मतलब वही, नये बोतल में पुरानी शराब, यही होगा न? कि सरल और निर्दोष से दीखते इस वाक्‍य में कहीं इससे भी ज्‍यादा गूढ़ार्थ घुसे हुए हैं? ठीक है, आपकी बला से घुसे रहें, यह कोई डिकंस्‍ट्रक्शनिस्‍ट सेशन नहीं है, और न आपमें से कोई उम्‍बेर्तो एको का चेला है, ले-देकर आपका जो बुद्धि-वैभव है, और मेरी विवेचना-सामर्थ्‍य- दोनों की औकात हम दोनों न भी समझ रहे हों, तो कम अज कम अपनी उड़ान के नीचे फैला कांपता मैदान तो मैं ठीक से देख ही रहा हूं. तो अच्‍छा हो हम डिकंस्‍ट्रक्‍शन की उंगली बहुत ज्‍यादा एक दूसरे को न चुभोयें, डेविड धवन की फ़ि‍ल्‍म की तरह बिना किसी प्रिटेंस के तड़ अपने लहकनशील स्‍तर पर चले आयें, आयं न?

ठीक. मगर आपके दिमाग में कौन पुराना गाना डोल रहा था? अब बैठे-बैठे सुरैया और शमशाद बेगम के रेकार्ड पर सुई मत फिराने लगिएगा! क्‍योंकि आपके लिए न होती होगी, मेरे लिए गंदे मज़ाक की सीमा है. यहां आलम ये है कि राजेंदर कुमार और जॉय मुखर्जी तक का गाना गुनगुनाने पर हमसे चार साल बड़ी औरत मुंह बाये न केवल हमें ताकती रहती है, बल्कि ‘अंकलजी!’ तक बुलाने लगती है, तो सुरैया और कल्‍पना कार्तिक के गानों में उलझकर आपसे अनुमान नहीं लगेगा, लेकिन मैं धड़ल्‍ले से अंदाज़ लगा सकता हूं मेरी सार्वजनिक कमनीयता किन नीचताइयों की गहराइयों को छने लगेगी. कहने का मतलब सुरैया और कल्‍पना कार्तिक पर आपका लाड़ उमड़ रहा हो तो अच्‍छा है, खूब उमड़ाइये, मगर उसे अपने तक ही रखिए, ज्‍यादा से ज्‍यादा अपने तकिया के नीचे रखिए, मुझे उसमें मत उलझाइए, क्‍योंकि मैं इतना डेटेड नहीं हुआ हूं. न होने की तमन्‍ना रखता हूं. क्‍या तो वो गाना था? इतना पुराना नहीं था? हां..

अच्‍छा तो हम चलते हैं / फिर कब मिलोगे? / जब तुम कहोगे / जुमे रात को? / न आधी रात को / अ, कहां? / वहीं जहां कोई आता-जाता नहीं (स्‍थान का संदर्भ मेरे ब्‍लॉग से है).. आगे? आगे के बोल अभी तक याद रहते तो हम समय में इतना आगे आये होते, साहब? आगे दूसरे बोल सुनिये..

कौन है जो सपनों में आया (चूहा, चूहा) / कौन है जो दिल में समाया (चूहा, चूहा) / लो झुक गया आसमां भी (संदर्भ मेरे कमरे के झुके हुए छत से है) / इश्‍क मेरा रंग लाया (अर्थात् मेरी लापरवाह गंदगी और गैरजिम्‍मेदारी रंग लाई) / ओ पियाS आSS आSS (अब चीखकर होय क्‍या जब चिड़ि‍या चुग रही खेत?)..

तुम जो मिल गए हो (मतलब चूहा जब से मिला है) / ये जहां मिल गया (मतलब दृष्टि ऐसी फोकस हुई जा रही है कि चूहे में सर्वसंसार के दर्शन हो रहे हैं) / ये ज़मीं मिल गई, आसमां मिल गया (मतलब, फिर वही)..

वो शाम कुछ अजीब थी (थी ही) / ये शाम भी अजीब है (नैचुरली है) / वो कल भी आसपास थी (थी ही, संख्‍या में तीन अपने समूचे कुनबे के साथ थी, मिसेज़ मूसा कुमारी) / वो आज भी करीब है (कभी कभी तो इतने करीब लगती है कि लगता है वही रहेगी, मैं तो नहीं ही बच पाऊंगा!)..

