Wednesday, May 12, 2010

चिंताजनक प्रश्‍न है हंसते-खेलते सब तक पहुंचने वाले दु:स्‍वप्‍न अभी तक ऐसा क्‍यों है कुछ लफंगों की पहुंच में नहीं आ रहे?..

पता नहीं कुछ कैसे अभागे लोग हैं दुनिया कहीं से कहीं पहुंच जाएगी मगर ऐसे चिरकुटों की हाय-हाय का असहायगान बंद नहीं होगा कि भाई साहब, भाई साहब, सुना बिलासपुर तक में आ रहे हैं, फिर ऐसा कैसे है कि हमारी तरफ आने में अभी भी अवरोध बना हुआ है? मतलब कुछ करिये, हिलिए, हिलाइए. कैसे भी करके हम वंचित, मनहारों के जीवन में दु:स्‍वप्‍न लाइए! इतने सारे घसियारे एक स्‍वर में शिकायत कर रहे हैं मतलब कहीं तो गड़बड़ी हुई है, समयोचित व सुनियोजिक जनतांत्रिक वितरण में कहीं करके तो लफड़ा हुआ है. क्‍योंकि आम तौर पर तो कम ही अपनी मां की असल औलाद होंगे जिनके हो सकता है ब्‍लैडर की गति में अवरोध बना रहता होगा, मगर दु:स्‍वप्‍न जीवन में सुभीते से ही चले आते होंगे. और यूं भी, एक बार भारतमाता की औलाद हुए तो यह संभावना तो वैसे भी तड़ से ऊपर चली ही जाती है कि दु:स्‍वप्‍न न केवल आयें, बल्कि अच्‍छी मात्रा में और ठेल-ठेलकर आयें[1]. फिर भी कुछ तिलकुट तिलंगे हैं यहां-वहां, दरवाज़ों के पीछे, जलाशयों के नीचे और अज्ञात जंगलों में शिकायत करते फिर रहे हैं कि उन्‍हें नहीं आ रहे, मई लगभग आधा गुज़रने को चली आई, भटके हुए बिल गेट्स रायबरेली तक पहुंच गए फिर क्‍या है कि हमारे (मतलब इन तथाकथित शिकायतधर्मियों के) तक दु:स्‍वप्‍न अभी पहुंचे नहीं? आखिर इतने समय तक कहां अटके हैं? या होशियार, कहीं और घपला हुआ है? और अगर नहीं हुआ है तो वाकई सोचनेवाली बात है कि जिन तक नहीं पहुंचा क्‍या ये लोग अब भी भारतमाता की औलाद कहाये जाने के काबिल हैं? और नहीं हैं तो आखिर किस माता की औलाद हैं[2], और जिसके भी हैं फिर जाकर उसी के पास रहें[3], भारतमाता का नाम कतई खराब न करें..

मैं उम्‍मीद करता हूं मैंने आपके मन का कोई कोमल, अप्रीतिकर तार नहीं छेड़ा है. और छेड़ा है ही तो अप्रीतिकर ही छेड़ा हो, कोमल को दूर ही रहने दिया हो. जैसा समय है उसमें अच्‍छा है हम कोमलता से जितनी दूर रहें उतना ही अच्‍छा. कोमलता के पास रहने की जो अदूरदर्शी वक़ालत करते हैं वो भले लोग (? ‘भले’? अरे, हू यू आर किडिंग?) भूल जाते हैं कि फिर बाद में भी पास कोमलता ही रहेगी, दु:स्‍वप्‍न दूर ही रहेगा और सपना रहेगा, वास्‍तविक प्रीतिकर दु:स्‍वप्‍न जो हैं हमारे दुश्‍मनों के पास जाएंगे, ऐसी अप्रीतिकर स्थिति के लिए हम तैयार हैं? जो तैयार है वो अपना नंगा चेहरा लेकर सामने आए और अपनी कॉम्‍प्रोमाइसिंग राष्‍ट्रभक्ति का खुलासा करे! और अगर उसमें ऐसा करने की हिम्‍मत नहीं, जांबांज दिलेरी नहीं तो दूसरों के सुस्‍वादू दु:स्‍वप्‍नकारी थाली में घासलेटवाद फेंटने के षड्यंत्रों से बाज आये![4]

राजाजी विस्‍थापक चौहान ने जीवन में ढेरों बकवास कहा होगा, और इसे मानने में हमें कतई शर्म नहीं कि राजाजी ही क्‍यों उनके लग्‍गु और फग्‍गु और समस्‍त चाटुकारों ने भी कहा है, मगर साथ ही यह भी सच्चाई है कि राजाजी ने बीच में कभी गलती से समझदारी के मणिरत्‍न भी कहे हैं, मतलब यह महज संयोग ही नहीं कि चेन्‍नई के चेन्‍नई होने से पहले विशाल नरकंकालों के भयविदग्‍ध तमिलियन गदहपचीसी के बीच राजाजी ने फड़कती आवाज़ में घोषणा की थी, ‘देखने ही होंगे सारे दु:स्‍वप्‍न-रत्‍न, बेचना ही होगा इस देश को बारम्‍बार.’

