द स्‍टोरी ऑफ़ अ हेयरी गर्ल: भाग दो

लड़की छोटी थी तब बीच में रहते-रहते मां की चिंहुक सुना करती, ‘दुनिया में एक से एक छिंकाल पड़ी हैं, मेरे कोख से ही, मुई, इन बालों को बाहर आना था?’ लड़की सुनती और भृकुटि ऊपर चढ़ाये खिन्‍नमना भीतर ही भीतर ख़ून पीती चुप पटाई रहती. बचपन की बात थी, नासमझी के दिन थे, वर्ना यही बात बारह वर्ष बाद मां के मुंह से सुनती तो लड़की जननी जानकी पर फिमेल इंफैंटिसाइड का केस ठोंक देती (ऐन शादी के मौके, अपने होनेवाले शौहर के खिलाफ़ लड़की ऐसा एक केस ठोंकते-ठोंकते बाल-बाल चूकी ही, जिसके लिए उसके शौहर ने उसे नहीं, बल्कि खुद लड़की ने स्‍वयं को आजतक माफ़ नहीं किया है[1]).

लड़की छोटी थी जब घर में मामा आते और मां अपने को कहने से रोक नहीं पाती, ‘सबकी पकड़ में आते हैं, एक इसी मुंहखार के हैं कि हाथ नहीं आते, आप ही बताओ, मैं क्‍या करूं?

मामा ग्‍वालियर सरकार की पुलिस में नौकर थे, मतलब गऊ आदमी थे, मतलब गऊ बने रहने के सिवा और कोई चारा नहीं था, बहन के हाथ की बिना पत्‍ते वाली दूध की चाय पीते निस्‍संगभाव जवाब देते, ‘ग़लतफ़हमी है पकड़ में आते हैं, जानकी, कहां पकड़ में आते हैं? बड़े सरकार की बड़ी गाड़ी में हमने कितनी मर्तबा भिंड का दौरा किया, मुरैना की धूल फांकी, कोई बाग़ी आया पकड़ में? हर बार लगता है आयेगा, इस बार ज़रूर आएगा, लेकिन न्‍ना! कहां? ऊंहूं..

बचपन के दिन थे, नासमझी के तो थे ही, मां और मामा से नफ़रत करनेवाली लड़की सोचती वह भी बीहड़ में भागकर बाग़ी बन जाएगी, और फिर फंकवाती रहेगी धूल दुनिया भर को! कहने का मतलब लड़की पैदाइशी भगोड़ी थी, जिधर नज़र फेरती उसे ठंडा और बेआसरा संसार दीखता और वह भाग जाना चाहती. भाग गई भी होती, अगर्चे नामुराद बालों में उलझकर गिरती न होती! संभवत: यही वज़ह है हमारे, या हमारी तरह के किसी भी लातखाये समाज में, सामाजिक शुचिता के विरूद्ध विद्रोही साहित्‍य के अभाव पर बल दिये जाने की ज़रूरत है, और गुप्‍तरूप से बल दिया भी जाता रहा है[2], यह दीगर बात है कि उसे दो सौ लोगों से ज़्यादा के संसार में पहुंचाने के अभी भी जरिये नहीं हैं. हमारी हिंदी में तो नहीं ही हैं.

यही वज़ह है लड़की अपने स्‍कूली दिनों में भी इन सवालों से, मतलब अपने उलझे बालों से जूझती रही थी, कक्षा के भूगोल शिक्षक राममणि शर्मा से दु:खकातर स्‍वर में लड़की ने सवाल किया था, ‘सर, ये किस तरह की शिक्षा है, आप अक्षांश और विषुवत समझाते हो, लेकिन हमारे गांव में पीने को पानी क्‍यों नहीं, यह नहीं बता पाते?

ऐसा नहीं कि घर में मां और स्‍कूल के अपने भूगोल मास्‍टर की बंद दुनिया से ही केवल लड़की खार खाती, नहीं, जिधर जाती खाने को उसे खार ही मिलता. जवानी के दिनों में खाया जानेवाला सारा खार लड़की ऑलरेडी बचपन में ही खा चुकी थी, और बावज़ूद इसके कि वह तीन बार अपने बालों पर उस्‍तरा चलवा चुकी थी, प्रण किया था कि ज़रूरत पड़ने पर किसी भैंस से भले करे, आदमी से शादी नहीं करेगी (हालांकि लड़की भी जानती थी दोनों में विशेष फर्क़ नहीं है[3]) मगर अंततोगत्‍वा, फिर अपने लड़की होने में हार भी जाती थी. मतलब बाल हैं कि फिर बढ़ ही जाते थे, और शादी की शुचिता का मामला ऐसा था कि वह चाहकर भी अपने लिए भैंस नहीं चुन सकती थी[4].

