Monday, April 26, 2010

आंग्‍स्‍ट..

पता नहीं यह आंग्‍स्‍ट मुझे कहां ले जाएगी. जबकि आईपीएल से मेरा कुछ लेना भी नहीं. न पूर्णा पटेल या सुप्रिया सुले से है. लेना. वो चाहें भले मुझे कुछ दे दें, मुझे उनको नहीं देना. एमसीआई (मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया) तक से मेरे गुप्‍त या प्रकट किसी तरह के संबंध नहीं. होते तो शायद कुछ करोड़ मेरे घर भी होता और इतना आंग्‍स्‍ट नहीं होता, मगर है. सोचकर ताज़्ज़ुब होता है अभी ज़्यादा समय नहीं हुआ, इसी आंग्स्‍ट के बूते फ्रांस और अल्‍जीरिया में पैदा हुए पता नहीं कैसे लेखक हंसते-खेलते साहित्यिक नोबेल तक पहुंच जाते थे, जबकि मैं रोते-गाते नोबलदेश क्‍या, फ्रांस तक भी नहीं पहुंच पा रहा हूं. कहीं नहीं पहुंच पा रहा हूं. इसी कुंठा के असर में रहा होगा कि कल किसी ब्‍लॉगर मीट की ख़बर मिलते ही, खुद को छकाकर बचाते हुए, अपने डेढ़ जोड़ी के अच्‍छे कपड़ों में स्‍वयं को सजाते, मैं त्‍वरित उछाल में बुंबई विमानस्‍थली पहुंच गया. ज़ाहिर है बाहर बाला इंतज़ार कर रही थी, मैंने चिढ़कर कहा, ‘मैं फ्रांस जा रहा हूं!’

ज़ाहिर है मेरी बात सुनकर बाला हंसने लगी. जिसका अंततोगत्‍वा ले-देकर वही मतलब बनना था, वही बना भी, कि कुछ बाला के बालपन के मोह, और कुछ मुफ़्ति‍या दावत की टोह में मैं जुहू पहुंच गया. फ्रांसोन्‍मुखी होना एक बार फिर रह गया..

मैं नहीं जानता कैसे मैं इस आंग्‍स्‍ट से निकल पाऊंगा. या यही कि हजारीप्रसाद द्वि‍वेदी कैसे निकले थे. या निकलने से पहले घुसे कैसे थे इन द फ़र्स्‍ट प्‍लेस? संभवत: उनके लिए आसान रहा होगा, क्‍योंकि सिर पर रविबाबू का हाथ था. बंगाली कन्‍याओं का साथ तो था ही. जबकि मैं देखता हूं तो चारों ओर मुझे सिर्फ़ रात दीखती है, और सुबह आंख खुले उसके पहले ही कान खुल जाता है, क्‍योंकि फ़ोन की घंटी बज रही होती है, और उसे बजने देने से रोकने की कोशिश में फिर मैं जाने क्‍या ऊट-पटांग बकने लगता हूं, मतलब क़ायदे से अभी दोपहर होती नहीं कि आंग्‍स्‍ट हो जाता है. रात में तो ख़ैर, हुआ रहता ही है.

डा. लुनाचार्स्‍की ने मानव जीवन के जितने भी कल्पित झमेले हैं उनका बड़ा ही विशद अध्‍ययन किया है, और लगभग उतनी ही गहराई से उनके समाधान भी लिखे हैं, बस यही एक आंग्‍स्‍ट का सवाल था जिसपर उनकी नज़र जाते-जाते रह गई. या जाते-जाते न भी रही हो तो उनके समाधान को मैं अब तक देखते-देखते ज़रूर रह जा रहा हूं. जबकि दायानोव पेंलिस्‍की का विचार काफ़ी विचारणीय है. पेंलिस्‍की साहब ने आज से करीबन सौ वर्ष पहले, सन् 1909 में ही कह दिया था, ‘व्‍हेन इन रोम, स्‍टे अवे फ्रॉम फ़ोन!’ कहा उक्राइनी में ही था जिसके इतालवी तर्जुमा का मैं सरल अंग्रेजी आपकी तरफ़ ठेल रहा हूं.

