Thursday, April 22, 2010

हाय रे हाय, दुपहरिया नींद नै आय..

का करे अमदी, सिर फोर ले? मगर सिर तS फुटले है, मतलब खांचावाला ऊ कपार, जेकरा बीच बाबू किस्‍मतकुमार अपना सेटिंग लिये हैं, ऊ किस्‍मत-कसार तS फुटलके हाथ भेंटाइल है, फिर सिर फोरे का अरमान में कवन नवका ऐलीमेंट ठेल रहे हैं? पुरनके सेंटीमेंटल नै बोल रहे हैं?

मगर ई एतना गरमी में अमदी का करे? केतना तरबूज का फांकी खाये और फ्रिज का बोतल-बोतल पानी पिये? तरबूज का पइसा मगर आपका बापजी देंगे? नहीं ऊ काहे ला देंगे, देना होगा त आपको देंगे, हमको ई गरमी में मां-बहिन का गारी देंगे, तरबूज अऊर खरबूज का मीठा काहे ला देंगे? हमरा तS सच्‍च पूछिये इच्‍छा हो रहा है कि अपना गरम कपार हियें छोर के, आत्‍मा का नरम मुलायमी पे सवार पहाड़ोन्‍मुखी हो जायें, हुआं बरफ़ का सोहाना वादी में अपना जाकिट हवा में ओछाल, महेंदर कपूर का मानबता का सलामी गावे लगें, ‘हे नील गगन के तले, धरती का पियार पले, हे हे!..’

या चीनार का पेड़ का तना से पीठ लगाके किसनचन्‍नर वाला सब ऊ रोमानी कहानी लिख दें.. कि हमरा पाछे तीन गो लइकी अपना घर से भागके ‘एगो गदहा का आतमकथा’ चरितार्थ करे लगे? हंसते जख़म का गाना रोवे लगे.. कि ‘तुम जो मिल गये हो, त जहां मिल गया है.. जमीं मिल गया अऊर आसमां मिल गया..’

मगर सब ई फलतू का गाना है! जमीन अऊर आसमां तS मिलले जाता है.. ज़रूरत का बखत बस एगो पानीये है जो नहीं भेंटाता.. बीच बरफ़ में टहिलते रहिये तब्‍बो नै भेंटायेगा, हां.. जइसे हम तरबूज कीन के ले आते हैं, लेकिन खाये का हिम्‍मत नहीं होता.. या भूलल-भटकल कवनो दोस्‍ती का दोष आ जाये, तS ओकरा आगे हरीयर गोला देखाये का!

अदमी का, या अदम का.. जवनो है ऊ.. ई हाल कब से हो गया? हमरे बापोजी के टैम में था? मगर ऊ तS अराम से आम का चुसनी चूसते रहते थे? ई हम्‍मे हैं कि तरबूजी का फांकी काटते हैं अऊर दूसरका तरफ हमरा करेजा का फांकी-फांकी कटने लगता है.. कि सब्‍ब खरबूजा आजे खा लेंगे त कल कौची खावेंगे? घेंवड़ा?

मालूम नहीं ई जीबन में एतना दुख काहे ला है? जोबनाबस्‍था में तS था ही, ई बुढ़ौतियो में मुक्ति नै है! जब दुनिया छोरके निकल जायेंगे तब दुख हेरायेगा, हट जायेगा हरमखोर? एगो साथी से हार के बोले, ‘बड़ संकट है, साथी, तुम अपना सोनाओ, तुम्‍मर ओर कइसे कट रहा है?’ तS बाबू बोले, ‘शहीदों की मांडों पर भी लगते हैं मेले’.. अऊर ओकरा बाद, ‘बंगलोरु का मौसम खुशनुमा है’ अब अइसे रहस्‍सबाद का कोई का करे, आपै बताइये! हियां ससुर अमरीका तक ले में जीना मुहाल है, हम नहीं, हुंवे वाली सपनमहिर्षी बोल रही हैं, और एक नहीं, दू जगहीं का कोटिन दे रही हैं, अऊर ई दिलदार बंगलोर बकलोल का चिरकुट गान कै रहे हैं?

मगर, का करे अदमी? जी, सिर फोर ले? कि पद्द में आत्‍मा बोर के कबिता करे लगे?

मालूम नहीं.. आप कनफुजिया के सपनमहिर्षी वाला लिंकिंन सब काहे ला पढ़े नै लगते हैं?

11 comments:

  1. "वाह!जैसी भाषा बोली जाती है वैसे आपने लिख दिया.....बहुत अच्छे.."

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  2. अच्छी प्रस्तुती मानवता पे आधारित सार्थक विवेचना के लिए धन्यवाद / वैकल्पिक मिडिया के रूप में ब्लॉग और ब्लोगर के बारे में आपका क्या ख्याल है ? मैं आपको अपने ब्लॉग पर संसद में दो महीने सिर्फ जनता को प्रश्न पूछने के लिए ,आरक्षित होना चाहिए ,विषय पर अपने बहुमूल्य विचार कम से कम १०० शब्दों में रखने के लिए आमंत्रित करता हूँ / उम्दा देश हित के विचारों को सम्मानित करने की भी वयवस्था है / आशा है आप अपने विचार जरूर व्यक्त करेंगें /

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  3. बाप रे! जाय के पढ़ लिए सब हो बाबू, लेकिन माथा घूमे लगा, अब करे भी का करे आदमी, माथा फोर ले...तो हम तो सोच रहे हैं बंगलोर का मौसम देखें काहे की 'बंगलोरु का मौसम खुशनुमा है' और मौसम देखे के बाद 'पद्द में आत्‍मा बोर के कबिता करे लगे'बेसी आसान होता है कबिता करना...का कहते हैं ई बारे में हो बाबू :)

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  4. जय हो आपकी भाषा की...

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  5. मनोहर श्याम जोशी जैसी फीलिंग देते हो सर जी...

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  6. सखा तुम आए इतै न कितै दिन खोए ?

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  7. @क्‍या डाक साहब,
    कभी तो उलटे भी बोलिये?
    कि मश्‍जो को पढ़ते हैं तो हमारी लिखाई वाली फीलिंग होती है?

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  8. डा.अनुराग का यही समस्या है! ऊ जो कहना चाहते हैं कहिऐ नहीं पाते हैं! ऊ शायद यही कहना चाहते हैं कि बड़का लेखक लड़का लोग ऐसा गद लेखन कब करना शुरू करेंगे।

    लेकिन का पता ऊ कुछ और कहना चाहते हों!

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  9. मालूम नहीं ई जीबन में एतना दुख काहे ला है?

    But,it's always a pleasure to read you.

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