May 27, 2010

होऊंगा जहां नहीं दीखूंगा

घबराहट के किसी क्षण घेराई में
हदबद की खोजाई, ज़ि‍रह की लड़ाई
में खुद को खोजने निकलूंगा, कभी
निकला करते थे जैसे कॉर्टोग्राफ़र
मापने पहाड़, पानी की चौड़ाई
चार दिन और तीन रातों के सफ़र
के बाद दीखेगा कोई सूखा मैदान
निर्जन अनजान, झमेले दारु के अड्डे
पर कई सारे सिर झुकाये बैठे, ऐंठे
फंसान के फेंटे कितना सारा तो गुस्‍सा

करूंगा बहुत कोशिश मगर खुद को
खोज लाना नामुमक़ि‍न ही रहेगा
फिर वही होगा हमेशा की तरह
पहचाने बहाने, पुराने गानों के धुन
होंगे, सयाने सपनों के सिरहाने
कोई लजीला, गर्वीला ख़याल होगा
वहीं कहीं ज़रा कोई चिचरीकारी होगी
हूं, हो सकता हूं के अमूर्तन की
मेरी बहकनभरी नशीली सुरकारी.