Thursday, May 20, 2010

मैजेस्टिक ह्यूमन कॉमदी की कहानी


मैं जुसेप्‍पे को घेरना चाहता था, या मालूम नहीं खुद को सिर के बल खड़ा करके एक ऐसी चीज़ समझने की कोशिश कर रहा था जिस कहन के समझने के दिन अब बीती-बिसरायी हुई, क्‍योंकि सचमुच अब कौन पढ़ता है उपन्‍यास? किताब की दुकानों में और कुछ खुशहाल घरों की अलमारियों में पड़ी दीखती हैं, मगर आत्‍मा के घुप्‍प अंधेरों में उपन्‍यास की रौशनी में हम जीवन पढ़ें, इसकी अब किसी को फ़ुरसत कहां? पतले, महीन रेशों में फंसा फतिंगा छूटने को पंख फड़फड़ाता है, खीझ में झींकता, ‘मुझे देरी हो रही है! मुझे देरी हो रही है! उसे तब रेशों की बुनावट पढ़ने की फ़ुरसत थोड़ी होती है? छह साल की मेहनत का नतीजा थी ‘सेंटिमेंटल एजुकेशन’, जिसमें फ़्लॉबेर अपने समय की नैतिकता का इतिहास दर्ज़ करना चाहते थे, पागलों की तरह अदद कॉफ़ी के सहारे चौदह-चौदह घंटे कलम-घिसाई में खुद को घिसता, उपन्‍यासों की लिखाई में, फकत इक्‍यावन साल की उम्र में उस लहीम-शहीम देह का अंत हुआ, जिसने 1830 के गिर्द लगभग डेढ़ सौ उपन्‍यासों के विहंगम सीरिज़ की कल्‍पना की, द ह्यूमन कॉमेडी के नाम से जो समूची उन्‍नीसवीं सदी के फ्रांसीसी समाज का आईना बने, पैरिस से लेकर जिसका कैनवास कस्‍बों-देहातों तक पसरा हो, अलग-अलग उपन्‍यासों में बिखरे 2000 की संख्‍या में किरदार हों जिनमें सब तबकों और पेशों का प्रतिनिधित्‍व हो, और इन कल्पित लगभग डेढ़ सौ उपन्‍यासों में से जवान ने आनेवाले बीस वर्षों में, गरीबी और कर्जों के टेढ़े मकड़जाल के बावज़ूद, इक्‍वायन वर्ष तक की अवस्‍था में करीब नब्‍बे उपन्‍यास लिख भी मारे! आख़ि‍र किस चक्‍की का आटा खाकर बाल्‍ज़ाक यह असंभव अश्‍वमेध फ़तह कर रहा था, जुसेप्‍पे?
जुसेप्‍पे ने मुस्‍कराकर कहा, हमारी-तुम्‍हारी समझ में नहीं आएगा, आज के कॉरपोरेट हिसाब-किताब के दौर में नहीं ही आ सकता, कि किस पागलपने के ज़ुनून में आदमी चौदह से अट्ठारह घंटों की लिखाई करता रह सकता था, करीब पांच या छह बजे जनाब बाल्‍ज़ाक अपना सपर निपटाते और फिर करीब आधी रात को सोने जाते. उसके बाद आंख खुलते ही फिर लिखाई में टूट पड़ना, और उसमें कोई व्‍यवधान तभी आता जब मोस्‍यू फल, अंडे या गाढ़ी कॉफ़ी की खुराक में थोड़ी ऊर्जा बटोरने की खुद को मोहलत देते. पूरे जीवन अपने लिए खुद का बनाया हुआ यही उनका वर्किंग रेजिमेन रहा, एक मर्तबा तो- खुद बाल्‍ज़ाक ने लिखा है- कि पूरे अड़तालीस घंटे वो कलम-घिसाई में आंखें फोड़ते रहे, बस तीनेक घंटे का एक ब्रेक लिया कि एक झपकी ले लें! आज बैंक के काग़जों के पीछे अट्ठारह घंटे झोंकने की जीवनशैली और मूल्‍यों में आस्‍था रखनेवाले होशियार ‘कलाकार’ मिलेंगे (तब के फ्रांसीसी समाज में भी मिलते रहे होंगे), लेकिन रचनाशीलता की संजीवनी उपन्‍यास में झुंक रही थी, और देखो, बंदा फकत कॉफ़ी पर जी रहा था!
आगे जुसेप्‍पे ने दरअसल कहा नहीं, इतालवी में क्‍वोट किया, मैं उसका अंग्रेजी उल्‍था नत्‍थी कर रहा हूं, “Well, it was not always the case. Remember that Sunday afternoon in 1834 when he hauled his publisher, Werdet, off to one of the most expensive restaurants in Paris. Werdet had only some soup and a meager bit of chicken, but Balzac is said to have downed ‘a hundred oysters; twelve chops; a young duck; a pair of roast partridges; a sole; hors d’oeuvre; sweets; fruit (more than a dozen pears being swallowed); choice wines; coffee; liqueurs. Never since Rebelais’ or perhaps Louis X1V’s time, had such a Gargantuan appetite been witnessed. “
और किस्‍सा आगे जाता है कि इस ऐतिहासिक भीमभोज के बाद, बिना खाने का बिल चुकता किये, बाल्‍ज़ाक महाराज हाथ डुलाते हुए रेस्‍तरां के बाहर चले आये!
मगर बाल्‍ज़ाक के जीवन में ऐसे किस्‍से क्‍या किसी भी तरह के किस्‍से दुलर्भ ही हैं, किस्‍सों का जीवन जियें इसकी उन्‍हें फुरसत नहीं थी, तंगहाली और अतीत में कभी शौक चर्राया था तो अपना एक प्रकाशन खोलकर अपने माथे कर्जों का और बोझ लादे उसमें उलझते रहे, तिस पर फ़ुरसत का कोई क्षण होता तो वह उसे अपने उपन्‍यासों की लिखाई में ही होम करते होते. ऐसा क्‍या था उन उपन्‍यासों में, ‘द ह्यूमन कॉमेडी’ में, ‘सेंटीमेंटल एजुकेशन’ में, प्‍लीज़, मुझे समझाओ, जुसेप्‍पे?

2 comments:

  1. woww.. now this is called passion for writing... loved it..

    aur apne kuch beete hue palon mein laut gaya..

    ReplyDelete
  2. गज़ब के लिक्खाड़ से फिर रु-ब-रु कराने का शुक्रिया.
    अपने वह दिन याद आ गए जब दिल्ली पब्लिक लाइब्रेरी की रैक्स में सिर घुसाए उपन्यास और कहानी-संग्रह ढूंढा करता था . बरसों-बरस दोपहर दो बजे से शाम पांच बजे तक अपना पता DPL रहा है . अब तो लंबी सांसें ले-लेकर बच्चों को अपनी विरुद-गाथा सुनाना ही शेष बचा है .
    धन्यवाद .
    नॉन बुक्स के ज़माने में बुक्स की बात आउटडेटेड लगती है . आपका क्या ख्याल है?

    ReplyDelete