका इरादा भारत के टुकड़े टुकड़े करने का है .
    आम आदमी किसका साथ दे आप ही बताइये . उसकी तो कोई सेना नहीं है .

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  11. @सिन्‍हा साहब,
    आप सही कहते हैं, क्षद्म लोकोपकारी राज्‍य है तो छद्म मानवाधिकारी किस तरह नहीं होंगे, और बहुत बार यह सच्‍चायी है ही कि आम आदमी के लिए जीवन की कड़वाहट है, मदद को कोई नहीं है..

    @प्रणव बाबू,
    यह बदला लेने वाली भाखा काहे बोलते हो, भाई? यहां लोगों की ज़ि‍न्‍दगी चपेटे में है, यह कोई फ़ि‍ल्‍म शोले का सीनारिओ नहीं है, बाबू. यह बदला फिर कहां, कब खतम होगा, जब मुलुक के सब आदिवासी खत्‍म हो जायेंगे, तब? तब्‍बो खतम हो जाएगा?

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  12. श्री बजरंग मुनि जी के विश्लेषण से सहमत । फोड़ा कब से निकल रहा है । फोड़ा यदि इसलिये रहने दिया गया कि उसका सियासी प्रयोग किसी और दर्द से ध्यान हटाने के लिये किया जायेगा ।

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