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May 2, 2010

घास पर गिरी लड़की, रेल में गिरा..



हरी घास पर धम्‍म् गिरी लड़की को हरा घास नहीं

काली पथरीली ज़मीन का सियाह अंधेरा दिखेगा

तिस पर सर पटक ले पागल हो जाये क्‍या करे

इतने सवाल हैं माथे में किसी का जवाब सूझता नहीं

ऐसा नहीं है कि समांतर सिनेमा की शबाना है, सुखी नहीं है

मुस्‍कराते में कई तस्‍वीरे हैं उसकी, फेसबुक पर हैं, सब शहर

ने दिया, यहीं सुख पहचानने की लड़की ने गिनती सीखी

मगर दु:ख का भी तो कैसा लंबा चादर बुनती गई, बुन बुन

कहां से निकलेगी, कैसे सोचकर गश खाने लगती है

सोचती है तो नहाते में पसीना छूटने लगता है

अभी तीन दिन पहले तो डॉक्‍टर के यहां से होकर आई

कितना हंसकर आगे-पीछे का उन्‍हें सब बताई, मानो

केस की तफसील नहीं, दवाखाने में फ्लर्ट गाने गई थी

क्‍या हुआ है उसे, क्‍यों इतना हंसती रहती है, कभी

चुप रहकर सीधे क्‍यों नहीं कहती कि सीधे खड़ी रहना

कितना मुश्किल है, सांस लेना, खुद को साफ़-साफ़ देखना?


लड़की से मिलने शहर जा रहा उम्र से पहले बूढ़ा हुआ उसका पिता

फ़ि‍लहाल रेल में है, समूच रास्‍ते खुद को दुत्कारता कि ग़लती हुई

कि ज़रूरत के बखत ज़ि‍म्‍मेदारी से बच्‍चों को वह पाल न सका

हमेशा उसकी आंखों के आगे रहें, इतने साधन ढाल न सका

समूचे छप्‍पन साल नियम से पौने छह बजे उठकर इतना तक

कर नहीं सका है, प्रेम, पंचायत, पंचनामा किसी के फेर पड़ा नहीं

ज़मीन खरीदी नहीं, सिर किसी का फोड़ा नहीं फिर दरअस्‍ल वह करता

क्‍या रहा है? बच्‍चे हाथ से निकल गए, सोचने बैठो तो कनपटी झांय

झांय बजता है, पूरी उम्र क्‍या वह, सच्‍ची, घास छीलता रहा है?


कैसे साफ़-साफ़ देखे, सोचती है लड़की, इतना आसान है साफ़-साफ़

देखना? जावेद अख़्तर के गानों में हो जाता होगा, जीवन में देखना

मालूम नहीं कैसे देखना है साफ़, साफ़ दीखती तो है, मगर इस शहर में

फिर कुछ भी साफ़ कहां दिखता है? कहीं कभी दिन का एक छोटा टुकड़ा

चार शब्‍द किसी कोने छिपे, निर्दोष घिसा कोई हवाई चप्‍पल, आईने में

भूले से अपनी हंसी कभी, उससे बाहर सब कहीं जालियां फैलाते हैं

हरामी जैसे मछलियों को दाना खिलाते हैं, साबुनधुले हाथों का गंदा फैलाते हैं

क्‍यों बुला रही हूं पापा को, अपने नरक बढ़ा रही हूं, क्‍यों? इस शहर में ज़रा सा

पैसे बनाकर मैं कितना अझुरा गई हूं, त्‍वचा के चमकीलेपन के नीचे कितना

पथरा गई हूं. रोज़ थोड़ा निगल लेता है फिर क्‍यों शहर का ज़हरीला बेल

अपने पर फैला रही हूं, लड़की सोचती और सोचकर हंसने लगती


दूर रेल में पिता छूटे शहरों के पार होने की लम्‍बी सांस भरता, नयों की

ज़ि‍म्‍मेदारी से फिर एक के बाद एक की, अदब में गिनती शुरु करता.



10 कमेंट:

Amitraghat said...

गजब पोस्ट है.."

anjule shyam said...

gazab ki post hai sir.........
bahut khub shukriya......

tanu sharma.joshi said...

touchy n hrt brkng...
bt smhw depicting d bitter truth...!!

Udan Tashtari said...

कुछ नहीं कहेंगे...


लाजबाब रचना.

Shekhar Kumawat said...

BAHUT KHUB

BADHAI AAP KO IS KE LIYE

मनीषा पांडे said...

कितनी सारी लड़कियों के पिता इस समय रेल में होंगे, यही सोच रहे होंगे या शायद कुछ इससे भी भयावह। कितनी सारी लड़कियां होंगी घास पर गिरी लेकिन दरअसल पत्‍थरों पर सिर फोड़ती।

Pramod Singh said...

गजब.. और लाजवाब..
सब लिख रहे हैं तो सोचा मैं भी लिख मारूं..
हद है.

pukhraaj said...

कारवां गुज़र गया ,गुबार देखते रहे ....

Pankaj Upadhyay (पंकज उपाध्याय) said...

सबके साथ यही आइडेन्टिटी क्राईसिस है.. बडे शहर मेरी पहचान खा गये है.. अब तो शहर मे भी लोग मुझे मेरे नाम से नही जानते.. कोई हाथ हवा मे हिलाने वाला नही..
यही बडा शह्र जीवन बन गया और ये भागते दौडते लोग हमसफ़र..

अनिल कान्त : said...

अच्छी पोस्ट पढने को मिली