Thursday, May 6, 2010

लड़की के बाल की खाल..

लड़की पता नहीं किस देश की थी, हालांकि वह दावे से हाथ झटकती बताती फिरती कि वह जानती है किस देश की है और इस बारे में किसी तरह की ग़लतफ़हमी बनाने की ज़रूरत नहीं, मगर उसके साथ यह भी उतना ही सही है कि उसके बालों का जिक्र छिड़ते ही लड़की का चेहरा भक्‍क सफ़ेद पड़ जाता (मगर यह भी केवल उन थोड़े नाटकीय क्षणों में ही होता, बाकी के समयों में लड़की हमेशा की तरह काली ही पायी जाती) और उस पर संशय के बादल घुमड़ने, दौड़ने लगते, और यह तत्‍काल- लड़की के वर्ण की तरह- साफ़ हो जाता कि अपने रंग को दु:ख के कातर क्षणों में वह भले पल भर को झुठला ले, अपने बालों की राष्‍ट्रीयता की संदिग्‍धावस्‍था को किसी भी सूरत में छुपला नहीं सकती!

बहुत वर्ष पहले, जब लड़की अभी ठीक से लड़की हुई भी न थी, तभी उसने जान लिया था कि दाल में कुछ काला है. मतलब अपने श्‍यामवर्ण के बारे में तो वह चौकन्‍ना हुई ही थी, अपने बालों के बारे में भी यह ज्ञानलाभ किया कि उसके साथ भले रहते हों, मगर उसके बाल दोगले हैं. इस अप्रीतिकर सच्‍चाई के साक्षात्‍कार के साथ लड़की जीवन की अन्‍य कड़वाहटों के लिए शनै: शनै: तैयार होती रही. लड़की की मां ने उसे पड़ोस के पालने में पैर पटकते ही पहचान लिया था[1] और मुंह बाये बोलने से बाज न आ सकी थी कि हाय दइय्या, यह लड़की हमारे हाथ में नहीं रहेगी!

ज़ाहिर है लड़की की मां ने जो कहा अपनी अर्द्धशिक्षा और अपरिपक्‍व भाषाई संस्‍कार के असर में कहा था. देरिदा व फ्रेंच स्‍ट्रक्‍चरलिज़्म न पढ़े होने की वज़ह से ही लड़की के बालों के गूढ़ार्थ को वह लड़की के संग घालमेल कर रही थी. आनेवाले कुछ वर्षों तक लड़की निश्चिंत ही अभी अपने मां के हाथों में रहनेवाली थी, वो तो बेमुरव्‍वत बाल थे जो पड़ोस के पालने में पैर पटकते देखे गए!

कुछ वर्षोपरांत ऑस्‍ट्रेलिया के शहर एडिलेड, जहां सदाशयता किंबा निराशा किसी भी मनोभाव के असर में इकट्ठा होनेवाले एशियाइयों को हमेशा ही शक की नज़र देखा जाता रहा है, ‘बाल क्‍यों बजायें गाल?’ की एक महत्‍वपूर्ण अंतर्राष्‍ट्रीय संगोष्‍ठि‍ पर मंच संचालन करते हुए लड़की ने अतीत पर पड़ी मां की गलत छांह का उचित ही राजनीतिक प्रतिवादपूर्ण उत्तर व सफ़ाई दी थी; लड़की ने बालबिद्ध भरी सभा को कांपते स्‍वरों में सूचित किया था कि मनोहर कहानियांमलयाला मनोरमा में जो अतिशय रोमानी उसके जीवन-वृतांत छपे हैं, और उसे पैदाइशी क्रांतिकारी व रोमानी एटसेट्रा बताया गया है, वह शतमांश के सत्‍य के करीब हो, संपूर्ण सत्य नहीं ही है, सच्‍चाई तो यह है कि लड़की को अराजकतावाद की पहली राजनीतिक शिक्षा अपनी मां की कोख में नहीं, अपने सिर के बालों से प्राप्‍त हुई!

