Tuesday, May 18, 2010

कहानी की कहानी

उनींदे के दरवाजे़ सपने के सुरंग में उतरते ही मुसाफिर को ख़याल हुआ वह ग़लत ठिकाने चला आया है, उसने खूब हाथ-पैर पटकने शुरु किये, मगर कहानी में एक मर्तबा कूद पड़ने के बाद अब क्‍या हो सकता था, भोला मुसाफिर लचीले तारों की महीन, नशीली दुश्‍वारियों में और-और उलझता गया.”अबू-उबैद-अल-कासिम-इब्‍नसलाम, 14वीं सदी, देश-स्‍थान अज्ञात.

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सस्‍ते उपन्‍यासों और सरकारी कर्मचारियों के घपलों की ऊल-जुलूल क़तरनें इकट्ठा करते रहने से अलग गफ़ूर के कोई शौक था तो अपने माथे पग्‍गड़ बांधने का. दांतों के बीच जीभ दबाये गफ़ूर जब पग्‍गड़ बांधते होते तो फिर पग्‍गड़ ही बांधते होते, नज़र सामने की नोक में बनी रहती और पट्टे फेंटते व उसे ठोंक-बजाकर माथे पर साटते वक़्त फिर दुनिया का अन्‍य कोई मसला (या मसाला) गफ़ूर को उनके खुशपने की सौ फ़ीसदी केन्‍द्रीयता से अलग कर सकने में पूरी और बुरी तरह नाक़ाबिल होता. सिर्फ़ और एक दावं ऐसा था जिसे खेलते हुए फिर अपने पग्‍गड़ तक को गफ़ूर किनारे कर जाते थे! वह दावं था हमारा चूतिया काटना.

इसमें मज़ा यह था जैसे-जैसे दावं की फंसान में मेरी चोटखायी कातरता की मलिनता बढ़ती चलती, उसी अनुपात में गफ़ूर के चेहरे की खिलन का बैरोमीटर ऊपर चढ़ता चलता. अलबत्ता गफ़ूर पूरी कोशिश करते कि उनके चुप्‍पे की मुस्‍कराहट का सब तेलिये तमाशबीन भरपूर आनन्‍द उठाते होवें, बस मेरी नज़र से ही वह बची रहे.

कभी तबियत होती कि गफ़ूर का सिर दीवार पर दे मारूं, या भागते रिक्‍शे के पहिये की सींक में उनके पग्‍गड़ के कपड़े को उलझाकर उसके चिथड़े करके हवा में उड़ा दूं, मगर इसमें परेशानी यह होती कि गफ़ूर का सर इतना बड़ा था कि मेरी हथेली की पकड़ में उसके आने का सवाल न होता, और जहां तक पग्‍गड़ के कपड़े के चींथने की बात थी, तो वह सिर्फ़ ख़याल ही था, क्‍योंकि असलियत में उसकी बात निकलने पर मेरी बात अभी खत्‍म भी न होती और मुझसे पहले मिलिंद और बनवारी जैसे गये-गुज़रे तक शर्मिंदा होने लगते. मिलिंद दो पल सन्‍न रहने के बाद फिर अचकचाया खैनी ठोंकने लगता और गूलेल से छूटी गोली की तरह बात दागता, ‘आपो, अचपच, क्‍या बीमरीहा बात करते हो यार, जी एकदम घिनाइन करे लगता है!’

बहुत बार यह भी होता कि बनवारी के बात अभी समझ में भी न आती और हमारे इन पिटे अरमानों की ख़बर गफ़ूर के कान जलाने को पहुंच जाती. गफ़ूर लेकिन अपने पजामे से बाहर फैलते नहीं, अपने घिसे स्‍प्‍लेन्‍डर को कुएं की बाल्‍टी के पानी से नहलाते मुस्‍की काटकर मुझसे सवाल करते, ‘एगो सत्‍यभान जादव की जीवनी लाये थे, देखे तुम? एक से एक लंतरानी है, मगर बड़ी मीठी कहानी है!’

