घबराहट के किसी क्षण घेराई में
हदबद की खोजाई, ज़िरह की लड़ाई
में खुद को खोजने निकलूंगा, कभी
निकला करते थे जैसे कॉर्टोग्राफ़र
मापने पहाड़, पानी की चौड़ाई
चार दिन और तीन रातों के सफ़र
के बाद दीखेगा कोई सूखा मैदान
निर्जन अनजान, झमेले दारु के अड्डे
पर कई सारे सिर झुकाये बैठे, ऐंठे
फंसान के फेंटे कितना सारा तो गुस्सा
करूंगा बहुत कोशिश मगर खुद को
खोज लाना नामुमक़िन ही रहेगा
फिर वही होगा हमेशा की तरह
पहचाने बहाने, पुराने गानों के धुन
होंगे, सयाने सपनों के सिरहाने
कोई लजीला, गर्वीला ख़याल होगा
वहीं कहीं ज़रा कोई चिचरीकारी होगी
हूं, हो सकता हूं के अमूर्तन की
मेरी बहकनभरी नशीली सुरकारी.
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nice
करूंगा बहुत कोशिश मगर खुद को
खोज लाना नामुमक़िन ही रहेगा
यह एक अनसुलझा और शाश्त प्रश्न सदियों से खड़ा है हम सबके सामने। सुन्दर।
सादर
श्यामल सुमन
09955373288
www.manoramsuman.blogspot.com
khud ko khojane ka bahut hi sunder kaam kiya hai aapne ...bahut achchhi lagi aapke man ki baat !!
बेहतरीन!
..दीप्त चित्रमान है गुरुवर [ ..दिन का देखिये गुरुवर टाईप होते हुए गुरूवार टाईप होता जा रहा था, सुरकारी टाईप करते सरकारी न हो जाता.. ]