घोड़ा रास्‍ता भूल गया होगा, एक सरपट तेज़ी से दौड़ता, कुछ आगे जाकर बार-बार अचकचाकर फिर खड़ा रह जाता होगा, ताज़्ज़ुब और तक़लीफ़ में जबड़े चबाता, अपने सोचने को सिलसिले में दुरुस्‍त करने की कोशिश करता, कि ग़लती कहां हो रही है, कि मन में यह किसने रास खींची सिर्फ़ दौड़ना नहीं होता (जिसे घोड़ा जानता होता), दौड़ने की तरतीब और तरीके होते हैं (जिसकी गांठ मन में और-और तनती होती, कोई खोलता न होता?), नतीज़तन घोड़े के बाल और उड़ते होते, रवानी हवा को चीरकर भागती, भागी-भागी फिर लड़खड़ाई जाती.

दूर किसी गांव साड़ी की गांठ में उंगलियां फंसाये कोई बुढ़ि‍या पगलौती में बुदबुदाती होती, ‘अच्‍छा किये, बच्‍चा, सिर फोड़े, लेकिन क़ायदे से अपना हिसाब बखत रहते ही जोड़े? नहीं तो देखो मुझे, मेरी उमर तक यूं ही बेवज़ह एक ही जगह पगुराते रहते, जीवन कहां-कहां उड़ाये लिये जाती है, लेकिन फिर तुम क्‍यों कहीं जाते होते? मुरझाये उंगलियों का हारापन तकते, मौत पड़ोस के आंगन खिड़की के पल्‍ले बजाती, चौंककर शर्म से एक बार फिर शुरू से आखिर तक सोचते यह कैसा जीवन जिया, क्‍यों जीते रहे इतने बरसों बेशरम? बहुत दुख झेले हैं, बच्‍चा, बहुत भूख, डेढ़ रोटी और बासी तरकारी के पीछे सिल-बट्टे से उंगलियां कुचवाई हैं, सास की क्‍या-क्‍या यंत्रणायें नहीं पाई हैं, काहे बास्‍ते, कि माथे पर अपना कहनेवालों की एक छत रहे? हिंसा के अंधेरों में दीये की तरह जलती जलूं, एक घर की लछमी कहलाऊं, रोज़ ज़रा-ज़रा मरी जाऊं? बस इसी इतने के लिए? अच्‍छा किये सब फूंक दिये, निकल भागे, अब भागते चलो, भागो भागो..’

दौड़ती कहानी हदसकर पलभर सांस लेने को ठहरती, खुद की फिर उसी जानलेवा ज़ि‍रह में उलझती कि कौन समाज है, किसके बीच छत्तीस सिंगार में मैं इतराती भागती, इठलाती, अपना बुलाये जाने के अरमान पालती हूं? मेरी मुहब्‍बतों का गोल, भूगोल क्‍या है, छाती में छेद किये बिना चैन नहीं पड़ता, लेकिन फिर उसके बाद अपने पढ़वैया को किस ठावं क्‍या गांव लिये जाती हूं, सच बताना, कहानी, मेरी बुलबुल, लकड़ी की तलवार भांजते रहते हैं बिचारे लड़ाके, अपने पढ़ाके को सचमुच कब किस पुलिया पार लगाती, कहीं पहुंचाती हूं?

 
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सतीश पंचम - May 17, 2010 2:10 PM

Superb post....superb..

इस तरह की मन की गाँठ को पढ़ने के बाद मन दो एक पल का ठहराव खुद ब खुद ले लेता है.

बहुत बढिया।

Amitraghat - May 17, 2010 6:26 PM

वाह! क्या लिखा है..."

सब ऎसे ही तो भाग रहे है.. निरूद्देश्य.. कभी कभी लगता है कि ’मैट्रिक्स’ मूवी जैसी ही ये एक फ़ेक दुनिया है और हमे भी किसी पदार्थ के लिये जीवित रखा जा रहा है.. इस दौड से, भागने से उलझाकर रखा जा रहा है कि हम दो पल चैन से सोच भी न पाये कि हम कर क्या रहे है और वो भी किसके लिये... बस जीवन जीते जा रहे है या यू कहे कि ये हमे जीता जा रहा है..
कहानी दौडती, अटकते तो रहेगी न आखिर वो लेखक के सिम्पल हार्मोनिक मोशन करते हुये मूड पर भी डिपेन्ड करती होगी.. अब लेखक सैड है और लिखता हास्य है, ये होना मेरे हिसाब से तो बहुत बडी बात है... कहानी और पात्र लेखक मे ही तो भीतर जीते है.. इसलिये लेखक की तरह इनका भी दौडना, अटकना बनता है.. पर कभी रुके न.. चलती रहे.. यू ही..

आपका लिखा पढना (जो भी थोडा बहुत समझ मे आ पाता है), बहुत अच्छा लगता है..

मनीषा पांडे - May 19, 2010 6:33 PM

काहे बास्‍ते, कि माथे पर अपना कहनेवालों की एक छत रहे? हिंसा के अंधेरों में दीये की तरह जलती जलूं, एक घर की लछमी कहलाऊं, रोज़ ज़रा-ज़रा मरी जाऊं? बस इसी इतने के लिए? अच्‍छा किये सब फूंक दिये, निकल भागे, अब भागते चलो, भागो भागो।’

बहुत सुंदर। हर औरत ये सब इसीलिए झेलती है कि सिर पर एक सो कॉल्‍ड अपनी छत हो, लेकिन छत अपनी होती कहां है? उन सबने सचमुच अच्‍छा किया जो निकल भागे। बाद में क्‍या हुआ, जो हुआ सो हुआ, भले कुछ और अच्‍छा न हुआ पर वो जो निकल भागे, सो सचमुच अच्‍छा हुआ।

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