आज के क्‍लांत, कातर समय में कितने नरोत्‍तम होंगे, भाषाई असामर्थ्‍य के तीखे विषधर बाणों से घायल दर्शकगण के बीच भी, जो ऐसी निस्‍संग निर्ममता में स्‍वयं के राष्‍ट्र के प्रति कुकृत्‍य को परिमार्जना में परिभाषित करेंगे? नहीं होंगे, किंतु अपने राजाजी थे और इसीलिए ऐसे ही नहीं है कि उन्‍हें विस्‍थापना के चौहान की उपाधि से विभुषित किया गया है. और भी बहुत सारी उपाधियों से विभुषित किया गया है लेकिन उसकी चर्चा का यह स्‍थान है न अवसर. जिसका है उसके बारे में सोचकर मैं एक बार फिर दंग हो रहा हूं कि आखिर हमारे समाज में क्‍या दोष है कि इतनी रचनाधर्मिता है लेकिन दु:स्‍वप्‍नों को लेकर अभी भी एकांगी व निराशावादी साहित्‍य रचा जा रहा है, जबकि प्राचीन पूर्वीब्‍लॉक व टीटो के यूगोस्‍लाविया से सबक लेकर हम सहर्ष ही दु:स्‍वप्‍नों के सेलिब्रेटरी युग में प्रवेश कर सकते हैं. कर सकते हैं क्‍या कर लेना ही चाहिए. मगर फिर, बात अज्ञेय के परिमार्जन से निकलकर उग्र के भदेस अश्‍लील में आकर उलझ जाती है, मतलब दीखने और सुनने लगता है कि अभी भी कुछ ऐसे नरपुंग व नरबानव हैं जो दु:स्‍वप्‍न की इस आह्लादकारी महासभा में सुख के प्रचंडत्‍व से लाभान्वित होने से बाज आ रहे हैं, और केवड़े की कुल्‍फी का आनंद लेने की जगह अभी भी पिटे हुए पुरातन यथार्थवादिता के धूल में पंकित हो रहे हैं, गर्द में हिचकिचाते हुए नहा रहे हैं.[5] क्‍या यह समाज समरसता की सार्थकता में दु:स्‍वप्‍न का महागान गाने से इस बार भी वंचित रह जायेगा? क्‍या इस कृत्‍य के लिए इतिहास हमें माफ़ कर सकेगी?

पता नहीं. कम से कम मैं तो बड़े माफ़ी वाले मिजाज़ में स्‍वयं को नहीं ही पा पा रहा हूं. मतलब अभी डेढ़ घंटे पहले किसी ने ख़बर किया तो इस बात की ख़बर हुई मगर सुबह रवीश ने एक एसएमएस मार कर बताना ज़रूरी नहीं समझा कि कुछ लिखे हैं, हिंदुस्‍तान में अज़दक को एगो लात लगाये हैं? इसीलिए जो कहते हैं कि सारी-सारी रात मज़े में सोये हुए इंतज़ार करते हैं और फिर भी नहीं आता, मुझे सचमुच ताज्‍जुब होता है. क्‍योंकि मैं तो पूरी पूरी रात जगा रहता हूं और न केवल दु:स्‍वप्‍न देखता हूं, बल्कि यह तक देखने लगता हूं कि दु:स्‍वप्‍न कितने समय तक मुझी को देखते रहने की मुस्‍की काट रही है..


[1] उड़ीसा से लेकर अरुणाचल तक 78% की स्‍वास्‍थ्‍यप्रद उपस्थिति, मीनू रघुनंदन, दु:स्‍वप्‍न डॉट ऑर्ग.

[2] ‘भारतमाता की असल औलाद कौन और नकल खरताल कौन?’, स्‍वामी वृथबिहारीनंद, दशजन्‍य, खंड पांच, 2010.

[3] ‘कृपया उड़ि‍या उड़ीसा जायें और बिहारी बिहार, और जाकर फिर वहीं रहें, वापस लौटकर हमारी मां-भूमि को गंदा न करें’, चंडीदास, ‘सामाजिक दासत्‍व व अन्‍य पतित प्रसंग’, हार्पर पेरेनियल क्‍लासिक सीरिज़, 2013.

[4]आयेंगे दिन दु:स्‍वप्‍नों के', कुमुद जोशी, सप्‍तर्षी प्रकाशन, 2009.

[5] फिर वहीं, ‘आयेंगे दिन दु:स्‍वप्‍नों के'.


2 comments:

  1. सारी-सारी रात मज़े में सोये हुए इंतज़ार करते हैं और फिर भी नहीं आता, मुझे सचमुच ताज्‍जुब होता है. क्‍योंकि मैं तो पूरी पूरी रात जगा रहता हूं और न केवल दु:स्‍वप्‍न देखता हूं, बल्कि यह तक देखने लगता हूं कि दु:स्‍वप्‍न कितने समय तक मुझी को देखते रहने की मुस्‍की काट रही है..

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  2. हम लजाते नही है अच्छे लेख को पढ्कर तारीफ़ करते है । बहुत अच्छा लिखा आपने। मेरा ब्लोग भी विजिट करिये न।

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