Apr 27, 2010

बिना शीर्षक..

‘कुछ तो होता होगा जो दिखता नहीं, मगर लौकी के बतिया को रोज़ कुछ बड़ा करता चलता है, नहीं?’ मौसा दन्‍न देना बोलते, बबुनी के बालों में हल्‍के हाथ फिराते हुए, फिर एकदम हंसने लगते.

बबुनी चौंककर उनका चेहरा देखती, फिर खपड़े की लौकी पर, और आसपास, कि कहां जादू हुआ है. जानती कि हुआ होगा, मगर चूंकि उसकी पकड़ में न आता, हारी हुई कातरभाव से चोर नज़रों मौसाजी को तकती, कि इसके पहले कि घर के दूसरों बच्‍चों के आगे उसकी भद् हो, मौसा लौकी व बाकी चीज़ों का भेद साफ़ करके उसे अचक्‍के से उबार लें..

मगर हंसते मौसा का मन बहका तब तक किसी और बात में उलझ जाता, वह मौसी को छेड़ रहे होते कि वह दौरे पर बाहर रहते हैं, उनकी पीठ पीछे मौसी ने कब से पान की आदत पाल ली? क्‍योंकि ऐसे ललहर होंठ तो ‘साहब, बीबी और गुलाम’ वाली मीनाकुमारियो के नहीं होता!

मौसी हवा में हाथ पटकती तक़लीफ़ में जर्द होने का अभिनय करतीं कि सबके आगे उल्‍टा-सीधा कुछ भी बोलते रहने की उनकी आदत कब जाएगी.

मौसा राजू को अपने ठेहुने से उठाकर ऊपर अपने कंधे के पीछे से घुमाते हुए वापस ठेहुने पर लिए आते, और हंसते-हंसते मौसी के सवाल का काउंटर कोश्‍चन पूछते, ‘तुम्‍हीं बताओ, प्राणेश्‍वरी, कब जाएगी?’

खपड़ेवाले बरामदे की छांह में बाल काढ़ती दीपा दी को सुनाती आंगन से अदौरी बटोर रही कनिया बो बोलतीं, ‘सुन रही हो? प्राणेश्‍वरी, हृदयेश्‍वरी, सुकन्‍या, सुकर्णा कितना सारा नाम धरे हैं.. जैसे संधा सिरवास्‍तव न होकर कवनो साधना और मुमताज हों!’

दीपा दी बाल काढ़ती पैरों के पास पड़े पिक्‍चर पोस्‍ट के पन्‍ने पलटतीं बुदबुदातीं, ‘तुम्‍हें क्‍यों डाह होती है, कनिया बो, अपनी पत्‍नी को जो मन हो वो बुलायें.’

‘हमको काहे का डाह होगा, हम तो सिरिफ ई बोले रहें कि देखे के रंग न दू रुपिया के रूप, ओकरा पीछे काहे एत्‍ता मधुमालती के खेला, हंSS?’ कनिया बो छिनकती हुई कहतीं, मगर दीपा दी उसे सुनने की जगह तब लीना चंदरवरकर के ‘जाने अनजाने’ वाले सलवार के कट का मुआयना कर रही होतीं.

सुदीपन तेजी से आंगन के दूसरे छोर दौड़कर चिल्‍लाता, ‘हम हियां हैं! मौसाजी, देखिए, देख रहे हैं?’

तब तक राजू के ठेले से बोकारो धोबी की मझलकी बेटी बिन्‍नु साइकिल लिये-लिये धड़ाम से ढिमिलियाये गिरती और उसके भां-भां रोने में सुदीपन का चीखना एकदम गुम हो जाता..

सबकुछ छोड़कर मौसा भागे-भागे बिन्‍नु को साइकल के फंसाव से उबारने आते..

दीपा दी चिल्‍लातीं चुप कर, बदमाश, ऐसे रो रही है जैसे चार तल्‍ले के बिल्डिंग से गिरी है!

बबुनी को यह सब कुछ नहीं सुन पड़ता, मौसा के खुद से दूर होते ही उसका चेहरा उतर जाता, बच्‍ची ढली सांझ की तरह एकदम पीयरा जाती..