मैं एक सीधा सवाल पूछता हूं, यही कि दुनिया में जब इतनी पुरानी शराब है तो नई की पैकेजिंग का खामख्‍वाह किसी भी तरह का फ़रेब क्‍यों? सीधे-सीधे हम स्‍वीकार नहीं सकते कि बिन चूहा जग सूना? या ‘तुम मिले, प्‍यार में, मेरा जीना गवारा हुआ. तुम मिले, प्‍यार में, मेरा सब कुछ तुम्‍हारा हुआ? माने ये कोई मेरे कहने की बात नहीं है, चूहे इस सच्‍चाई को मुझसे कहीं ज्‍यादा मार्मिकता से महसूस कर ही रहे हैं!

 
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सतीश पंचम - May 14, 2010 5:51 AM

@ यहां आलम ये है कि राजेंदर कुमार और जॉय मुखर्जी तक का गाना गुनगुनाने पर हमसे चार साल बड़ी औरत मुंह बाये न केवल हमें ताकती रहती है, बल्कि ‘अंकलजी!’ तक बुलाने लगती है

अब अंकलजी को अंकल जी न कहे तो क्या कहे :)

आप भी नेचुरल बातों को अनेचुरल बना रहे हो

चुरल = पक जाना :)

यह तोहमत हम पर भी लगती है कि क्या बढ़ऊ सरीखे गाने सुनता हूँ पुराने जमाने के -

नजरिया की मारी.... मरी मैं तो गुईंया..कोई जरा जा के बैदा बुलाओ..धरे मोरी नारी...हाय राम....नजरिया की मारी...

नौशाद जी तो संगीत देकर चले गए यहां उनका Fusion music सुनने तक पर एतराज....का रे बुरबक....आज के जमाने में बाप के जमाने का गाना सुनता है ( एक एफ एम चैनलवा की यही पंचलाईन थी)

एफ एम वा डिस्को में सुनाए..रोक न पावां
अक्खां विच्चों गम दियां बरसातां नूं..हो हो हो...इश्क तेरा तडपावे...होए...होए...होए...हो हो..

मारा ससुरन को...रोएंगे भी डिस्कोथिक होकर :)

डॉ .अनुराग - May 14, 2010 12:01 PM

घनी अजदकिय पोस्ट है जी!!!!

Pramod Singh - May 14, 2010 1:19 PM

@डाक साब,
अब आप छोटी और बड़ी ईकार वाली ग़लती भी कीजिएगा? इस उमर में? दवाई और इंजेक्‍शन वाली जो करते हैं उसकी तो अभी बात नहीं ही हो रही है?

पुराने गाने कम से कम नयी बोतलवा में धरने लायक तो हैं । नये गाने तो बैक्टीरिया के शिकार हो गये ।

Shiv - May 14, 2010 2:06 PM

मतलब ये कि;

"मेघा छाये आधी रात बैरन होइ गई नीदिया...रामा मैं का करूं?"

इसमें भी चूहा का दोष है? ये अंकल कहने का तो रिवाजे चल पड़ा है. हाल ये है कि मिथुन के गाने गा दिए तो अंकल बन गए. कोई दो बार अंकल कह दिया तो चूहा बन गए. आदमी क्या-क्या बनता फिरेगा? कितनी भी कोशिश करे नई बोतल में नई शराब जाती ही नहीं. लगता है जैसे लड़ बैठेगी कि; "नहीं जाऊँगी. क्या कल्लोगे?"

मामला वहीँ राजिंदर कुमार पर अटका हुआ है..."दिन जो पखेरू होते पिजड़े में मैं रख लेता....मोती के दाने देता" टाइप. कहाँ से पाठ होगा नए गानों का? पिया रंगून गए तो वहीँ के होकर रह गए. वहां से आगे चलकर बैंकाक तक भी नहीं पहुँच सके...पता नहीं रंगून में कौन सी लाली उड़ रही है?

नहीं हो सकता, नया पाठ...ना!!

माधव - May 14, 2010 6:41 PM

interesting

http://madhavrai.blogspot.com/

http://qsba.blogspot.com/

मै भी आपको ’अंकलजी’ ही कहूगा.. ’अंकलजी’ मे एक क्लोजनेस छुपी है.. :)

घर से चूहे भगाईये.. कम्बख्त आपकी पुरानी शराबो मे भी जगह बना रहे है ;)

वैसे नयी बोतल मतलब ये रिमिक्स गाने, टल्ली होकर(जब कुछ भी समझ नही आता), उछल कूद करने के लिये ठीक है.. बाकी पुरानी शराब का जो नशा अकेले मे चढता है न.. अब आपके अकेले चूहो को ही देख लीजिये..

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