तो इस कहे का इकलौता कैच बस यही है कि मिस्‍टर पेंलिस्‍की के लिए अपने बोले पर टिकना आसान रहा होगा, मगर आज के समय में- इवन फॉर समवन इन माई शूज़ काइंड ऑफ सिचुएशन- कोई क्‍या खाकर फ़ोन से अवे रहेगा? अरे, फॉरगेट अबाउट रोम, रैदासपुर तक में फ़ोन से दूर रह पाना आज संभव है? आप दूर रह भी लीजिए, नेटवर्क आपको खींचकर जोड़े जाती है.

ख़ैर, लास्‍ट टाइम व्‍हेन आई वॉज़ इन रोम, मेरी समस्‍या का जल्‍दी ही समाधान हो गया. इसके पहले कि मैं अपने फ़ोन का कुछ करूं, एक नपोलितानो सुकुमारी थी, विया वेनेतो में फ़ोन समेत मेरे कंधे के समूचे झोले का कुछ कर गई! माने नैन चुराने की हिमाकत करने की जगह मेरा झोला मार गई.

मैंने छोकरी का शुक्रिया-टुक्रिया किया, फिर लजाये-लजाये पूछने से बाज न आ सका, कि ‘कन्‍ये, मगर ऐसा तूने किया क्‍यों?’

नपोलिताना चोट्टी नंबर वन, ज़ाहिर है नज़ाकत में सिर झुकाकर बोली, ‘प्रियवंत, जानती थी तुम हिंद के पुरुषोत्तम हो, दिल तुम्‍हारा चुरा नहीं सकती, इसीलिए झोले का ज़रा सा बिल भर हटा लिया, ग़र ग़लती हुई तो करो सर कलम, अधिकार बनता है तुम्‍हारा?’

स्‍वाभाविक है हसीना का हाथ खींचे मैं फोंताना दी त्रेवी की ओर लिए गया और राजेश खन्‍ना-नंदा अभिनीत, श्रीयुत रविकांत नगाइच निर्देशित ‘दि ट्रेन’ के ‘गुलाबी आंखें, जो तेरी देखीं, शराबी ये दिल हो गया, संभालो मुझको, ओ मेरे यारो, मोहब्‍बत मुझको हो गयाSSS.. लल्‍लाSSSS ललाSSSS..’ की तर्ज़ पर देह को झटके देने लगा, नपोलिताना नवयौवना नहीं दे पा रही थी, मेरी अदाओं पर रीझकर, घबराकर बेचारी, लता की जगह रफ़ी को गाने लगी, ‘रात के हमसफ़र, थकके घर को चले, लो सुभा आ गई एटसेट्रा एटसेट्रा..’

लेकिन डेढ़ महीने बाद मैं फिर उड़ीसा में था, और गुजराती में कविता लिखने की कोशिश में लगातार नाकाम हो रहा था, जबकि हिंदी में जो लिखे थे, विदेशी प्रकाशक उनका डच या फ्रेंच अनुवाद छापने से एकदम मुंह चुरा रहे थे. मैं लगातार हिल रहा था मगर कुछ ठीक से हिला नहीं पा रहा था, मतलब वर्तनी में भले गलत होऊं, भाव में फिर वही, आंग्‍स्‍ट पीड़ि‍त था.

अभी भी हूं. और फ़ोन की घंटी फिर बजने लगी है..

11 comments:

  1. पोस्ट की सबसे दिलफरेब पंक्ति का सार "नपोलिताना चोट्टी नंबर वन" :) शब्दों में उलझे बंधे पूरी पोस्ट पढ़ी...अभी तक मुस्कुरा रहे हैं.

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  2. "जबकि मैं देखता हूं तो चारों ओर मुझे सिर्फ़ रात दीखती है..."