मुझे तत्‍क्षण शुबहा होता कि इस मासूम मुस्‍की के पीछे किसी कड़वी कड़ाही में हमें ठेलने की चाल खेली जा रही है, मैं संभलकर पैर पीछे करता, ‘होगी मीठी चाहे नमकीन, हमके क्‍या करना है?’

गफ़ूर चार कदम पीछे हटकर अपने स्‍प्‍लेन्‍डर सिंगार का एक नेहभरा नज़ारा लेते, ‘हां, तुम तिलकुट को दुनिया के कौनो अनोखी चीज़ का यूं भी क्‍या करना है. जाने हो, जदव्वा कहां-कहां घूम आया? बग़दाद, बख्‍शी सराय, तिफलिस, दमिश्‍क, इस्‍ताम्‍बुल, तेहरान, तुम कहीं गये हो, अयं?’

मैं सवाल के अचक्‍के में गंदे पजामे का पिछवाड़ा खुजलाता अपने को कोसता रहा कि सुबह से मनोहर के बगीचे से नीम के पत्‍तों और दतुअन की चोरी की इतनी अच्‍छी प्‍लैनिंग लिये टहल रहा था, प्‍लैनिंग अभी भी जेब में ही है, और पैर जो हैं फिर गफ़ूर के जलते कड़ाहे में फंसते दीख रहे हैं! मेरी जगह जवाब बनवारी ने दिया, ‘भइय्या अचपच, हेरान काहे ला जायेंगे? बिहार-शरीफ गये हैं, मनोहरपुरो गये हैं, ना भइय्या अचपच?’

मिलिंद हेंहें की हंसी हंसने लगा. इच्‍छा हुई खींचकर चप्‍पल मारूं बनवारी को मगर तभी यह भी याद आया सुबह से रामनिहारे की बहन नवकी से अपने पुराने प्रेमपत्र मांगने के बहाने किसी तरह उससे बात करने का रास्‍ता खोजने के वक्‍त से अभी तक नंगे पैर ही टहल रहा हूं, चिढ़कर बनवारी को गाली दी, ‘अबे, अचपच तुम्‍हारी मेहरारु के भतार हैं? हरामी हमारा नाम ठीक से नहीं बुला सकते?’

अपने खैनी रंगे दांतों के बीच ज़रा सी रौशनी दिखाते हुए मिलिंद ने जवाब दिया, ‘अरे, जइसन बेठीक आदमी होगा, अउसने ढीठ ओकर नाम होगा न, भइय्या जी, बोलिये जो गलत बोल रहे हैं?’

मेरी गरमी ठंडा करने की जगह गफ़ूर बाइक पर उठंगा खड़े जाने सत्‍यभान या कौनो और बदनाम किताब का पन्‍ना खोलकर अपनी अंग्रेजी से हमको रीझाने, ज्‍यादा डेराने लगे, जो पढ़ते रहे उसका लब्‍बोलुबाब नहीं, शब्‍दश: यही था- “What mister so and so writer sahib has to say, listen carefully, and he is saying this not now, but in the middle of the 19th century! What he is saying? That there is no Truth, there are just ways of seeing! Then listen this, I reject the idea of a central narrative line. I prefer to give us life as it is lived day by day, with its little commonplace incidents, which combine to form a complex, dramatic whole. No episodes carefully prepared and melded, but an apparently random collection of thoughts, an unexceptional sequence of ordinary occurances, with characters meeting, separating, meeting again, till they have said their last word..”

(बाकी..)

2 comments:

  1. गफ़ूर मियां की जय हो!

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  2. आपकी भी कोई खिचाई कर पाता है.. गफ़ूर भाई वाली कितबिया भी पढकर देखिये न और वाह क्या अन्ग्रेज़ी लाईने है भई..

    ज़िन्दगी जैसी भी है, खूबसूरत है.. with its little commonplace incidents, which combine to form a complex, dramatic whole..

    बहुत सुन्दर लाईन्स.. और गफ़ूर भाई एन्ड पार्टी की हमारी तरफ़ से भी जय हो..

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