मतलब यह सर्वविदित सार्वजनिक जानकारी के क्षेत्र में है कि लड़की बाद में हुई, पैदाइशी अराजकतावादी उसके बाल हुए, मतलब, थे (हालांकि अफ्रीका के कुछ पिछड़े व लातिनी अमरीका के किंचित उन्‍नत देशों में इस पर भी तीक्ष्‍ण असहमति है कि लड़की में राजनीतिक चोंचले जितने हों, वास्‍तविक परिवर्तनकारी अराजकतावाद का तो लेशमात्र भी नहीं![2]). ऐसे अप्रत्‍यक्ष व अप्रगतिशील आक्रमणों से लड़की हमेशा कुछ और-और सांवली होती रही है. जबकि उसके बाल छितराते, गाते रहे हैं: ‘आज फिर मरने की तमन्‍ना है, आज फिर मारने का इरादा है.. छोड़ दो, पागल, ज़माना क्‍या कहेगा, एटसेट्रा एटसेट्रा’.

लड़की प्रकट रुप से जो कहे, गुप्‍तरूपा वह हमेशा अपने केशरत्‍नों से खिन्‍न रही है. जब स्‍कूल में थी तब भी लड़के उसे नहीं, उसके बालों के पीछे रहते. एक दीवाना लड़का था (लड़की को सुहाना भी लगता) वह लड़की के नोटबुक में कागज की चिट्ठी डाल जाने की बजाय, उसके बालों में कागज की नाव फंसा जाता. लड़की चिढ़कर कहती, ‘ओ संदीप, प्‍लीज़, तुम मेरे बालों के पीछे क्‍यों पड़े हुए हो?’ संदीप शरमाकर सिर झुका लेता और फुसफुसाकर कहता, ‘आई थिंक आई अम इन लव विद् देम..’ लड़की खौलकर गुस्‍से में बाल चबाने लगती, जबकि बालों से दूरी बनाने का संदीप को इकलौता यही रास्‍ता दीखा कि वह आगे की पढ़ाई के लिए असत्‍यपुर छोड़कर ऑस्‍ट्रेलिया के एडिलेड चला जाय. और वही संदीप ने किया भी. और इसीलिए लड़की सारे जीवन संदीप से नाराज़ रही भी. और दरअसल इसीलिए कुछ वर्षोपरांत ऑस्‍ट्रेलिया के एडिलेड में ‘बाल क्‍यों बजायें गाल?’ की अंतर्राष्‍ट्रीय संगोष्‍ठि‍ का उसने आयोजन भी किया..

(बाकी..)


[1] कृपया कंसल्‍ट करें ‘पुत्री के पैर पालने में पहचान लेना’, वृहत मुहावरा मणिकोश, ज्ञातरंजन चौबे, जगनिहारपुर, 2007.

[2]डज़ द गर्ल रियली मीन्‍ा व्‍हॉट शी सेज़ शी डज़?’, द न्‍यू एज़ ट्वि‍ट्स, वॉल्‍यूम फोर, वर्चुअल विज़न, हानाबेलो ताबोदेलो.

4 comments:

  1. हमेशा की तरह बेहतरीन. एकालाप वाली शैली और दिल्चस्प बना देती है पोस्ट को...."

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  2. कृपया कंसल्‍ट करें ‘पुत्री के पैर पालने में पहचान लेना’, वृहत मुहावरा मणिकोश, ज्ञातरंजन चौबे, जगनिहारपुर, 2007.

    [2] ‘डज़ द गर्ल रियली मीन्‍ा व्‍हॉट शी सेज़ शी डज़?’,

    सिर्फ आप ही दे सकते हो जी...

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  3. आप न्‍यू एज़ ट्वि‍ट्स भी पढते है :) और वो भी वोल्यूम ४..

    दिये हुये लिन्क काम नही कर रहे है.. ये मुझे बार बार लोग आऊट ही रख रहे है.. साइन इन करते ही बाहर फ़ेक देते है.. आपकी कोई साजिश तो नही..

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  4. @पकंज,
    है है. साजिश.
    उसके बाद और भी है.

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