Thursday, April 22, 2010

मन की बात..

रहते-रहते आती है जाने कहां से आती है, कि गहीन अंधारे सन्‍न् सुबेर हो जाता हूं, सिर नवाये, घबराये लजाये की कंगलई में कुबेर. बरसाती नाला-सा भहर बहा आता है, बेहयायी हंसी-बसी पुलकदायी खुशी में समूचा ढेर.. मुलतानी पठान, विज्ञापन फ़ि‍ल्‍मों का बबर शेर हो जाता हूं, ओह, गर्वीला शमशेर.

बीच जंगल तारोंभरी सुलगती रात फुसफुसाके गाती है- अच्‍छा? मैं गाल बजाता खिला, बच्‍चे-सा किलकिलाता हूं- हां, हां!

ठिलता, ढुलमुलाता आता है, ‘आये हैं, आये हैं!’ बताता, अदेखे पुराने काठ के-से बक्‍से में छुपे बजते रहते हैं शब्‍द, बिम्‍ब कई अजाने तानों के अपहचाने ज़मानों के, खुशी में पुलकता हूं कि हाय, लिखना जानता नहीं, अभी खुद तक को पहचानता नहीं, लेकिन फिर भी मेरे संगी हैं, मेरे सियाह के सतरंगी!

फिर सोचता हूं चमकती रात की अनूठी इस बारात में, कभी तो लिखने जैसा लिख लूंगा, जैसे हंसने जैसा हंस लेता हूं, अपने में अदेखे के सपनों में. रोते-रोते जी लेता हूं, वैसे ही कभी हंसते-हंसते देख आऊंगा, अपने को उलझे में कित्‍ता सीधे-सीधा लिख पा रहा हूं, जैसा खुद को सन्‍न् देखूंगा और बजते शब्‍दों के वाद्यबहुरंग सजाऊंगा.

ओहोहो, पूरी-पूरी रात लिक्‍खे जाऊंगा.

(यह खा़स म. के लिए)

9 comments:

  1. the amazing kaleidoscope of words...mesmerising colours..."सियाह के सतरंगी"
    इतना खूबसूरत ताना बाना कैसे बुन लेते हैं आप...इस पोस्ट को सुनने की इच्छा हो रही है. उम्मीद है किसी दिन इसे पॉडकास्ट करेंगे आप.

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  2. बक्से से क्या क्या धरते रहते हैं!

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  3. हम क्या कहें..यह खा़स म. के लिए है..हम तो स. या उ. लिखते तो कहते.

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  4. क्या शब्द चुने हैं......वाह"

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  5. खिलखिलाती पोस्ट है .....

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  6. रहते-रहते आती है जाने कहां से आती है, कि गहीन अंधारे सन्‍न् सुबेर हो जाता हूं, सिर नवाये, घबराये लजाये की कंगलई में कुबेर.....
    ---वाह! क्या शब्द-शब्द मोती.

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  7. ऐसी ही हो मन की कविता - संगी सियाह के सतरंगी - [...करुणा कर के करूणानिधि रोए?]

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  8. मन की बात है न...
    कैसे न होता इसमें कविता का प्रवाह!

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