लड़की कभी अचक्‍के में स्‍वयं को सोचता पाती और सोचते हुए हतप्रभ होती कि ऐसा कैसे है कि लड़कीपने के लंबे जीवन में उसे सचमुच प्‍यार जैसा प्‍यार कभी किसी से हुआ नहीं[5], जबकि नफ़रत इतने लोगों से हुई है? सबसे ज़्यादा तो अपने बालों से ही होती रही है? कैन दिस मच ऑफ़ हेट्रेड बी अनडन? एवर?

ऐसा क्‍यों है कोई नायिका सिर्फ़ फ़ि‍ल्‍म के परदे पर गाती दिखती है, ‘आज फिर जीने की तमन्‍ना है, आज फिर मरने का इरादा है’, जबकि वास्‍तविक जीवन में जीने की तमन्‍ना बार-बार मार डाले जाने के‍ खौफ़नाक मिशनों में अपने को ज़ाहिर करती रहती है? लड़की चार कदम बिलकुल तनी हुई रीढ़ के साथ चलना चाहती है, लेकिन प्रीगनेंसी की कमर का दर्द और बेहया बाल फिर-फिर उसे लंगी मारे चलते हैं, लड़की जानना चाहती है कैसे जिये अपना जीवन.. और फिर तत्‍क्षण जानती है कोई और नहीं, खुद उसे ही अपने जवाब ढूंढने होंगे[6]..



[1] कृपया देखें, ‘फ़र्दर टेल्‍स ऑफ़ द गर्ल’, सुकोमलिनी सैंडहर्स्‍ट, हाफवर्ल्‍ड प्रैस, बारसेलोना, 2003 व ‘द रेचेड ऑफ़ द हार्ट’, हिराका तीनासाकी, लोनली स्‍टार, 2006.

[2] ‘कोई दूसरा नहीं है, लड़की स्‍वयं ही स्‍वयं की हत्‍यारी है’, स्‍वशिक्षा लेखमाला, खंड तीन, नीलाक्षी बानो, गोरखपुर व ‘द ब्‍युटि मिथ’, नाओमी उल्‍फ, विंटेज, 1991.

[3] ‘क्‍यों जानवर पुरुष से ज्‍यादा बेहतर हैं’ वही स्‍वशिक्षा लेखमाला, खंड तीन, गोरखपुर.

[4] ‘हू डिसाइड्स व्‍हॉट आई चूज़ फॉर ए पार्टनर?’ सरमन्‍स इन द कोर्ट, द गर्ल एंड अदर स्‍टोरिज़, हाल्‍फवर्ल्‍ड प्रैस, 1999.

[5] ‘द आइडिया ऑफ लव इज़ ए मार्केटेबल फैंटेसी, नॉट द फिमेल रियैलिटी’, द गर्ल सीरिज़, हाल्‍फवर्ल्‍ड प्रैस, 2008.

[6] एक अन्‍य संदर्भ में कृपया इसे भी कंसल्‍ट करें, ‘अपनी लड़ाई आदिवासी स्‍वयं लड़ेगा’, ग्‍लैडसन डुंगडुंग, काउंटरकरेंट्स ऑर्ग, मई, 2010.

 
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Fauziya Reyaz - May 7, 2010 3:19 PM

its just....superb

Beji - May 7, 2010 3:39 PM

mool post to khair theek hai...par references ajab,gajab,gareeb,ajayabghar hain...maaf keejiye ham roman se patan kar rahein hain

Amitraghat - May 7, 2010 6:38 PM

"हमेशा की तरह रोचक.. आपकी हर पोस्ट को बेहद ध्यान से पढ़ना पढ़ता है...इससे आँखों पर ज़ोर पड़ता है ...बेहतरीन..."

