Sunday, April 11, 2010

इस एकदम ज़रा देर के लिए में जितना जीवन होगा..

एक‍दम ज़रा देर के लिए होगा, बस ज़रा ज़रा देर के लिए कि जिजीविषा भरी वह आवाज़ धौंकती आएगी, बगल से गुज़र जाएगी इक सिसकारी, छाती पर भारी लिपटे लपेटे जैसे आग और धुएं के धुंध में दगे गुज़रते थे वो गुज़रे ज़मानों के इंजन, धक् कलेजा मुंह को आता था और माथे के केश उड़े, खुद से छूटे जाते, आह्, नज़र किस कदर थरथरायी थरथराती जाती थी. हूकती उस दीवानी पुकार में सब कैसा जड़वत ठहर जाता, देह फुसफुसाकर शिकायत करता यह हमें किस ठहरे ठांव ठहराव में बांध रखा है, सांसें गश खाकर गिरी जातीं, बस, उस ज़रा देर के लिए.

एक आवाज़ को अचानक इस तरह इतना अर्थ क्‍यों मिल जाता है? इस बेरहम जीने को? एक नज़र ज़रा सी, खुली आंखों मुस्‍काना किसी का इस तरह खुद से खुद को बेग़ाना बनाता, धम्म ऊंचे पहाड़ की नोक खींचे लिए जाता और वहां से नीचे फिर कहीं और गहरे छोड़े आता, मन-मोहिल, चोटिल फिर भी सारंगियों के सुर तनी बजती चलतीं, उस ज़रा सा में, हाय, ऐसा क्‍या होता कि आत्‍मा खिल-खिल सुधखोयी खिलखिलाती, सजी-संवरी खुद में क्‍या-क्‍या बजाती रहती.

मालूम नहीं किस देश की तुम हो, ओ अनजानी ज़बान की गानेवाली, और मेरा मुलुक कहां है, और यह सबकुछ बिसरा देनेवाले संगीत का ठीक मतलब क्‍या है, जैसे जीवन को इतना जान लेने का कि फिर जीया पहचानने तक में मुश्किल हो? यूं भी सोचनेवाली बात है इस छोटी सी देह में कहां से आता है इतना जीवनघुला संगीत, कि तुम तभी तो गाती भी नहीं, माइक के करीब सिर्फ़ मुंह लिये जाती, गाने के पहले नज़रों में ज़रा सा रार मुस्‍काती हो, और फिर कैसे इतने में होता है कि आत्‍मा में वे सारे गाने गूंथे, बिछे महक राह बने जाते हैं जिन्‍हें कभी बहुत बाद के वर्षों तक तुम गाती रहोगी, धुएं और कालिख के बीच कौंधती खुलकर हंस सकने की गरिमा में इस पिटे, पटके मुंहखुले जीवन को बारहा बार-बार नहलाती रहोगी..

3 comments:

  1. पता नहीं उस एक देर में क्या होता है....जब आपकी पोस्ट पर निगाह जाती है....शायद गश खाने जैसा कुछ या फिर....आपकी ही पोस्ट से उधार लिए शब्द.....एक पोस्ट मैं अचानक इतने सारे अर्थ क्यूँ मिल जातें हैं....:-)

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  2. गज़ब लिखा है जनाब........"

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  3. अब हम क्या बोले.. आपके मन की गाँठ को बस देखते जा रहे है..

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