    आपको एकदम झकझकाता दिन काहे नहीं लौकता? आई पी एल ४०,००० करोड़ का भैलुएशन माथे पर टाँगे पूरा भारत को दिखा रहा है और आपको खाली रात दीखती है? नाइंसाफी नहीं है ई देश के किरकेट-प्रेमी जनता के प्रति? एम सी आई में रेट बढ़ गया है, ई क्या देश की तरक्की का सूचना नहीं है? आप खाली रात देखते हैं. इस आंग्‍स्‍ट से निकलिए और ब्लॉगर सम्मलेन अटेंड कीजिये. कल रात को आई पी एल फाइनल देखने ही चले जाते.

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  3. "कल किसी ब्‍लॉगर मीट की ख़बर मिलते ही, खुद को छकाकर बचाते हुए, अपने डेढ़ जोड़ी के अच्‍छे कपड़ों में स्‍वयं को सजाते, मैं त्‍वरित उछाल में बुंबई विमानस्‍थली पहुंच गया."

    aap jab bhagte hain to airport jate hain :) main bhi bachpan mein himalay par bhaag jane ki dhamkiyan deta tha..

    blogger meet mein to main bhi nahi ja paya.. chaliye 'same pinch' :D

    लेकिन डेढ़ महीने बाद मैं फिर उड़ीसा में था, और गुजराती में कविता लिखने की कोशिश में लगातार नाकाम हो रहा था, जबकि हिंदी में जो लिखे थे, विदेशी प्रकाशक उनका डच या फ्रेंच अनुवाद छापने से एकदम मुंह चुरा रहे थे. मैं लगातार हिल रहा था मगर कुछ ठीक से हिला नहीं पा रहा था, मतलब वर्तनी में भले गलत होऊं, भाव में फिर वही, आंग्‍स्‍ट पीड़ि‍त था. अभी भी हूं. और फ़ोन की घंटी फिर बज रही है..
    aap ki shaili ka main kayal hoon.. aur padhne ke baad likhne ko kuch bhi nahi rahta..

    *office se roman mein hi tipiya raha hoon..

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  4. ये लेखन है या उल्टा सुल्टा खाकर ख्ट्टी डकार मारना या दूसरे शब्दों
    में बदहजमी खुद करो और जानबूझकर बास दूसरों को पाटा
    उठाकर प्रकाशित कर दो

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  5. @राजीव कुमारेष्‍ठ,
    आप सचमुच श्रेष्‍ठ हैं. मेरे कहने का मतलब नहीं, फिर भी कह रहा हूं.
    उम्‍मीद है अब आपकी खट्टी डकारें बंद हुई होंगी (मेरी तो आपका श्रेष्‍ठत्‍व देखते ही संभलकर बैठ गईं).

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  6. श्रीमन आंग्स्ट महोदय हमें बहुत परेशान किये हैं । हफ्तों बुझाता न था कि अन्दर से कौन खाये जा रहा है । कोई पूछे तो कहते थे,अजीब लग रहा है । अम्मा बहुत दुखी हुयीं कि क्यों लड़का पगला गया है । थकहार कर जब एक बार लड़की का नाम पूँछ लीं, उसके बाद अगले दो महीने आंग्स्ट महोदय घर में दिखायी न पड़े ।
    दौरा अब भी पड़ता है । आवृत्ति और काल पारिवारिक कारणों से छिपा रहे हैं । आपको यदि इस उम्र में भी होता है तब भविष्य के प्रति हम निश्चिन्त हो जाते हैं ।
    कुलश्रेष्ठ जी को एक ब्रेक दे दीजिये । अनुभव किये होते तो ऐसा न लिखते ।

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  7. क्या गजब लिखा है...."

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  8. प्रवीण जी से सहमत..
    "आपको यदि इस उम्र में भी होता है तब भविष्य के प्रति हम निश्चिन्त हो जाते हैं ।"

    अब हमे भी अपना फ़्यूचर ब्राईट दिखता है..

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  9. पैसा एमसीआई खाती है
    गाली डाक्टर

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