Friday, May 21, 2010

नौका डूबी पर सवार..


रह-रहकर पानी में चप्‍पू खेने की आवाज़ आती. इससे अलग एकदम सन्‍नाटा था. और अंधेरा.
रात भर की थकान के बाद तीन दिन पहले लड़का जब पहली मर्तबा सुबह के उजाले में नाव पर चढ़ा था तब उसकी खुशी का पारावार न था. जाने कहां-कहां के लोगों और उनके अजनबी पहरावों और तौर-तरीकों से भरी वह बड़ी नाव लड़के के लिए एक समूचा शहर थी. नाव पर पैर पड़ते ही लड़का औरत की पकड़ छुड़ाकर भाग खड़ा हुआ, कि उस बड़े अजनबी, रंग-बिरंगे मेले-सी दुनिया को भरपूर एक नज़र देख ले पहले, नाव के ऊंचे मुहाने पर खड़े होकर नीचे नीले पानी का विस्‍तार कैसा दीखता है, उसे किसी फोटो में नहीं, अपनी नंगी आंखों देखने की तृप्ति पाये.
लड़का इतनी तेज़ी से हाथ छुड़ाकर भागा था कि जवान मगर दमे की बीमार, बेवा औरत गुस्‍से में लड़के के पीछे चीखना चाहती थी, चीखने की जगह खांसने लगी थी. हाथ की पोटली और बोरे में घर से भागते वक्‍त भरा सामान अपने बगल गिराकर धम्‍म् से वहीं फर्श पर वहीं ढेर हो गई थी. पगड़ी लगाये, घुटने तक का कुर्ता पहने एक काला भुजंग आदमी कुछ देर बाद अपने ऊपर झुका देखा औरत ने तो एक बारगी झन्‍न् से उसकी पूरी देह कांप गई, कि वह बीच-बाज़ार जाने किस बेहयायी के कुएं में गिरी गई, फिर होश हुआ कि पगड़ीवाला अपनी बोली में उससे हाथ के काठ के कलछुल से पानी पीने की सिफ़ारिश कर रहा है. प्‍यास से कंठ सूख रहा था लेकिन औरत ने तेज़ी से सिर हिलाकर हब्शी को अपने से दूर किया, अपने कपड़े दुरुस्‍त करते देखी कि बोरा अब भी बगल में है और उसकी चोरी नहीं हुई.
औरत ससुराल के अत्‍याचार से भागकर आई थी, और बारह वर्ष के जिस लड़के की संगत में उसने यह उद्यम संभव किया था, वह उसकी अपनी औलाद नहीं, मृत पति का छोटा भाई था, स्‍त्री का देवर..
कुछ रहा होगा घर में जिससे औरत भाग रही थी. घरों में हमेशा कुछ रहता है, जिसे समझने के लिए कोई अपने बाप की हत्‍या कर देता है, लेखक आठ सौ पृष्‍ठों का उपन्‍यास लिखता है, फिर भी जीवन के सवाल सुलझते नहीं. सकल घरभारत सांप-सींढ़ी का, मास्‍टर-मार्गेरिता का खेल बना रहता है. अनुवादों की सहूलियत में हम जीवन को थोड़ा और समझ सकने का मोह पालते हैं, जैसे करामज़ोव बंधु के लिए रिचर्ड पेवियार और मारिस्‍सा वोलोखोंस्‍की की तारीफ़ होती रही है, कल देर रात चेक इंटरप्रेटेशन की फ़ि‍ल्‍म देखकर मैं पेत्र ज़ेलेंका की हिम्‍मत से खुश हो रहा था.
घर को, और घर में अपने जीवन को पहचानना दर्द-समुंदर होने लगे तो अच्‍छा है फिर लिखवैया अजाने मुल्‍क को पहचानने की यात्रा पर निकल पड़े. या फिर अजाने मुल्‍क पहुंचकर फिर वापस मुड़कर देखे?
घर को देखना. कितनी नज़रों से देखे? ऐसे? ऐसे? या ऐसे?
नदी का कंटीला मोड़ बहुत दर्द उकेरता है. बहुत-बहुत दूर जाकर देखने पर भी वैसे ही दर्द के सोते फूटते हैं. घर और मन की मोहिनी को आदमी कैसे पहचाने?

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