Mired Mirage - May 7, 2010 7:12 PM

वाह!
घुघूतीबासूती

स्वप्नदर्शी - May 7, 2010 9:23 PM

सर अझुरा के बालों के जीव जंतु, इधर -उधर नहीं फैले? शायद ये रेफेरेंस देखना रह गया
[7] Few thoughts about biodiversity and endangered species in the hairy habitat. Journal of blue planet turning red. Red press, Oklakhanda, district Gadbadjhala

'अपनी लड़ाई आदिवासी स्‍वयं लड़ेगा'.. इसे पढा था जब आपने फ़ेसबुक पर शेयर किया था.. अच्छे लहजे से उन्होने अपना पक्ष रखा है..

इस पोस्ट के बारे मे क्या कहू?? सोचता हू कि जो मै समझ पाया क्या ये पोस्ट यही कहती है.. या ये सिर्फ़ एक रैन्डम रैम्बलिन्ग है..

’गऊ आदमी’ के बारे मे पढकर राग दरबारी याद आ गया...

P.S. कभी कभी डरता हू कि कही आप इस मूर्ख को झिडक न दे जो आपकी पोस्ट्स पर जब देखो आकर खडा हो जाता है... :। ये लिखते वक्त भी डर ही लग रहा है... :।

Swati - May 16, 2010 2:31 PM

आप अद्भुत लिखते हैं। एक लड़की की मन की बात लिख पाना आपको साहित्यक व संवेदनशील व्यक्ति दोनों बना देता है।
जैस आप शायद जानते हैं, मैं ब्लौग जगत में ज़्यादा नही जाती; वक्त की कमी ही समझें। रवीश कुमार के लेख (हिन्दुस्तान) से गयी, तो पहले दूसरा अन्श पढ़ा।
तुरन्त मुझे एक मलयाली कहानी याद आयी। साथी अफ़लातून की मदद से समकालीन साहित्य का वो अंक निकाला,जिसमें औरत के बाल व sexuality(यौनिकता) के ’कथित’ या वास्तविक(!!) सम्बन्ध को बहुत ही खूबसूरत ढंग से लिखा है सारा जोज़ेफ ने( समकालीन साहित्य, अक्तूबर-दिसम्बर १९९३)।
औरत की यौनिकता व यौन शुचिता के पहरेदार दिनों-दिन आक्रमक होते जा रहे हैं।
लड़कियों की मानसिकता बदल रही हैं, मगर धीमी रफ़्तार से।
आज पहला अअंश पढ़ा। कहीं कवियित्री कमला दास पर तो नही लिखा गया हैं :-?
जो भी हो, लिख कर तो एक लिन्क भेज देंगे तो आपके पाठक वर्ग मे १ संख्या बढ़ेगी।

स्वाति

Pramod Singh - May 16, 2010 2:55 PM

@स्‍वाति,
मैं समझा नहीं, लिखकर कौन सा लिंक भेजा जाना है. क्‍योंकि सामाजिक दासत्‍व के मनोलोक से इस लिखे का भले कोई अप्रत्‍यक्ष संबंध हो, अदरवाइस कमला या और किसी के जीवन से उठाये हवाले इसमें नहीं हैं, एक तरीके से कहिये तो ऐसा कोई गहरा पाठ भी नहीं है कि इस तत्‍वशील नज़र से इसे पढ़ा जाये, नहीं? एक सिंपल, पतित स्‍केच है, बस.
अदरवाइस वैसे आप मुझे यह जानकारी देकर दंग कर रही हैं कि मेरे ब्‍लॉग का एक पाठक बढ़ जायेगा, मैं तो सोच नहीं, मानकर चल रहा था कि आप अज़दक की रेगुलर हैं, नहीं हैं तो इसमें साथी अफ़लातून की फिर कौन, कैसी साजिश है?

Swati - May 16, 2010 3:08 PM

@ प्रमोद सिंह,
मैं किसी भी ब्लॉग को नियमित नहीं पढ़ती। आपकी पोस्ट्स की लिंक मेल से मांग रही हूँ ।

Pramod Singh - May 16, 2010 3:24 PM

@स्‍वाति,
मेल से मांग रही हैं लेकिन बिना ई-मेल दिये मांग रही हैं? किस पोस्‍ट का, इस पोस्‍ट का- http://azdak.blogspot.com/2010/05/blog-post_06.html मांग रही हैं?

Priyankar - May 17, 2010 5:54 PM

मार्मिक ! अद्भुत !!

मुर्शिद की मुरीदी का तलबगार हूं . कसम से !

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